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मुंबई में फिर गुलजार होंगे डांस बार

मुंबई में चोरी छिपे तहखानों और बंद कमरों के अंदर चल रहे डांस बारों को आखिरकार खुली हवा में सांस लेने की इजाजत मिल ही गई. पिछले आठ सालों से बांबे पुलिस एक्ट की जिस धारा की बदौलत मुंबई में डांस बारों पर पाबंदी लगी हुई थी, देश की सबसे बड़ी अदालत ने उसे गलत करार दिया.

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मुंबई में डांस बार
मुंबई में डांस बार

मुंबई में चोरी छिपे तहखानों और बंद कमरों के अंदर चल रहे डांस बारों को आखिरकार खुली हवा में सांस लेने की इजाजत मिल ही गई. पिछले आठ सालों से बांबे पुलिस एक्ट की जिस धारा की बदौलत मुंबई में डांस बारों पर पाबंदी लगी हुई थी, देश की सबसे बड़ी अदालत ने उसे गलत करार दिया. डांस बार के अब फिर से गुलजार होने के बाद जाहिर है तहखानों में चल रहे डांस बार अब जल्दी ही तहखाने में ही दफन हो जाएंगे.

आठ साल से बंद मुंबई के डांस बार ने अपने अंदर से ऐसे-ऐसे तहखाने उगले थे कि देखने वालों की आंखें फटी की फटी रह गईं. जमाने के लिए डांस बार बंद हो चुका था पर हुक्का बार, बीयर बार और ना जाने किस-किस बार के नाम पर डांस बार अब भी जिंदा था. बस फर्क ये था कि डांस बार की थिरकती लड़कियां अब फ्लोर से उठा कर तहखाने में पहुंचा दी गई थीं. सारा धंधा अब भूलभुलैया जैसे रास्तों, कमरों और सुरंगनुमा तहखानों में उतर आया था.

धंधा ओपन डांस फ्लोर से काले तहखाने में पहुंचा तो धंधे की कालिख भी और काली होती गई. डांस के नाम पर तहखानों में जिस्मफरोशी का धंधा तेजी से फलने-फूलने लगा. जिस अश्लीलता और कानून-व्‍यवस्‍था के नाम पर महाराष्ट्र सरकार ने आठ साल पहले डांस बार बंद करवा दिया था, वो दरअसल कभी पूरी तरह बंद हुआ ही नहीं था. खुले बार के मुकाबले बंद बारों में अश्लीलता ज्यादा परोसी जाने लगी थी.

अब चूंकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है बंद डांस बार को फिर से गुलजार करने का तो जाहिर है इन तहखानों की मौत तय है क्योंकि अब मुंबई में तमाम डांस बार एक बार फिर से तहखानों से निकल कर ऊपरी प्लोर पर आ जाएंगे.

डांस बार बंद होने के बाद वहां काम करने वाली 70 हजार से ज्यादा लड़कियां बेरोजगारी के चलते देश-विदेश में फैल गई थीं. उनमें से बहुतों को मजबूरन जिस्मफरोशी के धंधे तक में उतरना पड़ा था. अब वो भी दोबारा खुलेआम सामने आकर अपनी रोज़ी-रोटी कमा सकती हैं और यही सबसे बड़ी वजह थी जिसे पहले मुंबई हाई कोर्ट और फिर देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने माना और महाराष्ट्र सरकार के आठ साल पुराने फैसले को पलटते हुए हुक्म दे दिया कि अब डांस बार फिर से गुलजार होंगे.

धमाकेदार म्यूजिक, चकाचौंध भरी रोशनी और फिजा में घुलती महदोशी. अब से कोई सात साल पहले ये तस्वीर मुंबई की जिंदगी का एक अहम हिस्सा हुआ करती थी. तब मायानगरी में शायद ही कोई ऐसी रात होती होगी, जब ऐसी महफ़िलें कद्रदानों से खाली रहती हों, लेकिन 2005 में महाराष्ट्र सरकार ने बांबे पुलिस एक्ट में तब्दीली क्या की, मुंबई के डांस बारों पर अंधेरा छा गया. दलील थी डांस बारों में चल रही और अश्लीलता और बार की आड़ में चलते दूसरे ग़ैर-कानूनी धंधे.

सरकार के इस फैसले ने ना सिर्फ होटल और रेस्तरां मालिकों के हाथ-पांव बांध दिए, बल्कि 70 हज़ार से ज्‍यादा बार डांसर के सामने रोजी-रोटी की मुश्किल खड़ी हो गई. अब बात लोअर कोर्ट से शुरू से होकर हाई कोर्ट के गलियारों से होती हुई हिंदुस्तान की सबसे बड़ी अदालत तक जा पहुंची. इस बीच सुप्रीम कोर्ट के स्टे ऑर्डर की बदौलत डांस बारों में ताला लटकता रहा. लेकिन आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने डांस बारों पर अपना फैसला सुनाया. ये फैसला था अश्लीलता पर भूख की जीत का, ये फैसला था अपनी मर्ज़ी से कोई भी पेशा चुनने और सिर उठा कर जीने का और बस अब इसी खुशी में मुंबई के डांस बार एक बार फिर से गुलजार होंगे.

