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टेंडर विवाद पर क्यों चुप है बोर्ड? CBSE की खामोशी पर उठ रहे ये तीन बड़े सवाल

राजनीतिक हस्तक्षेप और साइबर सुरक्षा चिंताओं ने इस विवाद को और गहरा कर दिया है. सीबीएसई की चुप्पी और आधिकारिक जवाबों की कमी से जनता में भरोसे की कमी बढ़ी है. यह मामला केवल एक टेंडर विवाद नहीं, बल्कि सार्वजनिक संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी चुनौती बन गया है.

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CBSE ने खामोशी क्यों अख्त‍ियार की है? उठे सवाल (PTI)
CBSE ने खामोशी क्यों अख्त‍ियार की है? उठे सवाल (PTI)

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के खिलाफ लगे आरोप आने वाले समय में जांच की कसौटी पर टिक पाएंगे या नहीं, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन छात्रों द्वारा उठाए गए सवालों को नजरअंदाज बिल्कुल नहीं किया जा सकता. जब तक बोर्ड इन पर सीधे तौर पर अपना रुख साफ नहीं करता, तब तक Coempt टेंडर विवाद खरीद-प्रक्रिया के साथ-साथ पारदर्शिता और जवाबदेही की एक बड़ी कहानी बना रहेगा.

देश के करोड़ों छात्रों से यह उम्मीद की जाती है कि वे परीक्षा हॉल में लिखे अपने हर एक उत्तर को सही साबित करें और उसका औचित्य (जस्ट‍िफिकेशन) दें. लेकिन, जब इन्हीं छात्रों ने खुद सीबीएसई की अपनी टेंडर प्रक्रिया पर सवाल उठाने शुरू किए, तो उन्हें बोर्ड की तरफ से नाममात्र के स्पष्टीकरण भी नहीं मिले.

ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) कॉन्ट्रैक्ट को लेकर छात्रों द्वारा किए गए एक ऑडिट ने पूरे देश में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था. इस घटना के हफ्तों बीत जाने के बाद भी सवाल लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जबकि जवाबों का अब भी भारी अकाल है. आज की तारीख में यह बहस सिर्फ हैदराबाद की कंपनी 'कोएम्प्ट एडुटेक' तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बात अब इस बात पर आ टिकी है कि आखिर सीबीएसई इस पूरे मामले पर खुद सामने आकर सफाई देने से क्यों कतरा रही है.

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जब परीक्षा के बाद भी खत्म नहीं हुआ चक्र
ज्यादातर छात्रों के लिए बोर्ड परीक्षा का चक्र उसी दिन खत्म हो जाता है जिस दिन नतीजे घोषित होते हैं. लेकिन इस साल ऐसा नहीं हुआ. इसके बजाय, उत्तर पुस्तिकाओं और नव-शुरूआत वाले 'ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम' को लेकर शुरू हुई मामूली चिंताएं अब एक ऐसे विशाल आंदोलन में बदल चुकी हैं, जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था के इतिहास में जवाबदेही को लेकर देखी गई सबसे अनोखी बहसों में से एक है.

इस पूरे विवाद के केंद्र में बैठी है 'कोएम्प्ट एडुटेक', जिसे सीबीएसई की डिजिटल मूल्यांकन प्रक्रिया का कॉन्ट्रैक्ट सौंपा गया था. अब इस बात को लेकर सवालों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार हो चुकी है कि आखिर इस कंपनी को यह कॉन्ट्रैक्ट शुरुआत में किस आधार पर और कैसे दिया गया था.

जो बात इस पूरे विवाद को सबसे अलग और असाधारण बनाती है, वह यह नहीं है कि आरोप क्या लगाए जा रहे हैं; बल्कि सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि ये आरोप लगा कौन रहा है. ये आरोप किसी प्रतिद्वंद्वी कंपनी ने नहीं लगाए, न ही किसी राजनेता ने और न ही किसी सरकारी खरीद-निगरानी संस्था ने उठाए हैं.

