अगर आपके मोबाइल में कोई नया फीचर आता है तो टेक कंपनियां सबसे पहले उसका 'बीटा टेस्ट' करती हैं. बाजार में कोई नई कार उतारने से पहले उसे हजारों किलोमीटर तक उबड़-खाबड़ रास्तों पर दौड़ाकर परखा जाता है. बड़े से बड़ा सॉफ्टवेयर भी पहले सीमित यूजर्स के बीच ही रिलीज होता है.
ऐसे में अब एक बड़ा सवाल देश के सबसे बड़े शिक्षा बोर्ड यानी CBSE पर उठ रहा है. सवाल यह है कि आखिर CBSE ने 12वीं बोर्ड की लाखों कॉपियों की जांच के लिए इस्तेमाल किए गए नए ऑन स्क्रीन मार्किंंग (OSM) सिस्टम को पहले छोटे स्तर पर क्यों नहीं परखा? क्या छात्रों के भविष्य से जुड़ी इतनी बड़ी व्यवस्था को लागू करने से पहले 11वीं कक्षा में इसका ट्रायल नहीं होना चाहिए था? क्या चुनिंदा स्कूलों या कुछ खास क्षेत्रों में पायलट प्रोजेक्ट चलाकर विवादों से बचा जा सकता था?
आइए समझते हैं कि आखिर क्या है यह पूरा मामला और क्यों इस नए सिस्टम को लेकर संसद तक कैसे बात पहुंच गई है.
आखिर क्या है यह OSM सिस्टम?
सरल शब्दों में कहें तो OSM का मतलब है On-Screen Marking. अब तक बोर्ड परीक्षाओं में परीक्षकों (इवैल्यूएटर्स) के पास उत्तर पुस्तिकाओं का पूरा बंडल जाता था और वे पेन से कॉपियां जांचते थे. लेकिन इस नई व्यवस्था के तहत कॉपियों को पहले स्कैन किया जाता है और फिर शिक्षक कंप्यूटर या डिजिटल स्क्रीन पर कॉपियों का मूल्यांकन करते हैं.
CBSE का क्या तर्क है?
बोर्ड का मानना है कि इस सिस्टम से कॉपियों की जांच तेज, पारदर्शी और अधिक मानकीकृत (स्टैंडर्डाइज्ड) होती है. साथ ही, डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है और मॉडरेशन की प्रक्रिया पर बेहतर निगरानी रखी जा सकती है. इसी सोच के साथ साल 2026 में CBSE ने 12वीं की कॉपियों के मूल्यांकन में OSM को बड़े पैमाने पर लागू कर दिया.
सवाल तकनीक पर नहीं, टाइमिंग और तरीके पर है
शिक्षा विशेषज्ञों और शिक्षकों का साफ कहना है कि वे तकनीक के विरोधी नहीं हैं. दुनिया के कई प्रतिष्ठित परीक्षा बोर्ड डिजिटल मूल्यांकन का ही इस्तेमाल करते हैं. लेकिन असली सवाल रणनीति को लेकर है. क्या देश की सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील स्कूल परीक्षा (12वीं बोर्ड) में सीधे इस बड़े बदलाव को लागू करना सही था?
12वीं के अंक सिर्फ नंबर नहीं होते...
देश में 12वीं बोर्ड के अंक सिर्फ एक मार्कशीट नहीं हैं. इन्हीं नंबरों के आधार पर देश की टॉप यूनिवर्सिटीज में एडमिशन मिलते हैं, स्कॉलरशिप तय होती है और छात्रों के करियर की दिशा तय होती है. यानी, यहां गलती या किसी तकनीकी खामी की गुंजाइश शून्य (जीरो) होनी चाहिए.
क्या बोर्ड को पहले ही मिले थे रेड फ्लैग?
मीडिया रिपोर्ट्स पर नजर डालें तो OSM के व्यापक रोलआउट से पहले हुए शुरुआती परीक्षणों के दौरान कुछ तकनीकी और संचालन संबंधी (Operational) दिक्कतें सामने आई थीं. ये असल में वो रेड फ्लैग थे जिन पर सीबीएसई को थमना चाहिए था. ये भी दावा किया जा रहा है कि शिक्षकों और संबंधित पक्षों ने बोर्ड को सलाह दी थी कि इस सिस्टम को चरणबद्ध (फेज-वाइज) तरीके से लागू किया जाए.
हालांकि, दूसरी तरफ CBSE का पक्ष स्पष्ट है. बोर्ड का कहना है कि सिस्टम को लागू करने से पहले शिक्षकों को आवश्यक प्रशिक्षण दिया गया था और पूरी तैयारी की गई थी. लेकिन अगर तैयारी पूरी थी, तो नतीजों के बाद छात्रों और अभिभावकों के बीच असमंजस और सवाल क्यों खड़े हो रहे हैं?
ट्रायल के लिए 11वीं का नाम बार-बार क्यों आ रहा है?
शिक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी भी बड़े बदलाव को परखने के लिए 11वीं कक्षा सबसे सुरक्षित और कम जोखिम वाला चरण (लो रिस्क स्टेज) माना जाता है. 11वीं के नतीजे स्कूल स्तर पर होते हैं और वे सीधे तौर पर किसी छात्र के कॉलेज एडमिशन या नेशनल रैंकिंग को प्रभावित नहीं करते.
नीतिगत तौर पर यह तर्क बिल्कुल सही बैठता है कि यदि पहले इसे सीमित दायरे में आजमाया जाता, तो सिस्टम की कमियां सामने आ जातीं. हालांकि, इस बात का कोई सार्वजनिक प्रमाण नहीं है कि 11वीं में पायलट टेस्ट करने से सारी समस्याएं पूरी तरह खत्म ही हो जातीं, लेकिन इससे जोखिम जरूर कम हो जाता.
संसद की स्टैंडिंग कमेटी तक पहुंचा मामला
यह विवाद अब सिर्फ स्कूलों या सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि देश की संसद तक पहुंच चुका है. दरअसल, 17 वर्षीय छात्र सार्थक सिद्धांत ने इस पूरे मामले पर गहराई से पड़ताल की. उन्होंने इस सिस्टम के टेंडर दस्तावेजों और संचालन प्रक्रियाओं का अध्ययन किया और अपने प्रेजेंटेशन संसद की एक स्थायी समिति के सामने रखी है. इस कदम के बाद अब चर्चा सिर्फ तकनीक की अच्छाई-बुराई पर नहीं, बल्कि इसके डिजाइन और लागू करने की पूरी पारदर्शिता पर होने लगी है.
OSM सिस्टम अपने आप में एक बेहतर और आधुनिक सुधार हो सकता है, और इसका अंतिम फैसला अभी आना बाकी है. लेकिन इस पूरी बहस के केंद्र में एक बुनियादी सवाल हमेशा रहेगा कि जब बात देश के लाखों छात्रों के भविष्य और उनके करियर की हो, तो क्या बोर्ड को सीधे इतना बड़ा कदम उठाना चाहिए था, या फिर पहले छोटे स्तर पर 'सेफ्टी टेस्ट' करना ज्यादा समझदारी होती?