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90 मिनट की जगह 9 सेकंड, इस गलती से नाकाम हुई थी बड़ी आतंकी साजिश, जानें मंगलुरु प्रेशर कुकर ब्लास्ट की पूरी कहानी

कैसे 9 सेकंड की गलती से नाकाम हुई थी एक आतंकी साजिश? ISIS कनेक्शन, फंडिंग नेटवर्क और कोर्ट के फैसले तक का पूरा सच. जानिए, मंगलुरु के कंकनाडी में 19 नवंबर 2022 को हुए प्रेशर कुकर ब्लास्ट की पूरी कहानी.

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इस साजिश में शारिक के साथ कई लोग शामिल थे (फोटो-ITG)
इस साजिश में शारिक के साथ कई लोग शामिल थे (फोटो-ITG)

वो 19 नवंबर 2022 का दिन था. शाम होने को थी. कर्नाटक के मंगलुरु शहर में रोज की तरह लोग दफ्तरों से निकल कर अपने घरों को वापस लौटने लगे थे. सड़कों पर ट्रैफिक बढ़ता जा रहा था. तभी कंकनाडी थाना क्षेत्र के पास चलते हुए एक ऑटोरिक्शा में जोरदार धमाका हुआ. जिसने पूरे इलाके को दहला दिया. लोग सन्न रह गए. किसी की समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या. हर तरफ अफरा तफरी का माहौल था. धमाके की सूचना पाते ही पुलिस और फोरेंसिक टीम मौके पर पहुंची. 

छानबीन का सिलसिला शुरू हुआ. जांच अधिकारियों ने शुरुआत में इसे एक हादसा माना, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, यह मामला एक बड़ी आतंकी साजिश के रूप में सामने आया. इस घटना ने न सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क किया, बल्कि देशभर में अलर्ट जारी कर दिया गया. इसके बाद धीरे-धीरे साजिश की परतें खुलने लगी और सामने आई एक खतरनाक नेटवर्क की तस्वीर.

19 नवंबर 2022 को शाम करीब 4:40 बजे यह धमाका हुआ था. उस वक्त वो ऑटोरिक्शा कंकनाडी पुलिस स्टेशन के पास से गुजर रहा था. तेज धमाके के बाद वाहन से धुआं निकलने लगा था. ऑटो में सवार यात्री और ड्राइवर दोनों गंभीर रूप से झुलस गए थे. ड्राइवर की पहचान पुरुषोत्तम पुजारी के रूप में हुई, जो इस घटना में घायल हुआ था. आसपास मौजूद लोग तुरंत मौके पर पहुंचे और घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया. असल में शुरुआती तौर पर इसे गैस सिलेंडर ब्लास्ट जैसा समझा गया था.

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जब पुलिस ने जांच शुरू की, तो उसी ऑटो में सवार एक यात्री पर शक गहरा गया. उसकी पहचान 24 वर्षीय मोहम्मद शारिक के रूप में हुई, जो शिवमोगा का रहने वाला था. जांच में पता चला कि वह फर्जी पहचान के साथ यात्रा कर रहा था. उसके पास ‘प्रेमराज’ नाम का फर्जी आधार कार्ड मिला, जिससे वह अपनी असली पहचान छिपा रहा था. इस खुलासे के बाद मामला साधारण दुर्घटना से हटकर गंभीर आपराधिक साजिश की ओर मुड़ गया.

घटनास्थल से मिले सबूतों ने पूरे मामले की दिशा बदल दी. पुलिस को वहां से सर्किट बोर्ड, 9-वोल्ट बैटरी, तार और जले हुए प्रेशर कुकर के टुकड़े मिले. इन सब चीजों ने साफ कर दिया कि यह कोई हादसा नहीं, बल्कि एक इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) था. प्रेशर कुकर का इस्तेमाल बम के कंटेनर के रूप में किया गया था. इससे पुष्टि हो गई कि धमाका एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा था.

