NEET पेपर लीक मामले में सरकार लगातार सबकुछ ठीक करने का आश्वासन दे रही है लेकिन उसकी मुश्किलें कम नहीं हो रहीं. कई मोर्चों पर सरकार को जवाब देना पड़ रहा है. नीट की अगली परीक्षा में कोई गड़बड़ी ना हो इसके लिए केंद्र सरकार एडी-चोटी का जोर लगाती दिख रही है. सारे अहम मंत्रालय साझा प्लान पर मंथन कर रहे हैं और एक्शन कर रहे हैं. तमाम बारीकियां खंगाली जा रही है ताकि गड़बड़ी की कोई गुंजाइश ना रहे. इस पूरे मामले पर आजतक संवाददाता अंजना ओम कश्यप ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. योगेश सिंह से खास बातचीत की है.
आइए जानते हैं कि आजतक के साथ बातचीत में दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. योगेश सिंह ने क्या-क्या कहा.
सवाल: निष्पक्ष पेपर्स और निष्पक्ष एग्जाम इस देश में मुमकिन हैं? और अगर हैं, तो कैसे?
जवाब: सबसे बड़ी बात तो ये है कि जो घटना हो गई, वो दुर्भाग्यपूर्ण है. इसमें तो कोई बात ही नहीं है. और आगे नहीं होनी चाहिए, ये भी ठीक है. अभी जो विश्वास का संकट पैदा हुआ है, चाहे वो पेरेंट्स के बीच में हो, विद्यार्थियों के बीच में हो या एजुकेशन फ्रेटरनिटी के बीच में हो, तो सरकार ने अगर एयर फोर्स को इन्वॉल्व करने का तय किया है या इस पर विचार किया जा रहा है, तो अच्छी बात है. इससे जो भरोसे की कमी है, वो थोड़ा कम होगा.
बाकी बुनियादी बात ये है कि किसी भी तरीके से एग्जाम में गड़बड़ी ना हो. ये बहुत आवश्यक है. यहां पर दांव इतने बड़े हैं कि कई माफिया ऑपरेट करते हैं. आपने देखा है ड्रग माफिया है, शराब माफिया है, उसी तरह एजुकेशन में भी एक माफिया है, जो सिस्टम को बार-बार तोड़ने की कोशिश करता है.
जो पुलिस फोर्स है, उनको इससे सख्ती से निपटना चाहिए और इस बार सभी को साफ सजा मिलनी चाहिए, ताकि किसी की हिम्मत ना हो कि अगली बार ये कर पाए.
दूसरी बात ये है कि अभी जो एग्जाम अगले महीने 21 जून को होने वाला है, वो अच्छे से होगा. सरकार अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर रही है. मैं तो यही कहूंगा कि बच्चे विश्वास बनाए रखें, अपनी पढ़ाई पर फोकस करें और अच्छे से एग्जाम दें.
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आगे जो भी संभव होगा, वो सारे स्टेप्स लिए जाएंगे. अच्छी बात है अगर हम आर्मी या एयर फोर्स को इन्वॉल्व करने की सोच रहे हैं. थोड़ा भरोसा बढ़ेगा. जैसे आर्मी फ्लैग मार्च करती है तो भरोसा बढ़ता है, ये वैसी ही बात है. लेकिन करना तो उन्हीं लोगों को है जो इसमें इन्वॉल्व हैं. उनको ये काम अच्छे से करना चाहिए.
सवाल: एजुकेशन माफिया में कौन लोग होते हैं? क्या वक्त आ गया है कि हम इस देश में कोचिंग सेंटर्स के नाम पर चल रहे उन माफियाओं तक पहुंचें, जिन्होंने शिक्षा को एक ऐसा धंधा बना दिया है जिससे उनकी जेब भर सके और बच्चों का भविष्य उनके लिए चिंता की बात ही नहीं है?
जवाब: ये माफिया पैसा इन्वॉल्व होने के कारण बनता है, पनपता है और बड़ा होता जाता है. इसमें कुछ कोचिंग संस्थान भी हो सकते हैं. बहुत सारे नहीं भी होंगे, बहुत सारे पढ़ाई का काम करते होंगे, लेकिन एक वर्ग ऐसा हो सकता है जिनके नाम सामने आएं, क्योंकि वो ऑर्गनाइज करने में सहायता करते हैं.
कोचिंग की परंपरा से कैसे बाहर निकला जाए, ये अलग चिंता का विषय है. पूरे एजुकेशन सिस्टम में जब हम एंट्रेंस टेस्ट पर जाते हैं, जहां डिफिकल्टी लेवल थोड़ा ज्यादा होता है, तो बच्चे कोचिंग की तरफ जाते हैं. इसलिए एग्जामिनेशन के कठिनाई लेवल पर भी विचार करने की जरूरत है. एंट्रेंस टेस्ट फिल्ट्रेशन का माध्यम बन गया है, जबकि उसे सिलेक्शन का माध्यम होना चाहिए.
देश बड़ा है. अगर 22 लाख विद्यार्थी बैठ रहे हैं तो उनको फिल्टर करना पड़ेगा. अब समय आ गया है कि इसके स्ट्रक्चर पर भी विचार किया जाए कि टू-स्टेज या थ्री-स्टेज मॉडल पर जाना चाहिए या नहीं. सरकार इस पर विचार करेगी. लेकिन अभी 21 जून तक फोकस यही होना चाहिए कि इस बार का एग्जाम अच्छे से हो जाए.
