पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की हलचल के बीच एक बड़ा अदालती फैसला सामने आया है. करोड़ों रुपये के शारदा पोंजी घोटाले के मुख्य आरोपी सुदीप्त सेन को कलकत्ता हाई कोर्ट से सशर्त जमानत मिल गई है. यह फैसला ऐसे समय आया है जब राज्य में राजनीतिक माहौल पहले से ही गरम है. करीब 13 साल जेल में बिताने के बाद अब सेन की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है. इस फैसले ने एक बार फिर इस बड़े घोटाले को सुर्खियों में ला दिया है.
हाई कोर्ट ने बुधवार को यह फैसला सुनाते हुए कहा कि सेन के खिलाफ चल रहे 300 से ज्यादा मामलों में अब सिर्फ दो ही केस बचे थे. इन दोनों मामलों में भी उसे जमानत मिल गई है. कोर्ट के इस फैसले के बाद अब उसकी रिहाई संभव हो गई है. इससे पहले उसे 387 मामलों में पहले ही जमानत मिल चुकी थी, जिनमें सीबीआई के सभी केस भी शामिल हैं.
कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला दिया. इसमें कहा गया कि हर व्यक्ति को जल्दी सुनवाई का अधिकार है, जो उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है. अदालत ने माना कि लंबे समय तक बिना सुनवाई के जेल में रखना न्याय के खिलाफ है. इस आधार पर अदालत ने सेन को राहत दी.
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस राजर्षि भारद्वाज और जस्टिस उदय कुमार शामिल थे, ने यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि जब किसी व्यक्ति को 13 साल तक जेल में रखा जाता है, तो यह अवधि उसके संभावित सजा से भी ज्यादा हो जाती है. ऐसे में हिरासत का उद्देश्य बदलकर सजा जैसा हो जाता है.
अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार खुद इस मामले में गतिरोध की स्थिति स्वीकार कर चुकी है. ऐसे में अब जमानत से इनकार करना गलत होगा. कोर्ट ने साफ कहा कि बिना दोष सिद्ध हुए किसी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना न्यायसंगत नहीं है. यह किसी व्यक्ति को बिना सजा के उम्रकैद देने जैसा होगा.
कोर्ट ने सुदीप्त सेन की रिहाई के लिए कुछ सख्त शर्तें भी तय की हैं. उसे 5,000 रुपये का निजी मुचलका और दो जमानतदार देने होंगे. इनमें से एक जमानतदार स्थानीय होना जरूरी है. यह शर्तें यह सुनिश्चित करने के लिए रखी गई हैं कि वह कानून का पालन करे.
इसके अलावा कोर्ट ने सेन को अपना पासपोर्ट जमा करने का आदेश दिया है. अगर पासपोर्ट पहले से किसी एजेंसी के पास नहीं है, तो उसे ट्रायल कोर्ट में जमा करना होगा. साथ ही उसे पश्चिम बंगाल की सीमा से बाहर जाने के लिए हाई कोर्ट की अनुमति लेनी होगी.
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि सेन को अपना वर्तमान पता बारासात पुलिस स्टेशन में देना होगा. वह बिना अनुमति अपना ठिकाना नहीं बदल सकता. यह कदम उसकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उठाया गया है.
कोर्ट ने सुदीप्त सेन को किसी भी वित्तीय कंपनी से जुड़ने पर पूरी तरह रोक लगा दी है. वह किसी कंपनी को प्रमोट नहीं कर सकता, न ही सलाहकार या एजेंट के रूप में काम कर सकता है. यह शर्त इसलिए लगाई गई ताकि भविष्य में ऐसे घोटालों को रोका जा सके.
इसके साथ ही अदालत ने उसे गवाहों या शिकायतकर्ताओं से संपर्क करने से भी मना किया है. अगर वह किसी को प्रभावित करने या धमकाने की कोशिश करता है, तो उसकी जमानत रद्द हो सकती है. कोर्ट ने उसे हर सुनवाई में पेश होने का भी निर्देश दिया है, चाहे वह वर्चुअल हो या फिजिकल.
