भारत के आर्थिक विकास का सबसे चमकदार चेहरा उसके प्रमुख व्यावसायिक बाजार यानी 'हाई-स्ट्रीट्स' हैं. आज के दौर में जहां आलीशान मॉल्स की भरमार है, वहीं दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों के पारंपरिक सड़क बाजारों ने अपना दबदबा कायम रखा है.
भारत के शीर्ष बाजारों में किराए की दरें न्यूयॉर्क और लंदन जैसे शहरों को टक्कर देती हैं. इन बाजारों में निवेश न केवल प्रतिष्ठा का विषय है, बल्कि यह कमर्शियल रियल एस्टेट में सबसे अधिक रिटर्न देने वाले क्षेत्रों में भी शुमार है.
जब भारत के सबसे महंगे बाजारों की बात आती है, तो दिल्ली का खान मार्केट हमेशा सूची में शीर्ष पर रहता है. वैश्विक रैंकिंग में अपना स्थान सुरक्षित रखने वाला यह बाजार अपनी विशिष्टता और 'हाई-प्रोफाइल' ग्राहकों के लिए जाना जाता है. यहां स्थान की भारी कमी और अत्यधिक मांग के कारण किराया ₹1,600 से ₹1,800 प्रति वर्ग फुट के बीच रहता है. इसका मतलब यह है कि यहां 1,000 वर्ग फुट की एक छोटी सी दुकान के लिए दुकानदार को हर महीने लगभग 16 से 18 लाख रुपये चुकाने पड़ते हैं.
मुंबई का लिंकिंग रोड (बांद्रा) और गुरुग्राम का गैलेरिया मार्केट किराए के मामले में नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं. मुंबई की भौगोलिक सीमाओं के कारण वहां नई जगह उपलब्ध होना कठिन है, जिससे लिंकिंग रोड जैसे क्षेत्रों में किराया ₹1,000 से ₹1,500 प्रति वर्ग फुट तक पहुंच गया है. दूसरी ओर, गुरुग्राम के गैलेरिया मार्केट ने पिछले कुछ वर्षों में किराए में लगभग 25% की रिकॉर्ड वृद्धि देखी है. यह बाजार उन वैश्विक ब्रांडों के लिए पहली पसंद बन गया है जो दिल्ली-NCR के समृद्ध वर्ग को आकर्षित करना चाहते हैं.
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दक्षिण और पूर्व भारत के रिटेल हॉटस्पॉट्स
केवल उत्तर भारत ही नहीं, बल्कि दक्षिण और पूर्व भारत के बाजार भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं. बेंगलुरु का इंदिरानगरअपनी 'कैफे संस्कृति' और टेक-प्रोफेशनल्स की उपस्थिति के कारण निवेशकों के लिए पसंदीदा स्थान बना हुआ है. इसी तरह, कोलकाता की पार्क स्ट्रीट और हैदराबाद का जुबली हिल्स अपनी ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक रिटेल के मिश्रण के साथ ऊंचे किराए का प्रबंधन कर रहे हैं. इन बाजारों में किराए की दरें ₹300 से ₹600 प्रति वर्ग फुट के बीच रहती हैं, जो स्थानीय आर्थिक विकास के अनुसार लगातार बढ़ रही हैं.
किराए में इस बेतहाशा बढ़ोतरी के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, इन बाजारों के महंगे होने के पीछे केवल मांग ही एकमात्र कारक नहीं है. प्रमुख मॉल्स में जगह की भारी कमी ने ब्रांडों को सड़क किनारे की दुकानों की ओर रुख करने पर मजबूर किया है. इसके अलावा, 'ब्रांड विजिबिलिटी' एक बड़ा कारण है. मुख्य सड़क पर स्थित दुकान का विज्ञापन मूल्य मॉल के अंदर स्थित दुकान से कहीं अधिक होता है. साथ ही, उपभोक्ता अब केवल सामान खरीदने के लिए नहीं, बल्कि एक 'अनुभव' के लिए इन खुले बाजारों में जाना पसंद करते हैं, जिससे यहां फुटफॉल हमेशा बनी रहती है.
हालांकि, लाखों का किराया वसूलने वाले इन बाजारों के सामने बुनियादी ढांचे, पार्किंग की कमी और बढ़ती भीड़ जैसी चुनौतियां भी हैं. निवेश के नजरिए से देखें तो, इन इलाकों में कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदना आज भी एक बड़ा टास्क है जिसके लिए आपको ऊंची कीमत देनी पड़ती है.
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