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जवानी में घर के लिए लिया गया होम लोन, बुढ़ापे में न बन जाए बोझ!

प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ अब लोन चुकाने की अवधि भी लंबी होती जा रही है. भविष्य में सैलरी बढ़ने की उम्मीदों के दम पर बड़े-बड़े लोन लिए जा रहे हैं. यही वजह है कि अब रिटायरमेंट की उम्र और होम लोन की किश्तें एक-दूसरे के आड़े आने लगी हैं.

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होम लोन लेते समय मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी गलतियां (Photo-ITG)
होम लोन लेते समय मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी गलतियां (Photo-ITG)

एक दौर था जब घर खरीदना सालों की बचत के बाद ही मुमकिन हो पाता था. लोग सालों तक पैसे जोड़ते थे, अपनी हैसियत के हिसाब से खरीदारी करते थे और ऐसा होम लोन लेते थे, जिसे रिटायरमेंट से पहले आसानी से चुकाया जा सके. लेकिन आज के दौर में सफर बिल्कुल अलग नजर आने लगा है.

भारत के बड़े शहरों में, घर खरीदार अब अपने घर की तलाश इस बात से शुरू नहीं करते कि वे कितना खर्च कर सकते हैं, बल्कि वे बैंकों से यह पूछ रहे हैं कि उन्हें कितना लोन मिल सकता है. इसका जवाब न केवल यह तय करता है कि वे कौन सा घर खरीदेंगे, बल्कि यह भी तय कर देता है कि उनके अगले 20 से 30 सालों की कमाई का कितना हिस्सा पहले से ही कर्ज चुकाने में बंध चुका है. 

जैसे-जैसे कई शहरी केंद्रों में प्रॉपर्टी की कीमतें आमदनी के मुकाबले तेजी से बढ़ रही हैं, घर खरीदने के सपने को अब लंबे लोन टेन्योर, बड़े मॉर्गेज, दोहरी आमदनी वाले परिवारों और भविष्य की उस कमाई के सहारे पूरा किया जा रहा है जो अभी होनी बाकी है.

नतीजतन, अर्थशास्त्रियों, पर्सनल फाइनेंस एक्सपर्ट्स और रियल एस्टेट प्रोफेशनल्स के बीच एक चिंता लगातार बढ़ रही है. क्या भारतीय घर उन पैसों से खरीद रहे हैं जो उनके पास आज हैं, या उन पैसों से खरीद रहे हैं, जिन्हें वे अगले तीन दशकों में कमाने की उम्मीद करते हैं?

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एफोर्डेबिलिटी से एलिजिबिलिटी तक

इस बदलाव का सबसे साफ संकेत इस बात से मिलता है कि आज लोग घर कैसे पसंद कर रहे हैं. कुछ साल पहले तक, खरीदार आमतौर पर पहले प्रॉपर्टी चुनते थे, एक आरामदायक बजट तय करते थे और फिर उसी हिसाब से लोन लेते थे. आज बड़ी संख्या में खरीदार इस प्रक्रिया की शुरुआत बैंकों से यह पूछकर करते हैं कि वे अधिकतम कितने लोन के योग्य हैं, और फिर उस लोन क्षमता के दायरे में घर तलाशते हैं.

एएआरई कंसल्टिंग के फाउंडर, प्रत्युष पांडे कहते हैं- 'यह ट्रेंड मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में पहली बार घर खरीदने वालों के बीच विशेष रूप से देखा जा रहा है. अब ध्यान 'एफोर्डेबिलिटी-लेड बाइंग' से हटकर 'एलिजिबिलिटी-लेड बाइंग' पर आ गया है."

वित्तीय सलाहकारों का कहना है कि यह अंतर भले ही मामूली लगे, लेकिन यह भारतीय परिवारों के जीवन के सबसे बड़े वित्तीय फैसले के तरीके को बदल रहा है. सेबी (SEBI) रजिस्टर्ड इन्वेस्टमेंट एडवाइजर और 'सहज मनी' के फाउंडर अभिषेक कुमार कहते हैं कि कई खरीदार बैंक द्वारा दिए जाने वाले लोन और अपनी वास्तविक खर्च करने की क्षमता के बीच भ्रमित हो जाते हैं. सबसे आम गलती अधिकतम बैंक लोन एलिजिबिलिटी को खुद की असली एफोर्डेबिलिटी समझ लेना है.

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30 साल का होम लोन अब सामान्य क्यों बन रहा है?