शारदा ग्रुप पर आरोप है कि उसने लाखों निवेशकों को ऊंचे रिटर्न का लालच देकर ठगा. यह एक बड़ा पोंजी स्कीम घोटाला था, जिसमें लोगों की जमा पूंजी डूब गई. इस घोटाले ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी और हजारों परिवारों को आर्थिक नुकसान हुआ था.
सुदीप्त सेन को अप्रैल 2013 में जम्मू-कश्मीर से गिरफ्तार किया गया था. उसके साथ उसकी करीबी सहयोगी देबजानी मुखर्जी भी पकड़ी गई थी. दोनों को सोनमर्ग से गिरफ्तार किया गया था. हालांकि देबजानी को पहले ही जमानत मिल चुकी है.
सेन के वकील ने अदालत में दलील दी कि वह अब 64 साल का हो चुका है और कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है. हाल ही में उसे ब्रेन स्ट्रोक भी आया था। वकील ने कहा कि वह जितना समय जेल में रह चुका है, वह संभावित सजा से भी ज्यादा है.
कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जिन मामलों के रिकॉर्ड गायब हैं, उन्हें जल्द से जल्द फिर से तैयार किया जाए. साथ ही ट्रायल को तेजी से चलाने का आदेश दिया गया है. अदालत ने कहा कि जरूरी कागजात तीन हफ्ते में आरोपी को दिए जाएं और ट्रायल रोजाना आधार पर आगे बढ़ाया जाए. यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने की दिशा में अहम माना जा रहा है.
जहां तक इस फैसल के राजनीतिक असर की बात है, तो यह सवाल राजनीतिक तौर पर अहम जरूर है, लेकिन इसका जवाब सीधा तो नहीं दिखता. क्योंकि इस बात का असर कई फैक्टर पर निर्भर करता है. सबसे पहले, यह समझना जरूरी है कि कलकत्ता हाई कोर्ट का यह फैसला पूरी तरह न्यायिक आधार पर दिया गया है. कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 (स्पीडी ट्रायल का अधिकार) और 13 साल की लंबी हिरासत को ध्यान में रखते हुए जमानत दी है. यानी यह राजनीतिक नहीं, कानूनी फैसला है.
अब बात फैसले के राजनीतिक असर की तो शारदा चिटफंड घोटाला पहले से ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए एक संवेदनशील मुद्दा रहा है. विपक्ष, खासकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (CPM), समय-समय पर इस मामले को उठाते रहे हैं और TMC पर सवाल खड़े करते रहे हैं.
सुदीप्त सेन की जमानत को विपक्ष चुनावी रैलियों में फिर से उछाल सकता है. वे इसे पुराने घोटाले की याद दिलाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. जमानत का मतलब यह नहीं है कि सेन निर्दोष साबित हो गया है. केस अभी भी चल रहा है.
राजनीति में असली असर धारणा (perception) का होता है. अगर जनता को लगे कि पुराने घोटाले फिर चर्चा में आ रहे हैं, तो इसका सीमित असर पड़ सकता है. खासकर शहरी और जागरूक वोटर्स पर. चुनाव के आसपास ऐसे फैसले आने से उनका राजनीतिक उपयोग ज्यादा होता है, भले ही फैसला पूरी तरह न्यायिक हो.
TMC आमतौर पर ऐसे मामलों को पुराना और न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बताकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश करती है. साथ ही वह यह भी कह सकती है कि कोर्ट ने खुद लंबी हिरासत को गलत माना है.
सुदीप्त सेन की जमानत अपने आप में TMC के लिए बड़ा झटका नहीं है, लेकिन यह विपक्ष के लिए एक नैरेटिव टूल जरूर बन सकता है. असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि चुनावी प्रचार में इस मुद्दे को कितनी आक्रामकता से उठाया जाता है और जनता उसे कितना गंभीरता से लेती है.