मुस्लिम सियासत के बहाने असदुद्दीन ओवैसी अपनी पार्टी AIMIM को हैदराबाद के चार मीनार के दायरे से बाहर निकालकर राष्ट्रीय फलक पर पहचान दिलाने की कवायद में लगातार जुटे हुए हैं. इस मिशन के तहत ओवैसी उत्तर प्रदेश की राजनीति में खुद को तुरुप का एक साबित करना चाहते हैं. हालांकि,अवध के पुलाव के आगे हैदराबाद की बिरयानी हमेशा कमजोर पड़ी है. उसके तीखापन, मसाले और कच्चेपन को कभी भी अवध के लोगों ने पसंद नहीं किया.
यूपी की सियासत कुछ ऐसी है, जहां अच्छे-अच्छे मठाधीश भी आकर गच्चा खा जाते हैं. 2017 और 2022 के चुनाव में तमाम कोशिशों को बाद भी असदुद्दीन ओवैसी कोई सियासी करिश्मा नहीं दिखा सके. यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए ओवैसी को यूपी में एक सियासी बैसाखी की तलाश है, जिसके सहारे से राजनीतिक जगह बना सके.
बीजेपी के साथ ओवैसी गठबंधन कर नहीं सकते हैं तो सपा और कांग्रेस उनसे हाथ मिलाने के लिए तैयार नहीं है. ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी की नजर यूपी में बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर है, लेकिन मायावती ने अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान करके उनके सियासी मंसूबे पर पानी फेर दिया है. इस तरह यूपी के राजनीतिक चक्रव्यूह में ओवैसी अकेले पड़ गए हैं तो सवाल यही है कि AIMIM के साथ किसका गठबंधन होगा?
यूपी में सियासत में अकेले पड़े असदुद्दीन ओवैसी?
उत्तर प्रदेश मेंके विधानसभा चुनाव में भले ही एक साल का समय हो, लेकिन सियासी तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है. बीजेपी ने अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस), ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा, संजय निषाद की निषाद पार्टी और जयंत चौधरी की आरएलडी के साथ गठबंधन कर रखा है. वहीं, सपा और कांग्रेस का गठबंधन पहले से ही फाइनल है. 2024 की तर्ज ही 2027 के चुनाव लड़ने का प्लान कांग्रेस और सपा ने बना रखा है.
बसपा प्रमुख मायावती ने बुधवार को एक बार फिर से अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान करके अपनी सियासी तस्वीर साफ कर दी है. गठबंधन को लेकर चल रही तमाम चर्चाओं को पूरी तरह भ्रामक और निराधार करार दिया है. मायावती ने बसपा के कार्यकर्ताओं से कहा है कि गठबंधन से जुड़ी 'उल्टी खबरों' पर कोई ध्यान न दें और चुनावी तैयारियों में जुट जाएं. उन्होंने साफ लहजे में कहा कि बसपा अपनी ताकत पर भरोसा करती है और बिना किसी बैसाखी के चुनाव लड़ेगी.
बीजेपी के साथ मौजूद छोटे दल की किसी भी सूरत में साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. सपा और कांग्रेस पहले से ओवैसी से दूरी बनाए हैं तो मायावती ने भी अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान करके AIMIM की सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. इस तरह से ओवैसी यूपी की सियासत में पूरी तरह से अकेले पड़ गए हैं.
यूपी में ओवैसी अब किससे करेंगे गठबंधन?
सपा और कांग्रेस के दूरी बनाने और मायावती के इनकार के बाद 2027 के विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के लिए गठबंधन का सियासी विकल्प क्या बचता है? ओवैसी के सामने फिलहाल चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी, पल्लवी पटेल की अपना दल कमेरावादी और स्वामी प्रसाद मौर्या की अपनी जनता पार्टी के साथ गठबंधन करने का विकल्प बचता है.
असदुद्दीन ने 2024 के विधानसभा चुनाव के चुनाव में कुछ क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर एक मोर्चा बनाया था. यह मोर्चा सपा के पीडीए फॉर्मूले के मुकाबले के तौर पर पीडीएम बनाया गया था. ओवैसी ने चंद्रशेखर आजाद, स्वामी प्रसाद मौर्या और पल्लवी पटेल को उनकी सीटों पर समर्थन किया था.
2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीएम मोर्चा बनाने वाले ओवैसी ने अपना कोई प्रत्याशी नहीं उतारा था, लेकिन उसके साथ का सियायी फायदा किसी भी दल को नहीं मिला. चंद्रशेखर जरूर मुस्लिम वोटों के सहारे जीत गए, लेकिन पल्लवी पटेल और स्वामी प्रसाद की जमानत जब्त हो गई. ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी की नजर बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की थी, लेकिन मायावती के गठबंधन से इनकार के बाद AIMIM के सामने किसी मजबूत दल के साथ गठबंधन का विकल्प नहीं बचा है?
बसपा से AIMIM को गठबंधन की उम्मीद
मायावती के इनकार किए जाने के बाद भी ओवैसी की पार्टी बसपा के साथ गठबंधन की उम्मीद लगाए हुए है.यूपी AIMIM के नेता मुफ्ती ओसामा नदवी कहते हैं कि हमारी कोशिश बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने की है.यूपी में बीजेपी को कोई भी एक दल अपने दम पर रोकने की ताकत नहीं रखा है, इसीलिए असदुद्दीन ओवैसी चाहते हैं कि सभी विपक्षी दल मिलकर चुनाव लड़ें. वह इसके लिए हर समझौता करने के लिए तैयार होने की बात कह रहे हैं, लेकिन यह भी कहते हैं- हम सम्मानजनक तरीके से दोस्ती चाहते हैं. इन दलों की बातों से लगता है कि इनका मकसद बीजेपी को सत्ता से हटाने का नहीं बल्कि बनाए रखने का है.
