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मौत का गड्ढा, कार के साथ डूबती जिंदगी की आस और 6 घंटे तक सिस्टम का सरेंडर... नोएडा में युवराज की मौत का गुनहगार कौन?

नोएडा सेक्टर-150 में 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत का मामला लोगों को दहला रहा है. हादसे के वक्त वो कार की छत पर बैठकर मदद मांगता रहा, लेकिन पुलिस, फायर ब्रिगेड और एसडीआरएफ तमाशबीन बने रहे. ये है सिस्टम के नाकाम हो जाने की पूरी कहानी.

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युवराज की मौत ने नोएडा के सिस्टम की पोल खोलकर रख दी (फोटो-ITG)
युवराज की मौत ने नोएडा के सिस्टम की पोल खोलकर रख दी (फोटो-ITG)

'वो गाड़ी की छत पर बैठा हेल्प-हेल्प चिल्लाता रहा, पुलिस से मदद मांगी. वहां सब थे. पानी ठंडा था. कोई पानी में नहीं गया. उस तक रस्सी भी नहीं पहुंचा पा रहे थे. मैं उतरा ठंडे पानी में, एसडीआरएफ वाले सीढ़ियो पर बैठे थे. तैराक होता, बोट होती, तो उसकी जान बच जाती. तीन टीम, 80 लोग मौके पर पहुंचे थे. चार बजे एसडीआरएफ आई, 6 बजे तक तैयारी की, फिर लाश निकाली.'

ये नोएडा के उसी इलाके के डीसीपी राजीव मिश्रा के बयान का हिस्सा है, जिनके इलाके में एक नौजवान युवराज मेहता डूब गया. बिल्कुल सही कहा डीसीपी साहब ने कि वे लोग परिवार के साथ खड़े हैं. सचमुच डीसीपी साहब और उनकी पूरी पुलिस फोर्स उस नौजवान के परिवार और पिता के साथ खड़ी रही. लेकिन सिर्फ खड़ी ही रही. किसी तमाशबीन की तरह. किसी ने किया कुछ नहीं. इनकी पुलिस के सामने वो नौजवान डूबता रहा. चीखता रहा. मदद मांगता रहा. गिड़गिड़ाता रहा. जान बचाने की मिन्नते करता रहा. लेकिन अफसोस की जान नहीं बची.

वो पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, पर ऐसा इंजीनियर भी नहीं जिसने कोई ऐसा सॉफ्टवेयर बना दिया हो जिसके बाद ठंडे पानी या ठंडे पानी में किसी पुलिसवाले, किसी फायर ब्रिगेड के कर्मचारी या किसी एसडीआरएफ के टीम को ठंड ना लगे. काश ऐसा कोई सॉफ्टवेयर बनाया होता तो 27 साल के युवराज मेहता की डूबकर मौत ना हुई होती.

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'अजब ये तेरे शहर का दस्तूर हो गया, 
हर आदमी इंसानियत से दूर हो गया'

सीमेंट और कंक्रीट का जंगल कहने को तो नोएडा शहर है. पर इस शहर का दिल भी उतना ही पत्थर है, जितनी यहां की बेजान इमारतें. एक इंसान करीब पौने दो घंटे तक एक मददगार हाथ के लिए तड़पता रहा. अपने पापा को फोन कर बचा लेने की मिन्नते करता रहा. फोन पर पापा से कहता रहा पापा मैं गहरे गड्ढे में गिर गया हूं. पानी भरा हुआ है. मैं डूब रहा हूं. प्लीज आकर मुझे बचा लीजिए. मैं मरना नहीं चाहता हूं. 

पापा अपने इकलौते बेटे की इस तड़प को सुनकर भागते हुए उसके पास पहुंचते हैं. कोहरे की घनी दीवार बाप-बेटे के बीच सचमुच की दीवार बनी हुई थी. बाप बेटे दोनों के कानों पर मोबाइल लगा था. दोनों एक दूसरे की आवाज सुन रहे थे. पर घने कोहरे की वजह से एक दूसरे को देख नहीं पा रहे थे. फिर डूबते बेटे ने मोबाइल की लाइट जलाई ताकि दूर खड़े पापा को वो दिखाई दे सके.

बेटा अपनी कार के साथ गहरे गड्ढे में था. गड्ढे में सात फीट से ज्यादा पानी था. हर गुजरते लमहे के साथ कार पानी में समाती जा रही थी. किसी तरह बेटा खुद को कार की सीट से निकालकर कार की छत तक ले आया. अब वो कार की छत से मदद मांग रहा था. बदहवास पिता तब तक पुलिस को फोन कर चुके थे. शायद 20-22 मिनट में पुलिस मौके पर भी पहुंच चुकी थी. घने कोहरे और कपकपाती ठंड के बीच सामने पानी में डूबती कार या कार पर सवार य़ुवराज पुलिसवालों को दिखाई ही नहीं दे रहा था. 

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वैसे भी मौके पर पहुंचते ही नोएडा पुलिस ने अपने हाथ खड़े कर लिए थे. अब अपनी जिम्मेदारी उन्होंने फायर ब्रिगेड और एसडीआरएफ को सौंप दी. वो दोनों भी मौके पर तो आई पर आधी अधूरी तैयारी के साथ. युवराज या युवराज की कार तक पुलिस फायर ब्रिगेड या एसडीआरएफ की टीम को छोड़िए उनकी रस्सी तक उन तक नहीं पहुंच पाई. सभी किनारे खड़े लगभग तमाशबीन ही बने हुए थे. 

