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कमाठीपुरा रेड लाइट एरियाः सहमी गलियां, सिसकती जिंदगी

मुंबई की चकाचौंध के बीच मौजूद कमाठीपुरा, इंसानियत और समाज दोनों के चेहरों पर ही एक झन्नाटेदार तमाचा है. एशिया के सबसे पुराने रेड लाइट एरिया कमाठीपुरा की सहमी गलियों में सिसक रही हैं, ना जाने कितनी ही मज़लूम औरतों की मजबूरियां.

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कमाठीपुरा में रहने वाले सेक्स वर्करर्स के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है
कमाठीपुरा में रहने वाले सेक्स वर्करर्स के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है

दुनिया ने तजुर्बात-ओ-हवादिस की शक्ल में, जो कुछ मुझे दिया है, लौटा रहा हूँ मैं. जी हां.. मुंबई का कमाठीपुरा कुछ ऐसे ही ज़माने को लौटा रहा है, अपने अंदर समेटे हुए कड़वे जज़्बात और तजुर्बों को. मुंबई की चकाचौंध के बीच मौजूद कमाठीपुरा, इंसानियत और समाज दोनों के चेहरों पर ही एक झन्नाटेदार तमाचा है. एशिया के सबसे पुराने रेड लाइट एरिया कमाठीपुरा की सहमी गलियों में सिसक रही हैं, ना जाने कितनी ही मज़लूम औरतों की मजबूरियां.

मजबूरियों पर अय्याशियों की महफ़िलें

कहते हैं जब मजबूरियां हद से गुज़र जाएं, तो कुछ इस सूरत में जश्न की शक्ल ले लेती हैं. एक बाग़ी जश्न. क्योंकि मजबूरियों की क़ब्र पर सजी हैं. अय्याशियों की ये महफ़िलें. उस माहौल की खनक में छुपे दर्द को समझने के लिये ज़रूरी नहीं है कि आप एक शायर हों या एक फ़िलॉसफ़र. इसे समझने के लिये आपका बस एक इंसान होना ही काफ़ी है. किसे नहीं मालूम कि उनकी सूरतों ने सजने से पहले अपनी सीरत को कुचला है. उनके जिस्मों ने दमकने से पहले अपनी रूह का दमन किया है. उनके तन ने मचलने से पहले अपने मन को रौंदा है. यक़ीनन उनके घुंघरुओं की खनक खोखली है.

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सेक्स वर्कर या डांसर की मजबूरियां

लाचारियों की दहलीज़ पर सजे इस बाग़ी जश्न में ख़ुशियां नहीं बल्कि आक्रोश है. बेइंतहा आक्रोश. इस आक्रोश को कमाठीपुरा की सहमी गलियों तक पहुंचने से पहले ही महसूस किया जा सकता है. चोर बाज़ार से कमाठीपुरा को जाता ये रास्ता और इस रास्ते पर पड़ते लड़खड़ाते क़दमों और मचलते जज़्बात के साथ पहुंचते लोग. अपने दिल की धड़कनों में किसी ख़तरे की आहट को महूसस करने के बावजूद ना जाने किस तलाश में बढ़ते जाते हैं सहमी गलियों की तरफ़.

9 गलियों में देह व्यापार

मुंबई शहर में जहां सपनों का बाज़ार आबाद होता है. जहां ग्लैमर का मायावी तानाबाना बुना जाता है. उसी मायानगरी में मौजूद कमाठीपुरा में ग्लैमर डी-ग्लैमराइज़ होता है. सपने शीशे की तरह टूटते हैं. जिसकी किरचियां जिस्म नहीं रूह को छलनी करती हैं. इस माहौल में इश्क़ की तलाश या हुस्न की कशिश दोनों ही बेमायने हैं. कमाठीपुरा का पूरा इलाक़ा मोटे तौर पर 16 गलियों में बंटा है. मगर अब सेक्स का कारोबार यहां सिर्फ 9 गलियों में ही चलता है.

गलियां घट गईं और ग्राहक बढ़ गए

कमाठीपुरा की गलियों की तादाद भले ही कम हो गई हो, लेकिन इन गलियों का रुख़ करने वालों की तादाद लगतार बढ़ती ही गई. कुछ इतनी कि यहां पड़ने वाले क़दम तेज़ बढ़ नहीं सकते और रफ़्तार बढ़ाएं तो कंधों से कंधे टकराने लगते हैं. कमाठीपुरा आने वालों के लिये यहां के छलावे में इतनी कशिश है कि आंखें सबकुछ देखते हुए भी धोखा खाने को तैयार हैं. गली दर गली घूमने के बाद भी हासिल कुछ होता सा नज़र नहीं आता. लेकिन तलाश है कि ख़त्म होना ही नहीं चाहती. इसीलिये ना ये बाज़ार ख़त्म होता और ना ही यहां आने वाले लोग.

