जब दावों का गुब्बारा हकीकत की सुई से टकराता है, तो हवा कैसे निकलती है, इसका एक क्लासिक उदाहरण इस समय देश के परीक्षा तंत्र में देखने को मिल रहा है. नीट (NEET) महा-घोटाले और पेपर लीक के बाद जब पूरे देश में हाहाकार मचा, तो सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के पूरे ढांचे को सुधारने के लिए के. राधाकृष्णन कमेटी का गठन किया था. सरकार, मंत्रियों और खुद कमेटी के अध्यक्ष ने बार-बार छाती ठोककर कहा कि 70 से 75 फीसदी सुधार लागू कर दिए गए हैं.
लेकिन अब, सूचना का अधिकार यानी आरटीआई (RTI) के तहत जो जवाब आया है, उसने इन तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी है. आरटीआई से यह विस्फोटक खुलासा हुआ है कि एनटीए के पास खुद इस बात का कोई लिखित या समेकित (Consolidated) रिकॉर्ड ही नहीं है कि कमेटी की कौन सी सिफारिशें जमीन पर उतरी हैं और कौन सी अब भी फाइलों में दफन हैं! आइए समझते हैं...
आरटीआई की बड़ी बातें: दावों की हवा निकालती हकीकत
इस आरटीआई जवाब के जो मुख्य बिंदु सामने आए हैं, वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं, बल्कि देश के परीक्षा सिस्टम की पारदर्शिता पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करते हैं:
समेकित रिपोर्ट का अकाल: आरटीआई से साफ हुआ है कि नीट सुधारों को लागू करने को लेकर एनटीए के पास कोई भी फाइनल या समेकित रिपोर्ट मौजूद नहीं है.
पॉइंट-वाइज स्टेटस गायब: इसरो के पूर्व चेयरमैन के. राधाकृष्णन पैनल की 101 सिफारिशों में से किस पर क्या एक्शन हुआ, एनटीए इसका बिंदुवार स्टेटस देने में पूरी तरह नाकाम रहा.
पेपर सुरक्षा पर खामोशी: प्रश्नपत्रों की सुरक्षा और उनके ट्रांसपोर्टेशन को लेकर क्या नए पुख्ता इंतजाम किए गए, इस पर एनटीए ने कोई विशिष्ट अपडेट साझा नहीं किया.
दावे बनाम हकीकत: एक तरफ सरकार और एनटीए का दावा है कि 70 से 75% सिफारिशें लागू हो चुकी हैं, लेकिन दूसरी तरफ इस दावे को साबित करने के लिए कोई कागजी सबूत नहीं है.
कोई पब्लिक ट्रैकर नहीं: आम जनता, छात्रों या मीडिया के लिए ऐसा कोई पब्लिक ट्रैकर या डैशबोर्ड मौजूद नहीं है, जिससे यह ट्रैक किया जा सके कि कौन से सुधार पूरे हो चुके हैं और कौन से अभी पेंडिंंग हैं.
डेढ़ साल बाद भी 'खाली हाथ' है NTA
कहानी को थोड़ा पीछे ले चलते हैं. नीट विवाद के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के पूरे ढर्रे को बदलने और उसमें आमूलचूल सुधार के लिए के. राधाकृष्णन समिति ने अपनी 101 सिफारिशें सौंपी थीं. इस बात को बीते हुए करीब डेढ़ साल का वक्त हो चुका है.
लेकिन इतने लंबे समय के बाद जब 'इंडिया टुडे' ने आरटीआई के जरिए एनटीए से यह जानना चाहा कि इन सिफारिशों का स्टेटस क्या है, तो एजेंसी ने जो जवाब दिया, वो हैरान करने वाला है. एनटीए ने सीधे तौर पर मान लिया कि उसके पास ऐसा कोई अंतिम या समेकित रिकॉर्ड उपलब्ध ही नहीं है जो यह दिखा सके कि पैनल की कौन-कौन सी सिफारिशें पूरी तरह लागू हो चुकी हैं.
यह जवाब इसलिए भी बहुत बड़ा झटका है क्योंकि हाल के दिनों में वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, संसद की स्थायी समितियों और खुद के. राधाकृष्णन ने सार्वजनिक रूप से बयान दिए थे कि अधिकांश सिफारिशों को अमलीजामा पहनाया जा चुका है.
आरटीआई के इन सवालों पर NTA ने कैसे झाड़ा पल्ला?
कमेटी की सिफारिशों को लागू करने का बिंदुवार (Point-wise) ब्यौरा क्या है?
कौन से सुधार अभी पेंडिंग हैं?
प्रश्नपत्रों को सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
कंप्यूटर बेस्ड (CBT) परीक्षाओं को लेकर क्या प्रगति हुई है?
इन सभी सुधारों को पूरा करने की अंतिम समय-सीमा (टाइमलाइन) क्या है?
इन सीधे सवालों के जवाब में एनटीए ने जो लिखित दलील दी, उसे गौर से पढ़िए.
