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AIUDF: वो पार्टी जिसने मुसलमानों के सहारे जमाया असम की सियासत में सिक्का

असम जैसे मुस्लिमों की खासी आबादी वाले राज्य में एआईयूडीएफ की मुसलमानों के बीच मजबूत पकड़ होने की बड़ी वजह इसके संस्थापक भी हैं. इस पार्टी का गठन गांधी जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर 2005 को मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने किया था. गठन के वक्त पार्टी का नाम AUDF यानी असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट था.

मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने 2005 में किया था AIUDF का गठन (फोटो-@HafizRafiqulMLA) मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने 2005 में किया था AIUDF का गठन (फोटो-@HafizRafiqulMLA)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने 2005 में किया था AIUDF का गठन
  • 2006 के पहले विधानसभा चुनाव में ही पार्टी ने दिखाया था दम
  • कांग्रेस, बीजेपी के बाद असम की प्रमुख पार्टी है AIUDF

देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुड्डुचेरी के अलावा असम की जनता को भी नई सरकार चुनने का मौका मिलने जा रहा है. असम में तीन चरण में मतदान होना है, जो 27 मार्च से शुरू होगा. इस बार राज्य के सियासी समीकरण काफी बदल गए हैं. एक तरफ क्षेत्रीय दलों के साथ सत्ताधारी बीजेपी है तो दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी AIUDF जैसे सबसे प्रमुख क्षेत्रीय दल को अपने साथ ले लिया है. AIUDF का कांग्रेस के साथ आना इसलिए ज्यादा अहम है क्योंकि ये एक ऐसी पार्टी है जो न सिर्फ अच्छी संख्या में सीटें जीतती रही है, बल्कि इसका असम की मुस्लिम आबादी में काफी ज्यादा प्रभाव भी है. 

असम जैसे मुस्लिमों की खासी आबादी वाले राज्य में एआईयूडीएफ की मुसलमानों के बीच मजबूत पकड़ होने की बड़ी वजह इसके संस्थापक भी हैं. इस पार्टी का गठन गांधी जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर 2005 को मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने किया था. गठन के वक्त पार्टी का नाम AUDF यानी असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट था. बाद में जब 2009 लोकसभा चुनाव का वक्त आया तो मौलाना बदरुद्दीन ने पार्टी को विस्तार देते हुए इसका नाम AIUDF यानी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट कर दिया. 

मौलाना बदरुद्दीन ने हमेशा पार्टी गठन के पीछे राजनीतिक तौर पर कमजोर लोगों की मांगों और हक को आवाज देना बताया जबकि उनके विरोधी आरोप लगाते रहे कि मौलाना बदरुद्दीन ने बांग्लादेश से आए लोगों को संरक्षण देने के लिए पार्टी बनाई. बता दें कि असम एक ऐसा राज्य है जहां बांग्लादेश से आए लोगों को घुसपैठिया बताकर इस मुद्दे को काफी प्रमुखता से उठाया जाता रहा है. स्थानीय लोगों और बांग्लादेश से आए लोगों के बीच हिंसक घटनाएं भी देखने में आती रहती हैं. हालांकि, AIUDF का ऐसे तमाम इलाकों में होल्ड है, जहां ये माना जाता है कि बांग्लादेश से आए लोगों की आबादी भी काफी ज्यादा है. 

पहले चुनाव में ही चला AIUDF का जादू

पार्टी ने गठन के बाद सबसे पहला चुनाव 2006 में लड़ा. असम विधानसभा का ये चुनाव मौलाना बदरुद्दीन की पार्टी के लिए काफी उत्साहजनक रहा. पार्टी ने 69 सीटों पर चुनाव लड़ा जिनमें से 10 पर उसे जीत मिली. पहले ही चुनाव में AIUDF को 9 फीसदी वोट के साथ 10 सीटों पर जीत मिली. दूसरी तरफ इसी चुनाव में 125 सीटों पर लड़ने वाली बीजेपी को भी 10 सीटें ही मिलीं और उसका वोट प्रतिशत 12 फीसदी रहा. 

एक जनसभा के दौरान मौलाना बदरुद्दीन अजमल (फाइल फोटो)

इस चुनाव का असर ये हुआ कि पार्टी ने लोकसभा चुनाव में भी हाथ आजमाया. पार्टी के मुखिया मौलाना बदरुद्दीन अजमल खुद लोकसभा चुनाव में उतर गए. बदरुद्दीन अजमल ने ढुबरी लोकसभा सीट को चुना. ये ऐसी सीट थी जहां से कांग्रेस दशकों से जीतती चली आ रही थी. हालांकि, कांग्रेस के टिकट पर यहां से मुस्लिम उम्मीदवार ही जीतते रहे थे. लेकिन जब बदरुद्दीन अजमल उतरे तो उन्होंने मैदान फतह कर लिया. इस तरह असम से निकलकर AIUDF दिल्ली तक पहुंच गई. 