इन्हें उठाने वाले कोई और नहीं, बल्कि खुद छात्र हैं.

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विवाद के केंद्र में मौजूद 3 बुनियादी सवाल
सार्वजनिक रूप से उठाए गए इन मुद्दों का मुख्य फोकस इस बात पर है कि क्या टेंडर की शर्तों में किए गए बदलावों ने बोली लगाने (Bidding Process) की प्रतिस्पर्धा के पूरे माहौल को ही बदल दिया? और क्या उन बदलावों के लिए एक विस्तृत और ठोस स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं थी?

यहाँ यह साफ कर देना जरूरी है कि वर्तमान में ऐसी कोई आधिकारिक रिपोर्ट या निष्कर्ष सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो सके कि टेंडर में कोई धांधली हुई थी या इसे अवैध तरीके से आवंटित किया गया था. किसी भी जांच एजेंसी ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा है कि इसमें भ्रष्टाचार हुआ है, और न ही किसी अथॉरिटी ने कोएम्प्ट एडुटेक या सीबीएसई की तरफ से किसी गलत काम की पुष्टि की है.

फिर भी, जनता का भरोसा सिर्फ कानूनी फैसलों या क्लीन चिट पर निर्भर नहीं होता. वह पूरी तरह से पारदर्शिता पर टिका होता है.

आलोचकों द्वारा उठाया जा रहा केंद्रीय सवाल सिर्फ यह नहीं है कि क्या यह प्रक्रिया खरीद के नियमों के अनुरूप थी या नहीं. बल्कि, वे तीन बुनियादी सवाल पूछ रहे हैं:

क्या सीबीएसई ने पर्याप्त रूप से यह समझाया है कि टेंडर प्रक्रिया के दौरान अचानक पात्रता संबंधी कुछ अनिवार्य शर्तों को क्यों बदल दिया गया था?

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क्या ये बदलाव बेहद जरूरी थे?

क्या उन बदलावों का अंतिम लाभ कोएम्प्ट एडुटेक को मिला, जिससे उसने टीसीएस (TCS) जैसी बड़ी कंपनी को पछाड़कर यह कॉन्ट्रैक्ट हासिल कर लिया?

ये सवाल शायद सरकारी खरीद के भारी-भरकम दस्तावेजों के नीचे ही दफन रह जाते, अगर इन्हें जांचकर्ताओं के एक ऐसे अप्रत्याशित समूह ने बाहर न निकाला होता जो खुद इस पूरी व्यवस्था से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देश के युवा छात्र हैं.

वो टीनेजर्स जिन्होंने खोला सच 
यह विवाद तब और तेज हो गया जब 12वीं कक्षा के एक छात्र, सार्थक सिद्धांत ने ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रोजेक्ट से जुड़े सीबीएसई के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध टेंडर रिकॉर्ड्स की बारीकी से जांच करनी शुरू की.

उसका पूरा विश्लेषण टेंडर दस्तावेजों के अलग-अलग वर्जनों में पात्रता मानदंडों (Eligibility Criteria) और तकनीकी आवश्यकताओं में समय के साथ किए गए बदलावों पर केंद्रित था. सार्वजनिक डोमेन में मौजूद खरीद रिकॉर्ड्स का उपयोग करते हुए, उसने दलील दी कि कई शर्तें समय के साथ इस तरह से बदली गईं जो गहरी और गहन जांच की मांग करती हैं. यह मामला राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचने से पहले इंटरनेट और सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया.

जल्द ही, अन्य छात्र, युवा शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ भी इन दस्तावेजों की अपनी-अपनी समीक्षा करने में जुट गए. नंबरों पर बहस करने के बजाय, ये युवा अब टेंडर की धाराओं की तुलना कर रहे थे. आंसर-की पर बहस करने के बजाय, वे सरकारी खरीद प्रक्रियाओं की जांच कर रहे थे.