इत्तेफाक से युवराज की चीख सुनकर वहां से गुजर रहा एक डिलिवरी ब्वॉय मोनिंदर वहीं खड़ा ये सब तमाशा देख रहा था. उससे रहा नहीं गया. मोनिंदर ने दिखाया कि कंक्रीट की जंगल में रहने वाला हर शख्स पत्थर दिल नहीं होता. जिस ठंडे पानी से डरकर पुलिस, फायर ब्रिगेड और एसडीआरएफ की टीम किनारे बैठी युवराज को मरते देख रही थी, मोनिंदर से ये देखा नहीं गया. वो उसी ठंडे पानी में युवराज को बचाने कूद पड़ा. लगभग आधे घंटे तक उसी ठंडे पानी में युवराज को ढूंढता रहा. लेकिन घुप्प अंधेरे और कोहरे के चलते युवराज दिखाई नहीं दिया. मोनिंदर वापस लौट आया. कम से कम उसने अपना फर्ज तो निभाया.

रात लगभग 12 बजे युवराज पानी से भरे इस गड्ढे में अपनी कार समेत डूबा होगा. अगले पौने दो घंटे तक वो पहले कार के अंदर, फिर कार की छत पर पहुंच कर मदद मांगता रहा. रात के करीब पौने दो बजे शायद युवराज डूब चुका था. दम तोड़ चुका था. क्योंकि यही वो वक्त था जब युवराज के फोन से उसके पिता का कनेक्शन कट गया था. यानि युवराज के साथ साथ पानी में डूबकर युवराज के मोबाइल ने भी दम तोड़ दिया था.

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युवराज इस गड्ढे में 12 बजे गिरा था. पौने दो बजे फोन बंद हुआ. यानि तब शायद वो डूब चुका था. जीते जी तो युवराज को बचाया नहीं जा सका. लेकिन उसकी मौत के बाद भी चार और घंटे लगे उसकी लाश को बाहर निकालने में. तब तक सुबह हो चुकी थी. नोएडा पुलिस, फायर ब्रिगेड और एसडीआरएफ की टीम के लगभग 80 जवान अफसर मौके पर मौजूद थे. लेकिन ये सब मिलकर भी एक बाप के सपने को वक्त से पहले मरने से नहीं बचा सकी. 

27 साल का युवराज मेहता गुरुग्राम की एक कंपनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर नौकरी करता था. युवराज के पिता राजकुमार मेहता स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से डायरेक्टर के पद से रिटायर हुए थे. कुछ साल पहले ही उनकी पत्नी की मौत हो गई थी. घर में अब सिर्फ युवराज और उसकी एक बहन थी. युवराज की बहन की शादी हो चुकी है और वो इस वक्त इंग्लैंड में रह रही है. युवराज अपने पिता के साथ नोएडा के सेक्टर 150 की एक सोसाइटी में रह रहा था. 

17 जनवरी शनिवार की रात युवराज गुरुग्राम से नोएडा अपने घर लौट रहा था. रात कोहरा काफी घना था. घर से बस कुछ ही पहले नोएडा सेक्टर 150 मोड़ पर एक तेज यू टर्न है और सामने एक डिवाइडर और उसके पीछे एक खुली जगह जहां पानी भरा हुआ है. घने कोहरे की वजह से युवराज को यू-टर्न दिखाई ही नहीं दिया और वो यू-टर्न लेने के बजाय कार सीधी ले गया. कार सामने दीवार से टकराई और उस नाले को पार करते हुए पानी से भरे गहरे गड्ढे में जा गिरी.

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तब रात के करीब 12 बजे थे. पूरा गड्ढा कोहरे से ढका हुआ था. युवराज शायद तब ठीक था. पहले तो उसने मदद के लिए आवाज लगाई फिर मोबाइल से अपने पापा राजकुमार को फोन किया. उसने बताया कि वो घर से कुछ ही पहले एक नाले में गिरा हुआ है. पिता ये सुनते ही अपने बेटे को बचाने घर से निकल पड़े. राजकुमार तब तक पुलिस को भी फोन कर चुके थे. उन्होंने 112 नंबर पर फोन मिलाया था. 

12.25 पर थाने में सूचना भी दर्ज हो जाती है. लेकिन कॉल और सूचना मिलने के बाद भी पुलिस को मौके पर पहुंचने में 20 मिनट से ज्यादा का वक्त लगता है. जब पुलिस पहुंची तब भी युवराज जिंदा था. पर पुलिस को समझ ही नहीं आया कि वो क्या करे. इसके बाद पुलिस ने पहले फायर ब्रिगे़ड और फिर एसडीआरएफ को फोन कर मौके पर बुलाया. ये दोनों भी मौके पर आ जाते हैं. पहले युवराज तक रस्सी फेकने की कोशिश करते हैं, पर रस्सी पहुंच ही नहीं पाती. 

एसडीआरएफ की टीम भी मौके पर थी लेकिन उसे तैयारी करने में ही काफी वक्त लग जाता है. करीब 2 घंटे. युवराज को गड्ढे में गिरे तब तक 6 घंटे बीत चुके थे. अब सुबह के 6 बज चुके थे. तब तक बहुत देर हो चुकी थी. सुबह 6 बजे एसडीआरएफ को नाकामी में लिपटी कामयाबी मिलती है. युवराज पानी से बाहर आ चुका था. लेकिन बगैर जिंदगी के. सिस्टम की नाकामी, बेबसी या वक्त पर काम ना आ पाना जो भी कह लीजिए युवराज को बचा ना सकी. और इस तरह वो मर गया.

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(नोएडा से अरुण त्यागी के साथ अरविंद ओझा का इनपुट)

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