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नौकरी के नाम पर भारतीयों को बना रहा था साइबर गुलाम, मुंबई से CBI के हत्थे चढ़ा मास्टरमाइंड

CBI ने म्यांमार के साइबर स्कैम रैकेट के मास्टरमाइंड को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया है. आरोपी भारतीयों को नौकरी का झांसा देकर थाईलैंड के रास्ते म्यांमार भेजता था, जहां उन्हें साइबर फ्रॉड करने पर मजबूर किया जाता था. पढ़ें इस शातिर साइबर अपराधी की पूरी कहानी.

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आरोपी को CBI ने उस वक्त पकड़ा, जब वो मुंबई पहुंचा (फोटो-ITG)
आरोपी को CBI ने उस वक्त पकड़ा, जब वो मुंबई पहुंचा (फोटो-ITG)

केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी और मानव तस्करी रैकेट का खुलासा करते हुए उसके कथित मास्टरमाइंड को गिरफ्तार कर लिया है. यह मामला उन भारतीय नागरिकों से जुड़ा है जिन्हें विदेश में नौकरी का झांसा देकर म्यांमार भेजा जाता था. वहां उन्हें जबरन साइबर ठगी करने के लिए मजबूर किया जाता था. इस कार्रवाई को हाल के समय की सबसे बड़ी साइबर गुलामी से जुड़ी कार्रवाई माना जा रहा है. जांच एजेंसी ने बताया कि यह नेटवर्क कई देशों में फैला हुआ था और संगठित तरीके से काम कर रहा था.

गिरफ्तार आरोपी की पहचान मुंबई निवासी सुनील नेल्लाथु रामकृष्णन के रूप में हुई है, जिसे इस पूरे रैकेट का ‘किंगपिन’ बताया जा रहा है. जांच में सामने आया है कि वह नौकरी की तलाश कर रहे भारतीय युवाओं को अपने जाल में फंसाता था. वह उन्हें आकर्षक सैलरी और विदेश में बेहतर जीवन का लालच देता था. इसके बाद उन्हें एक सुनियोजित प्लान के तहत विदेश भेजा जाता था.

CBI के मुताबिक, यह पूरा रैकेट दक्षिण-पूर्व एशिया में सक्रिय अंतरराष्ट्रीय आपराधिक गिरोहों से जुड़ा हुआ है. ये गिरोह लोगों को थाईलैंड में नौकरी दिलाने का झांसा देते थे. शुरुआत में पीड़ितों को दिल्ली से बैंकॉक भेजा जाता था. इसके बाद उन्हें गुप्त तरीके से म्यांमार के खतरनाक इलाकों में पहुंचा दिया जाता था.

म्यांमार के म्यावाडी क्षेत्र, खासकर कुख्यात केके पार्क (KK Park), को इस साइबर गुलामी का मुख्य केंद्र बताया गया है. यहां पहुंचने के बाद पीड़ितों के पास कोई रास्ता नहीं बचता था. उन्हें जबरन बंदी बनाकर रखा जाता था और उनकी गतिविधियों पर पूरी तरह नियंत्रण रखा जाता था. वहां से भागना लगभग असंभव था.

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इन साइबर स्कैम सेंटरों में फंसे लोगों से दुनिया भर में ऑनलाइन ठगी कराई जाती थी. इनमें डिजिटल अरेस्ट स्कैम, रोमांस फ्रॉड और क्रिप्टोकरेंसी निवेश के नाम पर धोखाधड़ी शामिल थी. भारतीय नागरिकों समेत दुनियाभर के लोगों को निशाना बनाया जाता था. इस तरह पीड़ित खुद अपराध करने के लिए मजबूर हो जाते थे.

जांच एजेंसी ने बताया कि इन लोगों को न सिर्फ कैद में रखा जाता था, बल्कि उनके साथ शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न भी किया जाता था. उन्हें लगातार धमकाया जाता था और उनके मूवमेंट पर कड़ी पाबंदी होती थी. अगर कोई काम करने से मना करता था तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते थे.

CBI ने इस पूरे रैकेट का खुलासा उन पीड़ितों से पूछताछ के बाद किया, जिन्हें 2025 में थाईलैंड से भारत वापस लाया गया था. मार्च और नवंबर 2025 में कई लोगों को रेस्क्यू कर भारत लाया गया था. इन पीड़ितों ने अपने साथ हुई पूरी घटना और रैकेट के तौर-तरीकों के बारे में विस्तार से जानकारी दी.

जांच के दौरान सुनील उर्फ ‘कृष’ का नाम सामने आया, जो इस नेटवर्क का अहम कड़ी था. वह लोगों को विदेश भेजने और उन्हें साइबर गुलामी में धकेलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था. उसकी गतिविधियों पर नजर रखने के बाद CBI ने उसे गिरफ्तार करने की योजना बनाई.

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CBI ने आरोपी को उस समय गिरफ्तार किया जब वह मुंबई पहुंचा. एजेंसी ने पहले से ही उस पर नजर रखी हुई थी. जैसे ही वह देश लौटा, उसे हिरासत में ले लिया गया. इसके बाद उसके घर पर छापेमारी भी की गई, जहां से कई अहम डिजिटल सबूत बरामद हुए.

छापेमारी के दौरान मिले डिजिटल साक्ष्यों से म्यांमार और कंबोडिया में चल रहे इस साइबर तस्करी नेटवर्क के कई और सुराग मिले हैं. जांच एजेंसी अब इस अंतरराष्ट्रीय गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश में जुटी है. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं.

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