ग्रेटर नोएडा के जारचा इलाके के बिसेड़ा गांव में हुई सांप्रदायिक घटना की जड़ में एक लाउडस्पीकर है, जिससे हुई घोषणा के बाद भीड़ एक शख्स की पीट-पीटकर हत्या कर दी. इसी लाउडस्पीकर से घोषणा की गई कि गांव के एक मुस्लिम परिवार के घर में गोमांस खाया जा रहा है. पिछले साल यूपी में जितनी भी सांप्रदायिक हिंसा हुई, उसमें हर पांचवी हिंसा की घटना नफरत की लाउडस्पीकर से निकली है.
वैसे तो ये गाइडलाइंस है कि कब और कहां लाउडस्पीकर बजाएं और किस स्तर तक बजाएं. लेकिन दूसरे कई राज्यों की तरह यूपी में भी प्रशासन कभी ये जहमत नहीं उठाता कि कहां कितना लाउडस्पीकर बज रहा है, उसका कोई हिसाब-किताब रखा जाए. 19वीं सदी में लाउडस्पीकर बनाने वाले जॉन फिलिप रेइस ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि 150 साल बाद एक विकसित समाज में यही भोंपू बेगुनाहों को मौत बांटेगा.
ग्रेटर नोएडा का बिसेड़ा गांव इस लाउडस्पीकर से निकली नफरत भरी अफवाह की सजा भुगत रहा है. लाउडस्पीकर की अफवाह तंत्र सिर्फ बिसेड़ा गांव तक ही सीमित नहीं है. एक अनुमान के मुताबिक 2014 में अगस्त महीने तक यूपी में पुलिस ने सांप्रदायिक हिंसा के 600 मामले दर्ज किए. उनमें हर पांचवा मामला लाउडस्पीकर से फैलाए उन्माद का अंजाम था. करीब 120 मामले लाउडस्पीकर पर नफरत की गूंज से निकले.
बावजूद इसके कमोबेश हर मंदिर या मस्जिद की शोभा लाउडस्पीकर बढ़ाते ही रहते हैं. इनसे ना सिर्फ ध्वनि प्रदूषण फैलता है, बल्कि उससे कहीं ज्यादा नफरत का जहर फैलता है. ध्वनि प्रदूषण रेगुलेशन रुल्स के मुताबिक प्रशासन की लिखित इजाजत के बाद ही कहीं पर लाउडस्पीकर लगाया जा सकता है. रिहायशी इलाकों में लाउडस्पीकर की आवाज की सीमा दिन में 55 डेसिबल है, जबकि रात में 45 डेसिबल.
आरटीआई के तहत राज्यों से पूछा गया कि क्या वो मंदिरों-मस्जिदों में लाउडस्पीकर्स की कोई मॉनिटरिंग करते हैं तो ज्यादातर राज्यों ने नहीं में जवाब दिया. यूपी भी इसका हिसाब किताब नहीं रखता. हालांकि मंदिरों-मस्जिदों में लाउडस्पीकर पर पाबंदी की याचिका सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची लेकिन सबसे बड़ी अदालत ने इस पर रोक लगाने से मना कर दिया. धर्म के सहारे चलने वाले देश के लोग हैं कि खुद मानने को तैयार नहीं है.