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यह भूमिकाओं का एक बेहद चौंकाने वाला उलटफेर था. जो संस्थान छात्रों का मूल्यांकन करने के लिए जिम्मेदार है, अचानक खुद छात्रों द्वारा उसका मूल्यांकन किया जा रहा था.

जब टेंडर की प्रक्रिया राष्ट्रीय बहस बन गई
यह मुद्दा शिक्षा के गलियारों से बाहर निकलकर तब एक बड़ा राष्ट्रीय विमर्श बन गया, जब राजनीतिक नेताओं ने भी इन चिंताओं को आवाज देना शुरू किया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से टेंडर की शर्तों में बदलाव के घटनाक्रम पर सवाल उठाए और खरीद प्रक्रिया की कड़ी जांच की मांग की. आम आदमी पार्टी (AAP) के अरविंद केजरीवाल ने भी छात्र जांचकर्ताओं द्वारा उठाई गई चिंताओं को प्रमुखता से रेखांकित किया और सार्वजनिक डोमेन में चल रहे आरोपों की तरफ सबका ध्यान खींचा.

इन राजनीतिक हस्तक्षेपों का महत्व राजनीति में नहीं, बल्कि घटनाओं के इस क्रम (सीक्वेंस) में छिपा है. राजनेताओं ने इस विवाद को पैदा नहीं किया, उन्होंने तो बस इसका अनुसरण किया. सवाल उन छात्रों से शुरू हुए थे जिन्होंने उन दस्तावेजों का अध्ययन करने में हफ्तों बिताए, जिन्हें पढ़ने की जहमत ज्यादातर वयस्क (एडल्ट) कभी नहीं उठाते.

सिर्फ यही एक वजह संस्थान (CBSE) की तरफ से एक विस्तृत और आधिकारिक जवाब के लिए काफी होनी चाहिए थी. विवाद तब और गहरा गया जब साइबर सुरक्षा कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं ने मूल्यांकन प्रणाली से जुड़े पोर्टल्स में तकनीकी खामियों और सुरक्षा कमियों पर चिंता जताई. डेटा लीक होने और डिजिटल सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों को लेकर नए सवाल सामने आने लगे. इन चिंताओं ने इस बहस को एक साधारण टेंडर प्रक्रिया से ऊपर उठाकर विश्वास और गवर्नेंस (शासन) के व्यापक मुद्दों तक पहुंचा दिया.

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सीबीएसई ने यह स्वीकार किया कि उत्तर पुस्तिका से संबंधित सेवाओं के लिए उपयोग किए जाने वाले एक पोर्टल में कुछ सुरक्षा कमियां पाई गई थीं और यह भी कहा कि सुधारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं. इसके साथ ही, बोर्ड ने यह रुख बनाए रखा कि मुख्य मूल्यांकन प्लेटफॉर्म पूरी तरह सुरक्षित है और उसके साथ कोई समझौता नहीं हुआ है.

इसके बावजूद, हर नए उठते मुद्दे ने ध्यान वापस इसी मूल सवाल पर ला दिया कि इस पूरे सिस्टम को आखिर चुना कैसे गया, इसे लागू कैसे किया गया और इसकी निगरानी कौन कर रहा था. यह सवाल आज तक अनुत्तरित है.

सीबीएसई का सिर्फ 'मानना' ही काफी नहीं है
सीबीएसई लगातार कोएम्प्ट को टेंडर देने में किसी भी तरह के पक्षपात के आरोपों से इनकार करती रही है. बोर्ड का रुख रहा है कि खरीद प्रक्रिया पूरी तरह से स्थापित सरकारी नियमों के तहत पूरी की गई थी और यह कॉन्ट्रैक्ट पूरी तरह वैध प्रक्रिया के जरिए दिया गया था. उसने इंटरनेट पर चल रहे कई दावों को भ्रामक और तथ्यों से परे भी करार दिया है.