जांच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा टाइमर को लेकर हुआ. मोहम्मद शारिक ने बम का टाइमर 90 मिनट के बजाय गलती से सिर्फ 9 सेकंड पर सेट कर दिया था. यही गलती उसकी पूरी योजना पर भारी पड़ गई. अगर टाइमर सही सेट होता, तो बम अपने तय लक्ष्य तक पहुंच सकता था. लेकिन टाइमर की इस छोटी सी चूक ने पूरी आतंकी साजिश को समय से पहले ही बेनकाब कर दिया.

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टाइमर की गलती का सबसे बड़ा असर खुद शारिक पर पड़ा. धमाका अचानक ऑटो में ही हो गया, जिससे वह खुद 40-45 प्रतिशत तक जल गया. उसे गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया. इस घटना ने साबित कर दिया कि यह कोई आत्मघाती हमला नहीं था, बल्कि योजना के मुताबिक किया जाने वाला टारगेटेड ब्लास्ट था. उसकी हालत ने जांच एजेंसियों को और भी कई सुराग दिए.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की जांच में सामने आया कि मोहम्मद शारिक एक ISIS-प्रेरित मॉड्यूल का हिस्सा था. उसे ‘कर्नल’ नाम के एक ऑनलाइन हैंडलर से निर्देश मिल रहे थे. यह हैंडलर एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए संपर्क में था. जांच में पता चला कि यह नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला हुआ था और भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की योजना बना रहा था.

शुरुआत में माना गया कि शारिक का निशाना कादरी मंजुनाथ मंदिर था. लेकिन बाद में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में खुलासा हुआ कि असली लक्ष्य धर्मस्थल स्थित मंजुनाथ स्वामी मंदिर था. अगर यह धमाका वहां होता, तो बड़ा नुकसान हो सकता था. इस खुलासे ने साफ कर दिया कि आरोपी की योजना धार्मिक स्थल को निशाना बनाने की थी, जिससे सांप्रदायिक तनाव फैल सकता था.

जांच में यह भी सामने आया कि शारिक अकेला नहीं था. एक मैकेनिकल इंजीनियर सैयद यासीन इस साजिश में उसके साथ था. उसने IED तैयार करने में तकनीकी मदद की थी. वहीं माज़ मुनीर अहमद ने शारिक के साथ मिलकर शिवमोगा में ट्रायल ब्लास्ट किया था. इन सभी ने मिलकर एक संगठित मॉड्यूल के रूप में काम किया. यह नेटवर्क धीरे-धीरे अपने मकसद को अंजाम देने की तैयारी कर रहा था.

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इस साजिश के पीछे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भी सक्रिय था. ‘कर्नल’ नाम का हैंडलर विदेश से निर्देश दे रहा था, जबकि अराफात अली दुबई से ऑपरेट कर रहा था. जांच में अब्दुल मतीन ताहा को इस मॉड्यूल का मास्टरमाइंड माना गया. यह नेटवर्क एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए संवाद करता था, जिससे इनकी गतिविधियों को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता था.

इस आतंकी साजिश के लिए फंडिंग भी आधुनिक तरीकों से की गई. क्रिप्टोकरेंसी जैसे USDT के जरिए पैसे भेजे गए और फिर उन्हें म्यूल अकाउंट्स के जरिए कैश में बदला गया. FINO पेमेंट्स बैंक समेत कई खातों में करीब 2.86 लाख रुपये जमा किए गए थे. इन पैसों का इस्तेमाल ठिकाने किराए पर लेने, बम बनाने का सामान खरीदने और अलग-अलग राज्यों में रेकी करने के लिए किया गया.

मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच NIA को सौंपी गई. लंबी जांच और सबूतों के आधार पर दिसंबर 2025 में मोहम्मद शारिक ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. इसके बाद 27 अप्रैल 2026 को NIA की विशेष अदालत ने उसे 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है. यह मामला दिखाता है कि कैसे एक छोटी सी गलती ने एक बड़े आतंकी हमले को टाल दिया और पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो गया.

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