मुफ्ती ओसामा नदवी कहते हैं कि यूपी में सपा और कांग्रेस मुस्लिमों को वोट तो लेना चाहती हैं, लेकिन मुस्लिम लीडरशिप को आगे बढ़ाना चाहती हैं. ऐसे में हमारी पार्टी की कोशिश मुस्लिम प्रतिनिधित्व को खड़ा करने का है. ऐसे में हमें उम्मीद है कि आने वाले समय में बसपा के साथ AIMIM का गठबंधन होगा. मायावती अभी भले ही किसी सियासी मजबूरी में इनकार कर रही हों, लेकिन 2027 के चुनाव से पहले गठबंधन पर उनका नजरिया बदलेगा, क्योंकि बीजेपी की सरकार में मुस्लिम और दलित की हालत सबसे खराब है. बसपा और AIMIM का गठबंधन होने पर दलित और मुस्लिम एक साथ आ सकते हैं और यह सियासी केमिस्ट्री बीजेपी को सूबे की सत्ता से हटाने की दम रखती है.
ओवैसी को यूपी में गठबंधन की दरकार क्यों?
उत्तर प्रदेश में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी दो विधानसभा चुनाव लड़ चुकी हैं, लेकिन अभी उसका खाता तक नहीं खुला. 2017 के यूपी विधानसभा का चुनाव 38 सीटों पर AIMIM लड़ी थी.37 सीटों पर पार्टी की जमानत जब्त हो गई थी और संभल सीट पर मुख्य मुकाबले पर थी. AIMIM ने जिन सीटों पर चुनाव लड़ा था, वो मुख्यतौर पर पश्चिम उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बहुल सीटें थीं.2022 में एआईएमआईएम ने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे आधा फीसदी वोट भी नहीं मिल सका था.
हैदराबाद से बाहर असदुद्दीन ओवैसी ने जहां भी सियासी जगह बनाई है, वहां खुद की राजनीति के दम पर नहीं बल्कि किसी न किसी दल के सहारे जीत दर्ज करने में सफल रही है.महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक में देखा जा सकता है. ऐसे में यूपी में भी ऐसी ही कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उसे यहां कोई मजबूत राजनीति दल का साथ नहीं मिल पा रहा है.
यूपी में मुस्लिमों के सहारे कब उड़ेगी पतंग
केंद्र में मोदी और सूबे में योगी सरकार के चलते मुस्लिम समाज मायूस हैं और तथाकथित सेकुलर दल भी चुप हैं. ऐसे में मुस्लिम भरोसेमंद विकल्पों की तलाश में हैं इसलिए असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार चुनाव के बाद अपना पूरा ध्यान विशेष रूप से यूपी पर केंद्रित किया हुआ है. देश और प्रदेश में बीजेपी सरकार बनने के बाद जिस तरह से मुसलमान निशाने पर रहे है और सपा-बसपा जैसे दलों की खामोशी ने ओवैसी को सकारात्मक माहौल की उम्मीद नजर रही थी.
असदुद्दीन ओवैसी को यूपी में दिख रहा उम्मीद यूपी में एआईएमआईएएम को अपना सुनहरा भविष्य दिख रहा है. इसलिए असदुद्दीन ओवैसी मौजूदा समय में सूबे के सभी मामलों पर खासकर मुसलमानों से जुड़े मामलों पर अपनी बात बेबाकी से रख रहे हैं. ओवैसी मुस्लिम समुदाय को लुभाने के लिए सिर्फ योगी-मोदी सरकार और बीजेपी पर ही निशाना नहीं साध रहे हैं बल्कि मुस्लिम के मुद्दों पर गैर-बीजेपी दलों के रवैए को लेकर भी सवाल खड़े रहे हैं. यही नहीं AIMIM मुस्लिम प्रतिनिधित्व के मुद्दे को भी सियासी धार दे रही है ताकि मुस्लिमों के बीच अपनी पैठ जमा सके, लेकिन यूपी में जिस तरह की सियासी पिच है, वो अभी भी ओवैसी के लिए पथरीली बनी हुई है.
उत्तर प्रदेश का चुनाव दो ध्रुवी होता नजर आ रहा है. बीजेपी और सपा की सीधी लड़ाई के बनते समीकरण में छोटे दल भी अपने-अपने सियासी वजूद को बचाए रखने की है. ऐसे में ज्यादातर छोटे दल बीजेपी के साथ जुड़ रहे तो सपा का कांग्रेस के साथ गठबंधन है.
बीजेपी और सपा के सीधी लड़ाई में मुस्लिम वोटर भी पूरी तरह से सपा के साथ जाने का मन बना लिया है. ऐसे में ओवैसी के लिए सूबे में कोई जगह बचती नहीं है, हैदराबाद और यूपी की सियासत में काफी फर्क है. हैदराबादी स्टाइल के तर्ज पर यूपी में सियासी जमीन उपजाऊ बनाना ओवैसी के लिए आसान नहीं है, जिसके लिए ही मायावती के साथ गठबंधन करने के फिराक में है, लेकिन वो भी फिलहाल तैयार नहीं है.