सवाल: नीट के मामले में ये कई बार हो चुका है कि पेपर लीक हुआ. आपको क्या लगता है कि कौन-सा वो पॉइंट है जहां से पेपर लीक हो रहे हैं? कौन-सी जगह है जिसे प्लग करने की जरूरत है?
जवाब: पहले तो पूरी चेन बहुत इम्पोर्टेंट है. अगर कहीं भी कमजोर होगी तो नुकसान होगा. लेकिन इस बार जो नई बात निकलकर आई कि टीचर्स इन्वॉल्व हुए. जिस तरह की खबरें आई हैं और अरेस्ट हुए हैं, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ.
ये पूरे टीचर्स समुदाय के लिए भी शर्म और दुःख की बात है. आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ था. पहले पेपर लीक सेंटर से होता था, या इम्पर्सनेशन की कोशिश होती थी. एक की जगह दूसरा बच्चा एग्जाम देता था. सेंटर से पेपर लेकर भाग जाते थे, बाहर सॉल्व होता था और फिर अंदर लाने की कोशिश होती थी.
इस पर पूरा माफिया काम करता था. लेकिन अगर सोर्स ही टीचर्स हों और वही लीक करें, तो ये सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और सबसे ज्यादा चिंता की बात है.
किसी ने कभी सोचा भी नहीं था कि कुछ टीचर्स का स्तर इतना गिर जाएगा कि वो इस तरह के काम में शामिल होंगे. अगर ये सच है, जैसा खबरों में आ रहा है, तो कहीं ना कहीं इन्वॉल्वमेंट होगी. इसलिए हर लेवल पर सतर्क रहने और सख्ती करने की जरूरत है. डर से भी बहुत सारी चीजें ठीक होती हैं.
सवाल: क्या हम उम्मीद रखें कि इस देश में निष्पक्ष तरीके से, बिना लीकेज के एग्जाम होंगे? क्या सीबीएसई के रिजल्ट्स में ओएसएम सिस्टम को इंट्रोड्यूस करने में जल्दबाजी कर दी गई? कुछ बच्चों के पेपर्स धुंधले दिख रहे हैं, कुछ के पेपर्स बदल गए हैं, कुछ शिकायतें सामने आई हैं.
जवाब: पहली बात तो ये है कि आप भरोसा रखिए. मुझे लगता है कि ये इसका पीक आ गया है. अब इसका इलाज बहुत अच्छे से होगा और आगे ऐसा नहीं होगा.
मैं सारे बच्चों से अपील करूंगा कि सिस्टम पर भरोसा रखें. इसी सिस्टम ने इस देश को इतना आगे बढ़ाया है. हमारे बच्चे हर क्षेत्र में अच्छा कर रहे हैं. वो इसी शिक्षा व्यवस्था से निकले हैं. मुझे लगता है कि इस बार भी कुछ नहीं होगा और आगे बहुत अच्छा होगा.
जहां तक ओएसएम सिस्टम की बात है, ये टेक्नोलॉजी टेस्टेड टेक्नोलॉजी है. देश की बहुत सारी यूनिवर्सिटीज 5-10 साल से इसका इस्तेमाल कर रही हैं.
लेकिन सीबीएसई का सिस्टम बहुत बड़ा है. जब कोई चीज छोटे सिस्टम पर सफल होती है और उसे बड़े सिस्टम पर लागू किया जाता है, तो नए चैलेंज सामने आते हैं.
मुझे लगता है कि बड़े स्तर पर लागू करने के कारण कुछ समस्याएं आईं. कहीं स्कैनिंग ठीक से नहीं हुई, कहीं टीचर्स ने लापरवाही की, कहीं ट्रेनिंग उतनी गंभीरता से नहीं ली गई, और कहीं शायद ट्रेनिंग भी पर्याप्त नहीं हुई.
इसी कारण ये समस्याएं सामने आई होंगी. जल्दबाजी कहना शायद ठीक नहीं होगा, क्योंकि जब भी कोई नई व्यवस्था लागू होती है तो शुरुआती चुनौतियां आती हैं.
लेकिन बच्चों के भविष्य का मामला है, इसलिए हर चीज को बहुत ध्यान से देखना चाहिए ताकि किसी बच्चे का नुकसान ना हो. वरना भरोसे का संकट और बढ़ जाएगा.
तीसरी बात, जो आपने कही, वो बहुत महत्वपूर्ण है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी कहती है कि रटने की प्रवृत्ति कम होनी चाहिए. अगर कोई लाइन-बाय-लाइन एनसीईआरटी से मिलाकर मार्किंग करेगा तो नई सोच और समझ विकसित नहीं होगी. समझकर लिखना ही शिक्षा का उद्देश्य है.
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अगर किसी इवेलुएटर ने ऐसा किया है तो वो उसकी समझ की गलती है. मुझे नहीं लगता कि सीबीएसई की अपेक्षा होगी कि बच्चा केवल किताब की लाइनें लिखे. कई बार बहुत सारे लोग इस प्रक्रिया में शामिल होते हैं और उनकी नासमझी से ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है.
लेकिन हमें रटने की प्रवृत्ति कम करनी है और समझ को बढ़ाना है. अगर इवैल्यूएशन सिस्टम उसका समर्थन नहीं करेगा तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी. शिक्षक बनना जिम्मेदारी का काम है. पढ़ाना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है और कॉपियां जांचना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है.
मैं सभी शिक्षकों से अपील करूंगा कि इस काम को गंभीरता और ईमानदारी से करें. ज्यादातर लोग करते भी हैं, लेकिन जो नहीं करते, उनके लिए भी गंभीरता की आवश्यकता है.