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नौकरी छोटी हो चलेगा पर 'बेबी फर्स्ट'! दुनिया भर में क्यों बदल रहा 'पापा' लोगों का मूड?

कोविड महामारी के बाद कामकाजी पुरुषों के मानसिक नजरिए और वर्क-कल्चर में बड़ा बदलाव आया है. अब वे भारी सैलरी और प्रमोशन्स की बजाय परिवार को प्राथमिकता दे रहे हैं. आंकड़ों के अनुसार, पिता दफ्तर में बिताए समय को घटाकर बच्चों के साथ अधिक समय बिता रहे हैं. यह बदलाव पारिवारिक खुशियों और मानसिक शांति को बढ़ावा देता है और कॉर्पोरेट जगत की प्रणाली को प्रभावित कर रहा है.

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चमचमाती नौकरियों से पुरुषों के अचानक मोहभंग होने का क्या है ये नया ट्रेंड?
चमचमाती नौकरियों से पुरुषों के अचानक मोहभंग होने का क्या है ये नया ट्रेंड?

बिहार की रहने वाली दीपा को उत्तराखंड में सरकारी नौकरी मिल गई. उनके पति अभ‍िषेक द‍ि‍ल्ली में नौकरी कर रहे थे. शादी के कुछ साल तक अभ‍िषेक ऑफ‍िस वाले जॉब कर रहे थे. लेकिन जैसे ही दीपा मां बनी, अभ‍िषेक ने बेटी को खुद पालने की ठान ली. तमाम तानों के बावजूद अभ‍िषेक कोई ढर्रे वाली नौकरी के बजाय छोटे-मोटे काम के जरिये पैसा कमाते हैं. लेकिन अब ये ट्रेंड पूरी दुन‍िया में छा रहा है. 

इस ट्रेंड के मुताबिक कोरोना के बाद बहुत कुछ बदल गया है. पहले जो पुरुष सुबह की पहली किरण से लेकर रात के घने अंधेरे तक दफ्तर की फाइलों, लैपटॉप की स्क्रीन्स और बेमतलब की मीटिंग्स में अपनी पूरी जिंदगी खपा देते थे, उनके करियर और प्राथमिकताओं में अब एक ऐसा अभूतपूर्व बदलाव आया है जिसने दुनिया भर की बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को हिलाकर रख दिया है. कॉर्पोरेट सीढ़ी चढ़ने की इस अंधी दौड़ और 12-12 घंटे के दमघोंटू वर्क-कल्चर को लात मारकर अब कामकाजी पुरुष 'फैमिली फर्स्ट' के मंत्र को अपना रहे हैं.

'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' की एक ग्लोबल रिपोर्ट ने हैरान करने वाले अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों से पर्दा उठाया है, जहां पढ़े-लिखे और ऊंचे पदों पर बैठे पिता स्वेच्छा से अपनी भारी-भरकम सैलरी और प्रमोशन्स की बलि दे रहे हैं, सिर्फ इसलिए ताकि वे घर पर रहकर अपने मासूम बच्चों की परवरिश में वक्त बिता सकें. यह आधुनिक कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल के मुंह पर एक करारा तमाचा है.

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बदली पुरुषों की सोच, अंधी दौड़ से तौबा
कोविड महामारी के बाद से दुनिया भर के वर्कप्लेस और पुरुषों के मानसिक नजरिए में एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला बदलाव आया है. अमेरिका में आए एक नए फेडरल डेटा एनालिसिस ('अमेरिकन इंस्टीट्यूट फॉर बॉयज एंड मेन') से इस नये बदलाव का खुलासा हुआ है कि कैसे बड़ी-बड़ी डिग्रियां रखने वाले और छोटे बच्चों वाले कामकाजी पिता अब कड़े कॉर्पोरेट कॉम्पिटिशन से तौबा कर रहे हैं. वे अब 'वर्काहॉलिक' होने के बजाय एक अच्छा 'फैमिली मैन' बनने को प्राथमिकता दे रहे हैं.

अब अभ‍िषेक को ही ले लीजिए, वो कहते हैं कि रेगुलर जॉब न करने के कारण लोग मुझे हाउस हसबैंड कहकर ताने देने से भी बाज नहीं आते. लेकिन मैंने तय कर ल‍िया था कि अपने बच्चे के बचपन का एक एक पल उसके साथ जियूंगा. पैसे और ड‍िग्र‍ियां जरूरी हैं लेकिन अपने बेबी से ज्यादा कुछ भी इंपार्टेंट नहीं है. 

 

6 घंटे दफ्तर में कम, 4 घंटे बच्चों के साथ ज्यादा
ये कामकाजी पिता अब जानबूझकर भारी सैलरी कट या कम वर्किंग आवर्स वाली रिमोट (वर्क फ्रॉम होम) और फ्लेक्सिबल नौकरियां चुन रहे हैं. आंकड़ों की मानें तो इस नए ट्रेंड के बाद कामकाजी पिताओं ने दफ्तर में खपने का अपना समय औसतन 6 घंटे प्रति सप्ताह तक घटा दिया है.

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दफ्तर से बचाए गए इस समय का सीधा रिजल्ट ये दिख रह है कि पुरुषों ने घर के कामों और बच्चों की देखभाल करने के ल‍िए 4 घंटे से ज़्यादा का वक्त बढ़ा दिया है. वे बच्चों को स्कूल छोड़ने जाने से लेकर उनके होमवर्क और डायपर बदलने तक की हर प्रक्रिया में खुद को शामिल कर रहे हैं. उनका मानना है कि ये उनके मेंटल हेल्थ को भी फिट रख रहे हैं. 

पैसा कमाने वाली मशीन बनने से इनकार
करियर एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह बदलाव इस बात का साफ संकेत है कि नई पीढ़ी के पुरुष अब केवल 'पैसा कमाने वाली मशीन' बनकर अपनी संतानों के खूबसूरत बचपन को मिस नहीं करना चाहते. करियर की तरक्की की इस नई प्रणाली में अब अंधाधुंध भागने के बजाय मानसिक शांति, वर्क-लाइफ बैलेंस और पारिवारिक खुशियों को सबसे ऊपर रखा जा रहा है. कुल मिलाकर अब 'पापा' लोगों की दुनिया बदल रही है और यह बदलाव वर्कप्लेस की पूरी प्रणाली को बदलने के लिए मजबूर कर रहा है.

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