2011 में और मजबूत हुई पार्टी

बड़े कारोबारी के रूप में खुद को स्थापित कर चुके मौलाना बदरुद्दीन ने जब सियासत में कदम रखा तो वो तेज रफ्तार से आगे बढ़ते चले गए. 2006 की शानदार जीत और 2009 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली की राजनीति तक पहुंच बनाने वाले बदरुद्दीन अजमल ने जब 2011 के असम विधानसभा चुनाव में हाथ आजमाया तो नतीजे और भी ज्यादा खुश करने वाले रहे. 
इस चुनाव में एआईयूडीएफ ने 78 सीटों पर उम्मीदवार उतारे जिनमें से 18 सीटों पर उसे जीत मिली. वोट परसेंटेज बढ़कर करीब 13 फीसदी हो गया. जबकि असम गण परिषद और बोडोलैंड फ्रंट जैसे क्षेत्रीय धुरंधर महज 10 और 12 सीटों पर सिमट गए. बीजेपी आधे पर सिमट गई और महज 5 सीट ही जीत सकी. जबकि कांग्रेस का ग्राफ चढ़कर 78 तक पहुंच गया. यानी 126 सीटों वाली असम विधानसभा में 78 सीटों के साथ कांग्रेस ने सरकार बनाई तो दूसरी तरफ 18 सीटों के साथ बदरुद्दीन अजमल की पार्टी मुख्य विपक्ष दल बन गई. 

2016 में घट गईं सीटें

इस बीच केंद्र की सत्ता में बड़ा उलटफेर हुआ और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में बीजेपी ने बंपर बहुमत के साथ सरकार बनाई. केंद्र में सरकार बनते ही बीजेपी का राज्यों में भी जादू चलना शुरू हो गया. राज्य दर राज्य पार्टी जीतती चली गई. असम में भी इसका असर दिखाई दिया और बीजेपी ने 2016 के विधानसभा में अप्रत्याशित तरीके से 60 सीटों पर जीत दर्ज की. यानी 2011 में 5 सीट जीतने वाली बीजेपी सीधे 60 तक पहुंच गई. जबकि कांग्रेस गिरकर 26 पर आ गई तो AIUDF को भी नुकसान हुआ और वो 13 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी. पार्टी ने ये चुनाव 74 सीटों पर लड़ा था. हालांकि, उसका वोट प्रतिशत 2011 के बराबर यानी 13 फीसदी ही रहा लेकिन उसे पांच सीटों का नुकसान हुआ. 

विधानसभा चुनाव में भले ही एआईयूडीएफ को नुकसान रहा हो लेकिन इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का कद बढ़कर सामने आया. बदरुद्दीन अजमल के अलावा दो और सीटों पर AIUDF ने जीत दर्ज की. यानी लोकसभा में पार्टी के तीन सांसद पहुंच गए. हालांकि, 2019 में पार्टी फिर एक सीट पर सिमट गई और सिर्फ बदरुद्दीन अजमल ही ढुबरी सीट से लोकसभा का चुनाव जीत पाए. 

फिलहाल, AIUDF एक और चुनाव लड़ने को तैयार है. इस बार उसके लिए समीकरण और भी बेहतर माने जा रहे हैं क्योंकि कांग्रेस और लेफ्ट के साथ पार्टी का गठबंधन हो गया है. यानी करीब 35 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले असम में बीजेपी के सामने कांग्रेस और एआईयूडीएफ एक साथ मैदान में हैं. यही वजह है कि अब बदरुद्दीन अजमल ऐसे इलाकों में सीटें मांग रहे हैं जहां से उनकी पार्टी जीतती रही है या जहां उनके उम्मीदवार अच्छा प्रदर्शन करते रहे हैं.

बता दें कि असम के कुल 33 जिलों में से 9 जिले तो ऐसे हैं जहां मुस्लिम आबादी 50 फीसदी से भी ज्यादा है. ढुबरी जिले में सबसे ज्यादा करीब 80 फीसदी मुस्लिम रहते हैं, इसी सीट से बदरुद्दीन अजमल तीन बार से सांसद बनते आ रहे हैं. ढुबरी के अलावा बारपेटा, दर्रांग, हैलाकंदी, गोवालपारा, करीमगंज, गांव, मोरीगांव और बंगाईगांव जिले मुस्लिम बाहुल्य हैं. इन इलाकों के सहारे एयूडीआईएफ ने असम की सत्ता में अपना झंडा बुलंद किया है. 


 

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