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ऐसा होता है जिस्मों का सौदा

इन्हीं सहमी गलियों में अनगिनत और कभी न खत्म होने वाली कई कहानियां हैं. उन कहानियों की तह तक जाने से पहले इन गलियों को पहचानना ज़रूरी है. इन गलियों के सबसे पोशीदा राज़ हैं. यहां से धंधा चलाने के चार तरीक़े हैं. इनमें से एक तरीक़ा है कि सेक्स वर्कर डायरेक्ट अपने क्लायंट से बात कर ले. दूसरा है दलालों के ज़रिये. तीसरा बेहद दर्दनाक है. अंधेरी कोठरियों में बंद कम उम्र लड़कियों के साथ जबरदस्ती किया जाना. और चौथा है किसी बार या मयख़ाने में सौदा किया जाना.

ग्राहक से पैसा ऐंठना ही मकसद

कमाठीपुरा की इस तस्वीर पर आप निगाह डालें तो पाएंगे कि यहां दुकानें किसी भी आम बाज़ार की तरह सजती हैं. लेकिन इन दुकानों के ऊपर नज़रें गईं तो वो टकराएंगी उन झरोखों से, जहां से सेक्स वर्कर्स की असुरक्षित ज़िन्दगियां झांकती हैं. अपनी इसी असुरक्षा को दूर करने के लिये ये सेक्स वर्कर अपने हर लम्हे का सौदा किसी ना किसी ग्राहक से करने की फ़िराक़ में रहती हैं. जो उनकी ज़िन्दगी को कुछ महफ़ूज़ बना सके. अक्सर ये असुरक्षा उन्हें ग्राहक से पैसा ऐंठने के लिये कुछ भी कर गुज़रने पर आमादा कर देती हैं.

खुद को ऐसे पेश करती हैं सेक्स वर्कर

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बेहिसाब रंग रोग़न और मेकअप के साथ अलग-अलग लिबास और अलग-अलग अंदाज़ में वहां की सेक्स वर्कर दिखाई देती हैं. अपने आपको किसी शो केस में रखे शोपीस की तरह पेश करती हैं. इन्हें तलाश रहती है ग्राहक की और ग्राहक को तलाश होती है, थोड़े से वक़्त के ऐडवेंचर की. लेकिन सच्चाई ये है कि ग्राहक का एडवेंचर तो ख़त्म हो जाता है. मगर इन सेक्स वर्कर की ज़िन्दगी एडवेंचर बनकर रह जाती है. एक ऐसा जोखिम भरा एडवेंचर जिसमें शामिल हैं बीमारियां. शोषण और इस पेशे का सबसे बड़ा दुश्मन है बुढ़ापा.

ताबूतनुमा कमरों से झांकता शबाब का फरेब

इन गलियों के कोठे किसी लोकल ट्रेन जैसे लगते हैं. मुसाफ़िर लगातार आ रहे हैं, जा रहे हैं. लेकिन ये सफ़र कहां ख़त्म होगा. इसकी ख़बर चंद लम्हों के मुसाफ़िर और हमसफ़र दोनों को ही नहीं है. उन सहमी गलियों की अंधेरी कोठरियां. गली में आपने क़दम रखा नहीं कि दलाल आपको कोठरी तक ले जाने के हर हथकंडे अपनाएंगे. लड़कियों की ख़ूबियां गिनाएंगे. ना मानने पर ये एक पेशेवर की तरह अपना विज़िटिंग कार्ड भी थमा देते हैं. खैर इन पिंज़रानुमा कोठरी के अंदर आप जैसे ही जाएंगे. वैसे ही आप दूसरी दुनिया में पहुंच जाएंगे. लकड़ी की सीढ़ियों से लगे कुछ कोने. कोनों से लगे दरवाज़े. दरवाज़ों के अंदर से झांकते ताबूतनुमा कमरे. इन कमरों के अंधेरों से झांकता फीके पड़ चुके शबाब का फ़रेब.

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हर किसी को मिला धोखा

देश के बाकी रेडलाइट एरिये में काम कर रही सेक्स वर्करों की तरह यहां की सेक्स वर्कर की कहानी भी वही है. कोई प्यार में धोखा खा गई. कोई नौकरी के झांसें में आ गई. किसी को घरवालों ने ही इस जहन्नम का रास्ता दिखाया. तो किसी को दलाल ने पैसा कमाने का ये रास्ता सुझाया. यहां अंदर आने के दरवाज़े अलग अलग हो सकते हैं. मगर निकलने का रास्ते एक भी नहीं है.

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