फ्लोटिंग रेट लोन लेने वाले ग्राहकों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक अहम प्रस्ताव रखा है. केंद्रीय बैंक ने Reserve Bank of India (Interest Rates on Loans and Advances) Directions, 2026 का ड्राफ्ट जारी किया है. इसका उद्देश्य फ्लोटिंग रेट लोन में बेंचमार्क बदलने और ब्याज दर तय करने की प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी बनाना है. फ्लोटिंग रेट लोन (Floating Rate Loan) वह कर्ज है जिस पर लगने वाली ब्याज दर बाजार के हालात और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नीतियों के अनुसार घटती या बढ़ती रहती है.
प्रस्ताव के तहत लेंडर्स के लिए बेंचमार्क और उसके ऊपर लिए जाने वाले स्प्रेड में बदलाव की गुंजाइश सीमित करने की बात कही गई है. हालांकि, ये अभी प्रस्तावित नियम हैं और अंतिम रूप दिए जाने से पहले इनमें बदलाव संभव है.
मौजूदा लोन के लिए क्या है प्रस्ताव?
RBI के ड्राफ्ट में मौजूदा इंटरनल या एक्सटर्नल बेंचमार्क से जुड़े लोन को नए फ्रेमवर्क में माइग्रेट करने का एक बार का विकल्प दिया गया है. यह माइग्रेशन 1 अप्रैल 2029 तक पूरा करना होगा. इसके लिए लोन लेने वाली की सहमति जरूरी होगी और बैंक या लेंडर इस प्रक्रिया के लिए कोई फीस नहीं ले सकेंगे. माइग्रेशन के बाद लागू होने वाली नई ब्याज दर उस दर से ज्यादा नहीं हो सकेगी, जो माइग्रेशन से ठीक पहले लोन पर लागू थी.
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लोन एग्रीमेंट में बेंचमार्क की जानकारी जरूरी
प्रस्ताव के मुताबिक, लोन एग्रीमेंट में बेंचमार्क, ब्याज दर कितनी बार रीसेट होगी और रीसेट की तारीख स्पष्ट रूप से दर्ज करनी होगी. ज्यादातर फ्लोटिंग रेट लोन में बेंचमार्क रीसेट की फ्रीक्वेंसी तीन महीने से ज्यादा नहीं रखने का प्रस्ताव है. एक बार रीसेट फ्रीक्वेंसी तय होने के बाद, कुछ निर्धारित परिस्थितियों को छोड़कर लोन की अवधि के दौरान इसे बदला नहीं जा सकेगा.
स्प्रेड में बदलाव पर भी लग सकती है रोक
RBI ने बेंचमार्क के ऊपर वसूले जाने वाले स्प्रेड में बदलाव को लेकर भी स्पष्ट नियम प्रस्तावित किए हैं. क्रेडिट-रिस्क प्रीमियम में बदलाव तभी किया जा सकेगा, जब लोन लेने वाले की क्रेडिट प्रोफाइल में बदलाव हो और उसकी विस्तृत समीक्षा की गई हो. वहीं, ऑपरेटिंग कॉस्ट, टर्म प्रीमियम और बिजनेस स्ट्रैटेजी प्रीमियम जैसे स्प्रेड के अन्य हिस्सों में आमतौर पर तीन साल से पहले बदलाव नहीं किया जा सकेगा. हालांकि, लेंडर ग्राहकों को फायदा देने के लिए इन हिस्सों को पहले कम कर सकेंगे, बशर्ते इसके लिए उचित और गैर-भेदभावपूर्ण आधार हो.
बेंचमार्क बंद हुआ तो क्या होगा?
ड्राफ्ट में उस स्थिति के लिए भी प्रावधान किया गया है, जब किसी लोन से जुड़ा बेंचमार्क भविष्य में बंद हो जाए या उपलब्ध न रहे. ऐसी स्थिति में लेंडर को वैकल्पिक बेंचमार्क उपलब्ध कराना होगा. इस बदलाव से उधारकर्ता पर अनुचित वित्तीय बोझ नहीं पड़ना चाहिए. लोन एग्रीमेंट में फॉलबैक बेंचमार्क का भी प्रावधान किया जा सकता है, जो मूल बेंचमार्क उपलब्ध नहीं रहने की स्थिति में लागू होगा.
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नए फ्लोटिंग रेट लोन के लिए क्या नियम होंगे?
प्रस्ताव के तहत कमर्शियल बैंकों द्वारा दिए जाने वाले नए फ्लोटिंग रेट पर्सनल और MSME लोन को एक्सटर्नल बेंचमार्क से जोड़ना जरूरी होगा. वहीं, NBFC, रीजनल रूरल बैंक और कोऑपरेटिव बैंक जैसी अन्य रेगुलेटेड एंटिटीज के लिए भी एक्सटर्नल बेंचमार्क का विकल्प उपलब्ध रहेगा. प्रस्तावित बेंचमार्क में RBI की पॉलिसी रेपो रेट, भारत सरकार के ट्रेजरी बिल यील्ड और सिक्योर्ड ओवरनाइट रुपी रेट शामिल हैं. इसके अलावा Financial Benchmarks India Private Limited (FBIL) की ओर से प्रकाशित अन्य ब्याज बेंचमार्क को भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
लोन लेने वालों पर क्या असर पड़ेगा?
अगर आपके पास फ्लोटिंग रेट लोन है, तो इस प्रस्ताव का सीधा असर आपकी ब्याज दर, EMI या लोन की अवधि से जुड़ी शर्तों पर पड़ सकता है. हालांकि, फिलहाल इसे लागू नियम नहीं माना जाना चाहिए. मौजूदा लोन को नए फ्रेमवर्क में माइग्रेट करने के लिए ग्राहक की सहमति जरूरी होगी और इसके लिए कोई फीस नहीं ली जाएगी। साथ ही, बेंचमार्क और स्प्रेड में बदलाव की शर्तों को लोन एग्रीमेंट में ज्यादा स्पष्ट तरीके से दर्ज करने का प्रस्ताव है.
कब लागू हो सकते हैं नए नियम?
फिलहाल RBI का यह फ्रेमवर्क ड्राफ्ट स्टेज में है. केंद्रीय बैंक ने इस पर संबंधित पक्षों से सुझाव और प्रतिक्रियाएं मांगी हैं. परामर्श प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियमों में बदलाव संभव है. अगर प्रस्तावित फ्रेमवर्क मौजूदा रूप में अंतिम रूप लेता है, तो इसे 1 अप्रैल 2027 से लागू करने का प्रस्ताव है. वहीं, मौजूदा लोन को नए फ्रेमवर्क में माइग्रेट करने की प्रक्रिया 1 अप्रैल 2029 तक पूरी करनी होगी.