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लॉकडाउन में मदरसा बंद, गई उर्दू टीचर की जॉब, फिर ऐसे बदला आपदा को अवसर में

बेरोजगारी की मार झेल रहे दो दोस्तों को उम्मीद थी सरकारी मदद की, लेकिन नहीं मिली तो दोनों नौकरी की तलाश में निकल पड़े. इनकी नज़र दिल्ली के कोविड अस्पताल लोक नायक जय प्रकाश नारायण पर पड़ी. तभी इनके दिमाग में आपदा को अवसर में बदलने का आइडिया आया.

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उर्दू टीचर की गई जॉब तो बन गए सैनिटाइजेशन वर्कर (फोटो-रामकिंकर सिंह)
उर्दू टीचर की गई जॉब तो बन गए सैनिटाइजेशन वर्कर (फोटो-रामकिंकर सिंह)

  • उर्दू टीचर की गई जॉब, बन गया सैनिटाइज वर्कर
  • अस्पताल को फ्री में ही देते हैं सैनिटाइज की सेवा

उर्दू और अंग्रेजी पढ़ाने वाले मुस्तफा के परिवार के सामने सबसे बड़ी तंगी तब हुई, जब कोरोना संकट में मदरसा बंद हुआ. मदरसा बंद होने पर जॉब चली गई और कमरे को खाली करना पड़ा. बाद में दोस्त आमिर ने किराये का कमरा दिलवाया तो लॉकडाउन तक सैलरी से घर का खर्च चलता रहा.

उम्मीद थी एक अदद सरकारी मदद की, लेकिन नहीं मिली तो दोनों दोस्त नौकरी की तलाश में निकल पड़े. तभी इनकी नज़र दिल्ली के बड़े कोविड अस्पताल लोक नायक जय प्रकाश नारायण (LNJP) पर पड़ी. तभी इनके दिमाग में आपदा को अवसर में बदलने का आइडिया आया, वो भी सेवा भाव के साथ.

दोनों अब सैनिटाइजेशन करने का काम करते हैं. पुलिस की गाड़ियां, अस्पताल का गेट और एम्बुलेंस को फ्री सैनिटाइज करते हैं. लेकिन प्राइवेट कार से 30 रुपये और ऑटो से 10 रुपये सैनिटाइजेशन करने का चार्ज लेते हैं. पिछले एक महीने से दोनों ये काम कर रहे हैं. अब दोनों 200 रुपये हर रोज कमाने लगे हैं और अपने परिवार का खर्च संभाल रहे हैं. ये दोनों उत्तर प्रदेश के लोनी के खुशाल पार्क से यहां रोज़ आते हैं.

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सैनिटाइजेशन कराने आए ऑटो ड्राइवर मनीष ने बताया कि कई इलाकों में इसी काम के लिए 50 रुपये ले रहे हैं जबकी एलएनजेपी अस्पताल के बाहर सिर्फ 10 रुपये में ही काम हो जाता है और रोज़ 12 घंटे ऑटो चलता है. मैं दिन में करीब तीन बार सैनिटाइजेशन कराता हूं. कोविड अस्पताल की पुलिस पोस्ट पर तैनात जवानों ने बताया कि दोनों अस्पताल को फ्री सेवा दे रहे हैं.

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