बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है. वजह है बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी का पाकिस्तान पर हमला. बलूचिस्तान में विद्रोही लड़ाकों के घातक हमलों के बाद पाकिस्तानी सेना ने बलूचों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू कर दी है, लेकिन क्या आपको पता है कि बलूचिस्तान से उठने वाली बगावत पहली बार नहीं है? बलूचिस्तान के DNA में आज भी एक स्वतंत्र देश का जीन मौजूद है, जो भारत-पाक के बंटवारे से पहले भी दिखाई देता था. आपको यह भी जानकर हैरानी होगी कि बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हैदराबाद भी कहा जाता था. आइए समझते हैं, ऐसा क्यों कहा जाता है.
1947-1948 के विभाजन के दौर में जब भारत और पाकिस्तान अलग-अलग देश बने, तो कई रियासतें ऐसी थीं जो न तो भारत में शामिल होना चाहती थीं और न ही पाकिस्तान में. इन रियासतों में दो प्रमुख उदाहरणों की हमेशा तुलना की जाती है-भारत की हैदराबाद रियासत (निजाम का राज्य) और पाकिस्तान की बलूचिस्तान रियासत (खासतौर पर कलात की खानात या स्टेट ऑफ कलात). इसी वजह से बलूचिस्तान को 'पाकिस्तान का हैदराबाद' कहा जाता था. यह उपनामा मुख्य रूप से बलूच अलगाववादियों, इतिहासकारों और कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है, ताकि दोनों घटनाओं की समानताओं को स्पष्ट किया जा सके.
कलात (बलूचिस्तान):
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 11 अगस्त 1947 को कलात के खान, मीर अहमद यार खान, ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की. उन्होंने पाकिस्तान में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया. मोहम्मद अली जिन्ना जो पाकिस्तान के संस्थापक थे.कुछ समय तक कलात के कानूनी सलाहकार भी रहे, और शुरू में उन्होंने कलात की स्वतंत्रता को मान्यता दी थी. कलात एक बड़ा क्षेत्र था, जिसमें आज का बलूचिस्तान प्रांत शामिल था.
हैदराबाद (भारत)
निजाम उस्मान अली खान ने भी 1947 में भारत में शामिल होने से इनकार कर दिया और स्वतंत्र रहने पर जोर दिया. दोनों रियासतें मुस्लिम शासकों के अधीन थीं, लेकिन दोनों ही बड़े देशों भारत और पाकिस्तान के साथ विलय नहीं चाहती थीं.
कलात पर पाकिस्तान का कब्जा
समझौते की कोशिशों के बावजूद, मार्च 1948 में पाकिस्तानी सेना ने कलात पर हमला किया. 27 मार्च 1948 को खान को मजबूरन एक्सेशन इंस्ट्रूमेंट पर हस्ताक्षर करने पड़े. बलूच नेताओं का दावा है कि यह जबरन कब्जा था, और इसके बाद विद्रोह शुरू हो गए जैसे नवाब नौरोज खान का विद्रोह.
हैदराबाद का भारत में विलय
13 सितंबर 1948 को भारत ने ऑपरेशन पोलो चलाया और हैदराबाद को अपने नियंत्रण में ले लिया. निजाम ने भी दबाव में आकर एक्सेशन के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए. दोनों मामलों में समझौते से ज़्यादा सैन्य शक्ति निर्णायक बनी. यह तुलना मुख्य रूप से बलूच राष्ट्रवादियों और इतिहासकारों की रचनाओं में मिलती है.