वे इनकार और बोर्ड की सफाइयां रिकॉर्ड का हिस्सा हैं और उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए. लेकिन वे इस बहस को खत्म नहीं कर पाए हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि छात्रों और स्वतंत्र विश्लेषकों द्वारा उठाए गए कई विशिष्ट और तीखे सवाल सार्वजनिक डोमेन में अब भी अनुत्तरित हैं. बोर्ड ने कुल मिलाकर इस प्रक्रिया का व्यापक बचाव तो किया है, लेकिन उसने उन मूल सवालों पर विस्तार से कोई सार्वजनिक जवाब नहीं दिया है जिन्होंने इस विवाद को जन्म दिया था.

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आलोचकों का तर्क है कि यदि टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और मजबूत थी, तो बोर्ड को यह बताने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए कि मुख्य निर्णय कब, क्यों और किस आधार पर लिए गए.

और यही वो रहस्यमयी चुप्पी है, जो अब खुद अपने आप में एक बड़ी कहानी बनती जा रही है...

शायद इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला पहलू किसी टेंडर दस्तावेज में दर्ज ही नहीं है.

IndiaToday.in ने पिछले कई दिनों में कोएम्प्ट एडुटेक कॉन्ट्रैक्ट, टेंडर शर्तों में बदलाव, छात्र जांचकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों और पारदर्शिता के व्यापक मामलों पर विस्तृत प्रतिक्रिया जानने के लिए सीबीएसई से कई बार संपर्क किया है. इस रिपोर्ट के छपने तक, कम से कम पांच अलग-अलग ईमेल प्रश्नों के बावजूद, बोर्ड की तरफ से कोई ठोस या विस्तृत जवाब प्राप्त नहीं हुआ है. इस खामोशी को अब नजरअंदाज करना नामुमकिन होता जा रहा है.

किसी भी सार्वजनिक संस्थान से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह आलोचनाओं से परे हो. न ही उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे इंटरनेट पर लगने वाले हर आरोप का जवाब दें. लेकिन जब उठाई गई चिंताएं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों पर आधारित हों, देश के बड़े राजनीतिक नेताओं द्वारा उठाई जा रही हों और पूरे देश में उन पर बहस छिड़ी हो, तो पारदर्शिता की उम्मीद को खारिज करना बेहद मुश्किल हो जाता है.

एक विस्तृत स्पष्टीकरण आलोचकों को गलत साबित करने के बजाय खुद सीबीएसई को सही साबित कर सकता है. लेकिन स्पष्टीकरण के लिए संवाद और जुड़ाव की जरूरत होती है. चुप्पी से संवाद नहीं होता.

यह मामला एक टेंडर से कहीं ज्यादा बड़ा क्यों है?
कोएम्प्ट विवाद अब केवल किसी एक वेंडर या एक टेंडर का मामला नहीं रह गया है. यह सार्वजनिक संस्थानों और देश के नागरिकों के बीच के सीधे रिश्ते का मामला है. देश के लाखों छात्रों से हर साल परीक्षा हॉल में अपने जवाबों का औचित्य साबित करने की उम्मीद की जाती है. उन्हें बचपन से सिखाया जाता है कि पारदर्शिता, तर्क और सबूत सबसे ज्यादा मायने रखते हैं.

इस पूरे विवाद ने छात्रों की एक ऐसी नई पीढ़ी को जन्म दिया है जो उन्हीं सिद्धांतों को अब उस संस्था पर लागू कर रही है जो उनका मूल्यांकन करती है. उन्होंने सवाल पूछे हैं, उन्होंने दस्तावेजों का हवाला दिया है, और उन विसंगतियों को उजागर किया है जो जवाब की हकदार हैं. सीबीएसई को उनके निष्कर्षों से असहमत होने का पूरा अधिकार है. लेकिन वह यह उम्मीद बिल्कुल नहीं कर सकती कि ये सवाल सिर्फ इसलिए गायब हो जाएंगे क्योंकि उसने इनका जवाब न देने का फैसला किया है.

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