वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) एक फरवरी को जब संसद के पटल पर आम बजट (Budget 2023) पेश करेंगी, तो जाहिर है उनके तमाम ऐलानों में पांच ट्रिलियन इकोनॉमी का सपना भी शामिल होगा. हालांकि, सरकार के लिए ये बजट आसान नहीं होने वाला है. क्योंकि ग्लोबल आर्थिक मंदी (Economic Recession) की आशंका के बीच एक तरफ सरकार को देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती भी देनी है. दूसरी तरफ अगले साल होने वाले आम चुनाव से पहले मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल ये आखिरी पूर्ण बजट है.
इसलिए चुनावों को ध्यान में रखते हुए बजट में सरकार की कोशिश कल्याणाकारी योजनाओं का फंड बढ़कार या नई स्कीमों के ऐलान से इसे लोकलुभावन बनाने की भी होगी. कुल मिलाकर सरकार के लिए ये बजट चुनौतियों से भरा रहने वाला है.
फिस्कल डेफिसिट
देश की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन का बनाने के लिए सरकार की नजर फिस्कल डेफिसिट को घटाने पर होगी. क्योंकि इसके बिना 5 ट्रिलियन इकोनॉमनी की राहत नहीं तय नहीं हो पाएगी. पिछले बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राजकोषीय घाटा जीडीपी का अनुमान 6.4 फीसदी रखा था. सब्सिडी और तमाम कल्याणकारी योजनाओं की वजह से सरकार के खजाने पर बोझ बढ़ा है.
इलेक्ट्रिक व्हीक्ल्स
कोविड के दौरान पड़ी मार से ऑटो सेक्टर अभी तक पूरी तरह से उबर नहीं पाया है. हाल में डिमांड बढ़ने से आउटलुक में थोड़ी सुधार देखने को मिली है. साथ ही सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर दिया है. सरकार की कोशिश है कि इलेक्ट्रिक वाहनों की स्वीकार्यता लोगों के बीच बने. लेकिन बढ़ते इनपुट कॉस्ट की वजह से लोगों के लिए इलेक्ट्रिक व्हीक्ल्स महंगी साबित हो रही हैं.
ऐसे में जब बैटरी और ईवी से जुड़े अन्य कॉम्पोनेंट्स की कीमतों में कमी आएगी, तभी इलेक्ट्रिक गाड़ियां सस्ती हो सकेंगी. ईवी के लिए लाई गई FAME पॉलिसी मार्च 2024 तक लागू है. ईवी पर फिलहाल लगभग पांच फीसदी जीएसटी है, लेकिन इसके कॉम्पोनेंट्स पर जीएसटी 18 से 28 फीसदी है. जीएसटी में कमी से ही गाड़ियों की कॉस्ट में कमी आएगी. ऐसे में सभी की नजरें ईवी को लेकर बजट में होने वाले ऐलानों पर रहेगी.
9 लाख वाहन कबाड़ में बदलेंगे
केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने ऐलान किया है कि एक अप्रैल से 15 साल से पुराने 9 लाख सरकारी वाहन सड़कों पर नहीं नजर आएंगे. इनकी जगह नई गाड़ियां लाई जाएंगी. उन्होंने कहा कि हमने 15 साल पुरानी गाड़ियों को कबाड़ में बदलने की योजना बनाई है. ऐसे में देखना होगा कि सरकार ऑटो सेक्टर के लिए किस तरह की घोषणा कर सकती है.
चुनावी साल की मुश्किलें
मंदी की आशंका के बीच सभी की नजरें इस बात पर रहेंगी कि सरकार पूंजीगत खर्च या कैपिटल एक्सपेंडिचर को लेकर किस तरह के कदम उठाती है. अगर सरकार देश के मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत बनाना चाहती है, तो उसे सख्त फैसले लेने होंगे. उसे लोकलुभावन बजट के प्लान को छोड़ना पड़ेगा. लेकिन दूसरी तरफ उसके दिमाग में इस साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में होने वाले विधानसभा के चुनाव भी होंगे. ऐसे में हो सकता है कि सरकार बजट को लोकलुभावन बनाने की कोशिश करे.
उठाने होंगे सख्त कदम
अगर सरकार देश को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा बढ़ती है, तो उसे सख्त कदम उठाने होंगे. सब्सिडी और तमाम तरह की योजनाओं पर होने वाले खर्च में कटौती करनी होगी. मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में बढ़ने के लिए सरकार को इंडस्ट्री के अपग्रेडेशन और मौजूदा वर्कफोर्स की रीस्किलिंग के लिए बजट 2023 में विशेष पैकेज का ऐलान करना होगा. लेकिन शायद ये तभी संभव हो पाएगा, जब वो सब्सिडी और वेलेफेयर स्कीम पर होने वाले खर्च को सीमित करेगी.
मंदी, महंगाई और छंटनी
इस समय ग्लोबल इकोनामी में मंदी दर्ज की जा रही है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व महंगाई दरों में काबू पाने के लिए ब्याज दरों को लेकर आक्रामक है. रिजर्व बैंक ने भी इस वित्त वर्ष में लगातार रेपो रेट में इजाफा किया है. इसलिए सरकार घटती खपत को बढ़ाने पर भी सरकार का फोकस रहेगा. साथ ही मंदी की आहट भर से ही कंपनियों में छंटनी देखने को मिलेगी. बढ़ती महंगाई की वजह से लोगों का जीवनयापन का स्तर गिरता जा रहा है.