दरअसल, साल 2005 में महाराष्ट्र सरकार ने बांबे पुलिस एक्ट में दो धाराएं सेक्शन 33ए और बी को शामिल किया. 33ए के मुताबिक किसी भी बीयर बार, इटिंग हाउस या रेस्तरां में हर तरह के डांस पर रोक लगा दी गई, जबकि 33बी में थ्री स्टार या फिर उससे महंगे होटलों में डांस पर्फामेंस की छूट दी गई, क्योंकि सरकार का मानना था इन डांस बारों की आड़ में मुंबई में जिस्‍मफरोशी समेत दूसरे गलत धंधे चल रहे हैं. सरकार ने बताया था कि रोक के वक्‍त तक मुंबई में चल रहे कुल 2845 डांस बारों में से सिर्फ 345 बार ही लाइसेंसशुदा थे, जबकि 2500 बार बिना लाइसेंस के ही चल रहे थे.

हालांकि रेस्तरां और बार मालिकों के साथ-साथ कई सामाजिक संगठनों ने महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए इसे संविधान और जीने के अधिकार के खिलाफ करार दिया था और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने इसी बात पर अपनी मुहर लगाई.

मुंबई के डांस बार की हकीकत कुछ ऐसी है, उनकी कहानी कुछ ऐसी है, जिसको बॉलीवुड ने भी बड़े पर्दे पर पेश किया. बार डांसर्स की जिंदगी शायद मजबूरी की इन चारदीवारी में
खुले आसमान से बेहतर है. कम ये कम यहां उनका पेट तो ठीक से पलता है. वरना बार बंद होने के होने के बाद बार डांसर्स की सच्चाई ऐसे सामने नहीं आती.

पूरे महाराष्ट्र में डांस बार बंद होने से करीब 75 हजार लड़कियां बेरोजगार हो गई थीं. पेट पालने के लिए दर-दर भटक रही थी. अब उन्हें फिर से ठिकाने की आस मिली है, और रोजी-रोटी का ज़रिया मिला है.

महाराष्ट्र सरकार के एक कानून ने मुंबई के डांस बारों की बत्ती क्या गुल की, इन बारों में काम करनेवाली 70 हजार से ज्‍यादा बार गर्ल्स की जिंदगी में ही अंधेरा छा गया. एक बार डांसर के टैग के साथ जिंदगी कितनी दुश्वार हो सकती है, ये इन लड़कियों को साल 2006 में पहली बार तब पता चला जब मुंबई में डांस बारों पर कानून का शिकंजा कसने लगा. हालात से हार कर कुछ बार जहां बंद हो गए, वहीं कई बार वर्दीवालों को कुछ ले-देकर या फिर उनकी नजरों से बच कर तहखानों में चलने लगे लेकिन कानून और जिंदगी की इस जंग में अगर किसी ने सबसे ज्‍यादा नुकसान उठाया, तो ये वो बार गर्ल्स ही थी, जिनके दम पर डांस बारों की रौनक हुआ करती थी. डांस बारों में काम करनेवाली लड़कियों में 68 फीसदी लड़कियां तो ऐसी थीं, जो अपने परिवार में अकेली कमाने वाली थी और ऐसे में डांस बारों के बंद होने से उनके सामने गुजर-बसर की कैसी मुसीबत खड़ी हुई, ये समझना मुश्किल नहीं है.

लोगों ने लड़कियों की इस मजबूरी का फायदा भी खूब उठाया. हसीन ज़िंदगी के ख्वाब दिखा कर जहां सैकड़ों डांस बारों को मानव तस्करों ने उनके बारों से उठा कर सीधे दुबई समेत दूसरे खाड़ी देशों में शेखों के हरम तक पहुंचा दिया, वहीं ऐसी बार बालाएं भी कम नहीं थी, जिन्हें लाचारगी में जिस्‍मफरोशी का रास्ता चुनना पड़ा. डांस बारों में काम करने वाली सारी लड़कियां मुंबई की नहीं थी. लिहाजा काम बंद हो जाने पर कई लड़कियों ने अपने-अपने घरों का रुख किया, लेकिन यहां भी बार डांसर के टैग ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और आखिरकार ज्‍यादातर लड़कियों ने जिस्मफरोशी के धंधे के साथ ही समझौता करना पड़ा.

आपको याद होगा कि इसके बाद साल-दर-साल और ख़ास कर नए साल के मौकों पर देश के तकरीबन हर कोने से जिस्मफरोशी के अड्डों पर जब भी छापेमारी की खबर आई, बार डांसरों का जिक्र जरूर हुआ. उधर, चोरी छिपे मुंबई के तहखानों में नाच रही लड़कियों की हालत भी अच्छी नहीं रही और अश्लीलता के खिलाफ बने इस एक कानून ने लड़कियों को बंद कमरे के अंदर वो सबकुछ करने के लिए मजबूर कर दिया, जो कोई भी लड़की अपने लिए ख्‍वाबों में भी नहीं सोचना चाहेगी लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक बार फिर से नई उम्मीद जगाई है.

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