इस बदलाव के पीछे की वजह सीधी है घरों को खरीद पाना अब मुश्किल होता जा रहा है. इन्फॉरमेरिक्स रेटिंग्स (Infomerics Ratings) के चीफ इकोनॉमिस्ट डॉ. मनोरंजन शर्मा के अनुसार, कई भारतीय शहरों में हाउसिंग एफोर्डेबिलिटी में भारी गिरावट आई है. वे बताते हैं कि बड़े शहरों में प्राइस-टू-इनकम रेशियो अब 7 से 10 के बीच है, जबकि वैश्विक स्तर पर स्वीकृत एफोर्डेबिलिटी बेंचमार्क 5 से नीचे का है.

डॉ. शर्मा कहते हैं, "लगातार बढ़ती कीमतें और उसके मुकाबले रुकी हुई या मामूली वेतन वृद्धि, परिवारों को अपनी जमा पूंजी के बजाय बड़े लोन पर निर्भर होने के लिए मजबूर कर रही हैं. " उनका तर्क है कि यह स्थिति घर के मालिकाना हक के मूल स्वरूप को ही बदल रही है.

वर्तमान प्राइस-टू-इनकम रेशियो को देखते हुए मानक 10-15 साल के लोन अब व्यावहारिक नहीं रह गए हैं, यही वजह है कि लोग अब मजबूरन 20-30 साल के लंबे लोन की तरफ बढ़ रहे हैं.

डॉ. शर्मा की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी यह है कि घरों को वास्तविक कीमत-आमदनी के तालमेल से नहीं, बल्कि समय बढ़ाकर किफायती बनाया जा रहा है. दूसरे शब्दों में कहें तो, घर वास्तव में सस्ते नहीं हो रहे हैं, बस उनके भुगतान को एक बहुत लंबी अवधि में फैलाया जा रहा है. प्रत्युष पांडे भी जमीन पर इसी ट्रेंड को देख रहे हैं. वे कहते हैं, "कई घर खरीदार अब ऊंची लोन-टू-वैल्यू रेशियो 25 से 30 साल तक की लंबी पुनर्भुगतान अवधि और पति-पत्नी दोनों की संयुक्त आमदनी पर निर्भरता बढ़ाकर इस अंतर को पाट रहे हैं.

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इकोनॉमिक सर्वे (Economic Survey) के अनुमानों के अनुसार, भारत का हाउसिंग फाइनेंस मार्केट बढ़कर करीब 37 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो यह दर्शाता है कि घर खरीदने में कर्ज की भूमिका कितनी तेजी से बढ़ रही है.

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घर निगल रहा है फाइनेंशियल प्लान

इसके परिणाम सिर्फ हाउसिंग सेक्टर तक सीमित नहीं हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारी EMI की सबसे बड़ी छिपी हुई लागत यह है कि यह परिवार के अन्य वित्तीय लक्ष्यों पर भारी दबाव डालती है. अभिषेक कुमार के अनुसार, आदर्श रूप से होम लोन की EMI किसी परिवार की कुल मासिक शुद्ध आमदनी के 30% से 35% से अधिक नहीं होनी चाहिए, लेकिन तेजी से खरीदार इस लक्ष्मण रेखा को पार कर रहे हैं.

वे कहते हैं, "कई खरीदार बैंक की लोन सीमाओं को पूरा करने के लिए अपनी मासिक टेक-होम सैलरी का 40% से 50% या उससे अधिक हिस्सा EMI में दे रहे हैं." इसके बाद अन्य चीजों के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है. कुमार बताते हैं, "परिवार अक्सर अपने निवेश की योजनाओं को रोक देते हैं या कम कर देते हैं, अपने रिटायरमेंट फंड को बढ़ाना बंद कर देते हैं और छह महीने का इमरजेंसी बफर भी नहीं बना पाते, क्योंकि घर की EMI उनके पूरे निवेश योग्य सरप्लस को खा जाती है.

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जब रिटायरमेंट की उम्र में भी चलता रहेगा होम लोन

कई खरीदारों के लिए सबसे बड़ा जोखिम आज की EMI नहीं, बल्कि कल की EMI है. जैसे-जैसे लोन की अवधि 25 और 30 साल तक खिंच रही है, कर्जदारों की एक बड़ी संख्या ऐसी होगी जो रिटायरमेंट की उम्र में भी घर का कर्ज चुका रही होगी. यह बात अर्थशास्त्रियों और वित्तीय योजनाकारों दोनों को चिंतित कर रही है. डॉ. शर्मा कहते हैं, "जब होम लोन रिटायरमेंट की उम्र तक खिंच जाता है, तो यह रिटायरमेंट के बाद की कम और अक्सर अनिश्चित आमदनी से टकराता है.

पेंशन या रिटायरमेंट की बचत से EMI चुकाने के कारण बुजुर्गों के पास स्वास्थ्य सेवा और रोजमर्रा के जीवन यापन के खर्चों के लिए पैसे कम पड़ जाते हैं. 
 

(रिपोर्ट-सोनू विवेक)

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