एनटीए ने कहा कि के. राधाकृष्णन समिति की सिफारिशें अभी जांच और कार्यान्वयन (Implementation) के विभिन्न चरणों में हैं. यह प्रक्रिया लगातार चल रही है और इसमें कई हितधारकों (Stakeholders), तकनीकी एजेंसियों और परीक्षा अधिकारियों के बीच समन्वय (Coordination) शामिल है. आज की तारीख तक, प्रत्येक सिफारिश के पूरे होने की स्थिति को दर्शाने वाली कोई भी अंतिम और समेकित पॉइंट-वाइज स्टेटस रिपोर्ट तैयार नहीं की गई है. इसके मद्देनजर, मांगी गई जानकारी उस रूप में उपलब्ध नहीं है जैसी मांगी गई है. इसलिए, आरटीआई अधिनियम, 2005 के तहत यह जानकारी नहीं दी जा सकती.
आरटीआई के जवाब से उठे सवाल
एनटीए का यह आरटीआई जवाब साफ तौर पर यह इशारा करता है कि भले ही बैकएंड पर कुछ काम चल रहा हो, लेकिन एजेंसी ने आज तक एक भी ऐसा आधिकारिक दस्तावेज तैयार नहीं किया है जो यह स्पष्ट कर सके कि कौन सी सिफारिशें पूरी हुईं, कौन सी बाकी हैं और बाकी बचे सुधार कब तक पूरे होंगे.
इतना ही नहीं, प्रश्नपत्रों के परिवहन (ट्रांसपोर्ट), स्टोरेज और उनके रख-रखाव में जो लूपहोल्स (कमियां) थे, उन्हें ठीक करने के लिए क्या सुरक्षा उपाय किए गए, इस पर एनटीए ने चुप्पी साध ली. साथ ही, पेन-एंड-पेपर मोड से कंप्यूटर बेस्ड या हाइब्रिड मोड में परीक्षा कराने की सिफारिशों पर कितनी प्रगति हुई, इसका भी कोई विशिष्ट जवाब नहीं दिया गया.
मजेदार बात यह है कि एनटीए का यह आरटीआई जवाब उन तमाम दावों के बिल्कुल उलट है जो पिछले कुछ दिनों में देश के सामने सीना ठोककर किए गए हैं. जरा इन दावों की क्रोनोलॉजी को समझिए-
29 मई का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा: इसरो के पूर्व चेयरमैन के. राधाकृष्णन ने खुद सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर कहा था कि उनकी उच्च स्तरीय समिति की 101 सिफारिशों में से अधिकांश या तो लागू हो चुकी हैं या उन पर तेजी से काम चल रहा है. इस हलफनामे के मुताबिक, बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन, मल्टी-लेयर फ्रिस्किंग, सीसीटीवी सर्विलांस का दायरा बढ़ाना, मोबाइल जैमर्स, स्टेट लेवल कोऑर्डिनेशन कमेटियां और संदिग्ध पैटर्न पकड़ने वाले डेटा एनालिटिक्स टूल्स जैसी प्रणालियां पहले ही चालू की जा चुकी हैं. हलफनामे में यह भी कहा गया था कि नीट को पेन-कागज मोड से कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट की तरफ धीरे-धीरे शिफ्ट करने की सिफारिश की गई है और दीर्घकालिक सुधार चरणों में लागू किए जा रहे हैं.
21 मई की संसदीय समिति की बैठक: इससे ठीक पहले, 21 मई को एक संसदीय स्थायी समिति को सूचित किया गया था कि लगभग 75 प्रतिशत सिफारिशें पहले ही लागू की जा चुकी हैं.
खुद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि लगभग 70 प्रतिशत सिफारिशों को लागू कर दिया गया है. अपने एक अन्य बयान में उन्होंने स्वीकार किया था कि कमांड चेन में सेंधमारी (ब्रीच) हुई थी, लेकिन सरकार ने राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों का पूरी तरह पालन किया है.
गायब कड़ी: वह प्रामाणिक रिपोर्ट कहां है?
इन तमाम बयानों, दावों और हलफनामों के बीच जो सबसे बड़ा 'मिसिंग लिंक' (गायब कड़ी) है, वो है एक प्रामाणिक स्टेटस रिपोर्ट. आरटीआई का जवाब चीख-चीखकर कह रहा है कि एनटीए के पास ऐसा कोई अंतिम, पॉइंट-वाइज स्टेटस रिपोर्ट का दस्तावेज है ही नहीं, जिसे जनता के साथ साझा किया जा सके.
नतीजा यह है कि आज की तारीख में एनटीए की ओर से ऐसा कोई भी सार्वजनिक आधिकारिक दस्तावेज मौजूद नहीं है, जिससे देश का कोई छात्र या अभिभावक यह देख सके कि किस सिफारिश पर क्या काम हुआ, देरी की वजह क्या थी और बचे हुए काम की डेडलाइन क्या है.