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'45 सालों में नहीं देखी ऐसी गिरावट'...भारत से क्यों गायब हो रहे हैं किफायती घर!

करोड़ों भारतीयों के लिए एक सही कीमत पर अपना घर होने का सपना आज भी जिंदा है, लेकिन जब तक सप्लाई में सुधार नहीं होता और नीतियां जमीनी हकीकत से मेल नहीं खातीं, तब तक इस सपने को पूरा करना लगातार महंगा होता जाएगा.

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सिमटी किफायती घरों की सप्लाई, संकट में मिडिल क्लास (Photo-ITG)
सिमटी किफायती घरों की सप्लाई, संकट में मिडिल क्लास (Photo-ITG)

करोड़ों भारतीयों के लिए अब घर खरीदना सिर्फ मुश्किल नहीं रह गया है, बल्कि धीरे-धीरे यह असंभव जैसा लगने लगा है. बड़े शहरों के किसी भी मध्यम वर्गीय परिवार से बात करके देखिए, आपको एक जैसी ही चिंता सुनने को मिलेगी. “हम ठीक-ठाक कमा तो लेते हैं, लेकिन क्या वाकई अब हम एक घर खरीदने का खर्च उठा सकते हैं.” जो घर कभी बजट में लगते थे, वे अब हर बीतते साल के साथ पहुंच से और दूर होते जा रहे हैं.

इस स्थिति को और अधिक चिंताजनक बनाने वाली बात यह है कि समस्या सिर्फ बढ़ती कीमतों तक सीमित नहीं है. असली मुद्दा यह है कि बाजार से किफायती घर चुपचाप गायब होते जा रहे हैं और इस उद्योग के दिग्गजों का कहना है कि यह संकट अब पहले से कहीं अधिक गहरा हो चुका है.

दिग्गज रियल एस्टेट डेवलपर निरंजन हिरानंदानी का मानना है कि भारत का किफायती आवास क्षेत्र अब तक के अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है. उन्होंने कहा, "रियल एस्टेट में अपने 45 से अधिक वर्षों के अनुभव में, मैंने किफायती आवास क्षेत्र में कभी इतनी भारी गिरावट नहीं देखी." उनकी इस चिंता को नजरअंदाज करना नामुमकिन है.

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'एनारॉक रिसर्च' (ANAROCK Research) के आंकड़ों के अनुसार, बाजार में किफायती घरों की हिस्सेदारी तेजी से घटी है. जो हिस्सेदारी 2019 में 38% थी, वह 2025 में गिरकर सिर्फ 18% रह गई है. यह कोई अस्थायी मंदी नहीं है. विशेषज्ञ इसे एक ढांचागत समस्या के रूप में देख रहे हैं, जिसे यदि नजरअंदाज किया गया तो यह और गंभीर हो सकती है. हिरानंदानी चेतावनी देते हैं कि यदि आम परिवारों के लिए घर खरीदना पहुंच से बाहर हो गया, तो भारत की बड़ी आर्थिक सफलता की कहानी पूरी नहीं हो सकती. 

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उन्होंने कहा, भारत की विकास गाथा तब तक अधूरी है जब तक कि हर आय वर्ग के लिए घर खरीदना पहुंच में न रहे. अब रेंटल हाउसिंग और मजबूत सार्वजनिक-निजी भागीदारी सहित नए और इनोवेटिव समाधान तलाशने का समय आ गया है."

किफायती घरों की भारी किल्लत

मांग मौजूद है  लेकिन सप्लाई खत्म हो रही है

दिलचस्प बात यह है कि यह संकट इसलिए नहीं है क्योंकि लोगों ने किफायती घर खरीदना बंद कर दिया है. हकीकत तो यह है कि इसकी मांग आज भी मजबूत बनी हुई है. बड़ी समस्या सप्लाई की है. 'एनारॉक कैपिटल' (ANAROCK Capital) के मैनेजिंग डायरेक्टर और कॉर्पोरेट फाइनेंस के हेड, विशाल श्रीवास्तव का कहना है कि भारत इस समय आवास की भारी कमी से जूझ रहा है. उन्होंने कहा, "मजबूत मांग के बावजूद, किफायती आवास क्षेत्र को पर्याप्त फंड नहीं मिल पा रहा है और इसके लिए समर्पित पूंजी ढांचे की जरूरत है."

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आंकड़े एक चिंताजनक कहानी बयां करते हैं. विशाल श्रीवास्तव ने बताया कि भारत में इस समय शहरी आवासों की कमी लगभग 1 करोड़  यूनिट्स की है, और देश को 2030 तक कम से कम 2.5 करोड़ किफायती घरों की आवश्यकता हो सकती है. इसके बावजूद, सप्लाई बिल्कुल उल्टी दिशा में जा रही है. उन्होंने समझाया, "40 लाख रुपये से कम कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी 2026 की पहली तिमाही (Q1 2026) में नए लॉन्च हुए प्रोजेक्ट्स में घटकर सिर्फ 10% रह गई, जो 2021 में 26% थी."

