कानून की किताबें अक्सर सख्त होती हैं, लेकिन कभी-कभी इंसाफ की तराजू भावनाओं और हकीकत को तौलकर एक नया रास्ता दिखाती है. उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक ऐसे ही मामले में दया और व्यवहारिकता की मिसाल पेश की है. कोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ चल रहे पॉक्सो एक्ट के मामले को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि ये 'हवस' का नहीं 'प्यार' था.
ये मामला चंपावत जिले का है. यहां एक युवक पर नाबालिग से यौन अपराध के तहत मामला दर्ज था. केस ट्रायल पर था और गिरफ्तारी की तलवार लटकी थी. लेकिन इस कानूनी लड़ाई के बीच की कहानी कुछ और ही थी. आरोपी और पीड़िता ने 12 मई 2023 को समाज के सामने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया. दोनों ने शादी कर ली. उनका एक बच्चा भी हुआ.
27 अक्टूबर 2025 को उनके घर बेटे का जन्म हुआ. हाई कोर्ट में जब यह मामला पहुंचा, तो जस्टिस आलोक मेहर की सिंगल बेंच ने सिर्फ धाराओं को नहीं देखा, बल्कि उस नन्हे बच्चे और उस महिला के भविष्य को देखा. कोर्ट ने दो टूक कहा कि यदि इस वक्त आरोपी को जेल भेजा जाता है या कानूनी कार्रवाई जारी रखी जाती है, तो इससे परिवार में अशांति पैदा होगी.
कोर्ट के शब्दों में, "यह जुर्म प्यार की वजह से हुआ था, हवस की वजह से नहीं. पीड़िता अब बालिग है और अपने पति के साथ शांति से जीवन बिताना चाहती है." सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से समझौते की अर्जी का विरोध किया गया. तर्क दिया गया कि पॉक्सो एक सख्त कानून है जो नाबालिगों की सुरक्षा के लिए बना है. हालांकि, कोर्ट ने वर्तमान स्थिति को देखा.
पीड़िता ने साफ कहा कि वो अपनी मर्जी से अपने पति के साथ है. कोर्ट ने माना कि ऐसे हालात में कार्यवाही जारी रखना 'न्याय' के उद्देश्य को विफल करना होगा. उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अपने अंतर्निहित अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए चंपावत के स्पेशल सेशंस जज के सामने पेंडिंग पूरी कार्रवाई को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा असली न्याय वही है जो परिवार टूटने से बचाए.
यह फैसला उन लोगों के लिए एक नजीर है जो कानूनी पेचीदगियों में फंसे हैं, जबकि हकीकत में वे एक खुशहाल सामाजिक जीवन जी रहे हैं.