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दूसरी ओर, लग्जरी और प्रीमियम घरों के बाजार में तेजी से उछाल आया है, उन्होंने आगे कहा, "प्रीमियम हाउसिंग में भारी बढ़त देखी गई है, जहां 1.5 करोड़ रुपये से अधिक कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी नए लॉन्च हुए कुल प्रोजेक्ट्स में 53% रही है. 

डेवलपर्स किफायती घरों से दूरी क्यों बना रहे हैं?

किफायती आवास सामाजिक रूप से भले ही महत्वपूर्ण लगता हो, लेकिन वित्तीय रूप से डेवलपर्स के लिए इसे सही ठहराना मुश्किल होता जा रहा है, किफायती आवास परियोजनाओं पर मुनाफा अक्सर केवल 10-12% के आसपास ही सीमित रहता है. दूसरी ओर, प्रीमियम या लग्जरी प्रोजेक्ट्स 25-30% या उससे भी अधिक का रिटर्न दे सकते हैं.

डेवलपर्स के लिए, इस गणित को नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है. शहरों में जमीनों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं. स्टील और सीमेंट जैसी निर्माण सामग्री लगातार महंगी बनी हुई है. कुशल मजदूरों की लागत बढ़ गई है और प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिलने की प्रक्रियाओं में अक्सर लंबा समय लगता है. जब लागत बढ़ती है लेकिन बिक्री की कीमतें एक सीमित दायरे में बंधी रहती हैं, तो मुनाफा और कम हो जाता है. नतीजतन, कई डेवलपर्स ने अपना ध्यान प्रीमियम हाउसिंग की ओर लगा लिया है, जहां रिटर्न अधिक है और जोखिम कम महसूस होता है.

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'किफायती' की परिभाषा अब किफायती नहीं लगती

एक और समस्या है जो चुपके से इस मामले को और बिगाड़ रही है. सरकारी नीतियों में तय की गई परिभाषाएं जमीनी हकीकत के साथ तालमेल बिठाने में संघर्ष कर रही हैं. किफायती आवास के लिए तय की गई अधिकतम सीमा अभी भी 45 लाख रुपये ही है. यह वो सीमा है जो सालों पहले तय की गई थी, लेकिन आज कई शहरों में, शहर के बाहरी इलाकों में भी घरों की कीमत इससे कहीं ज्यादा है.

'एनारॉक ग्रुप' के चेयरमैन अनुज पुरी ने बताया कि मुंबई के बाहरी क्षेत्रों में भी एक 600 वर्ग फुट के अपार्टमेंट की कीमत अब 60 से 75 लाख रुपये के बीच है. बेंगलुरु और दिल्ली-एनसीआर में भी कीमतें नीतिगत परिभाषाओं से पूरी तरह कटी हुई हैं. जो कागज पर "किफायती" की श्रेणी में आता है, वह असल जिंदगी में अब किफायती नहीं लगता.

इस विसंगति ने डेवलपर्स के लिए मिलने वाले प्रोत्साहनों को भी कम कर दिया है, पहले मिलने वाले टैक्स लाभ, जो किफायती आवास परियोजनाओं को बढ़ावा देते थे, अब खत्म हो चुके हैं, जिससे ऐसे डेवलपर्स के लिए वित्तीय आकर्षण कम हो गया है. एक ऐसा संकट जो भारत की विकास गाथा को प्रभावित कर सकता है. किफायती आवास का मुद्दा सिर्फ रियल एस्टेट तक सीमित नहीं है, यह रोजगार, प्रवासन, पारिवारिक बचत और यहां तक कि शहरी विकास को भी प्रभावित करता है.

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जब घर पहुंच से बाहर हो जाते हैं, तो परिवार या तो घर खरीदना टाल देते हैं, अपने कार्यस्थलों से बहुत दूर रहने चले जाते हैं या सालों तक किराया देते रहते हैं. वह वित्तीय दबाव चुपचाप रोजमर्रा की जिंदगी को बदल देता है. बड़ी चिंता यह है कि यदि घर खरीदने की इच्छा रखने वाले एक बड़े वर्ग को बाजार की बढ़ती कीमतों के कारण बाहर कर दिया जाए, तो क्या भारत अपनी आर्थिक वृद्धि को बरकरार रख पाएगा?

(रिपोर्ट- जैसमीन आनंद)
 

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