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कितनी बार जाना है ऑफिस? इस सवाल ने बदला घर खरीदने का ट्रेंड

भारत के हाउसिंग मार्केट का अगला दौर सिर्फ ऑफिस की दूरी से तय नहीं होगा, बल्कि इस बात से तय होगा कि लोग अपने काम, ज़िंदगी और समय के बीच कैसा संतुलन बनाते हैं.

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अब ऑफिस की दूरी नहीं, 'वर्क फ्रॉम होम' तय कर रहा प्रॉपर्टी मार्केट (Photo-ITG)
अब ऑफिस की दूरी नहीं, 'वर्क फ्रॉम होम' तय कर रहा प्रॉपर्टी मार्केट (Photo-ITG)

भारत के प्रॉपर्टी मार्केट में अगला बड़ा बदलाव कीमतों, सरकारी नियमों या नए प्रोजेक्ट्स की वजह से नहीं, बल्कि एक बहुत ही आम चीज़ से आने वाला है और वो है ऑफिस आने-जाने का सफर. आजकल 'वर्क फ्रॉम होम' और 'फ्लेक्सिबल टाइमिंग्स' की चर्चा फिर से ज़ोर पकड़ रही है, और लोग बेकार के सफर से बचना चाह रहे हैं. इस वजह से रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऑफिस का महत्व अब पहले जैसा नहीं रहा, वह धीरे-धीरे बदल रहा है और सीधी सी बात है, जब ऑफिस जाने की मजबूरी बदलेगी, तो घर कहां खरीदना या किराए पर लेना है, इसके बारे में लोगों की सोच भी बदल जाएगी.

यह कोई नई बात नहीं है, कुछ ही साल पहले, वर्क फ्रॉम होम ने हमारे घरों का पूरा रूप ही बदल दिया था, घर ही ऑफिस, बच्चों के क्लासरूम और लाइफस्टाइल के ठिकाने बन गए थे. इसके बाद जो हुआ, वह सिर्फ एक अस्थायी तालमेल नहीं था, बल्कि घर खरीदारों की सोच में आया एक बहुत बड़ा बदलाव था. लेकिन इस बार फर्क यह है कि यह बदलाव ज्यादा नपा-तुला और हमेशा के लिए रहने वाला हो सकता है.

एनरॉक (ANAROCK) के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 की पहली तिमाही (Q1 2026) में भारत के टॉप सात शहरों मुंबई (MMR), दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और कोलकाता में घरों की बिक्री पिछले साल के मुकाबले करीब 7 से 9% बढ़ी है, और यह आंकड़ा 1.01 लाख यूनिट्स को पार कर गया है. यह दिखाता है कि काम के तौर-तरीके और आने-जाने की हकीकत बदलने के बाद भी घरों की बुनियादी मांग मजबूत बनी हुई है.

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लेकिन इस स्थिरता के पीछे, लोगों के फैसला लेने का तरीका अब धीरे-धीरे बदल रहा है. पहले घर खरीदते समय सीधा सा सवाल होता था. यहां से ऑफिस कितना पास है? आज यह सवाल बदलकर यह हो रहा है "मुझे आखिर कितनी बार ऑफिस जाने की ज़रूरत है? सिर्फ इस एक सोच ने घर खरीदने के पूरे गणित को बदलना शुरू कर दिया है. 

ऑफिस की दूरी के बजाय बेहतर लाइफस्टाइल को प्राथमिकता

अगर अब रोज-रोज ऑफिस जाना ज़रूरी नहीं रह गया है, तो ऑफिस के पास घर लेने की मजबूरी भी धीरे-धीरे कम होने लगी है. ऐसा नहीं है कि यह ज़रूरत बिल्कुल खत्म हो गई है, लेकिन अब इसके सामने दूसरी ज़रूरतें ज़्यादा बड़ी हो गई हैं. जैसे घर में कितनी जगह है, घर का नक्शा कैसा है, और वहां रहने का स्तर कैसा है.

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इसके साथ ही, रोज-रोज ऑफिस आने-जाने का खर्च भी अब साफ दिखने लगा है. सफर में लगने वाला लंबा समय, ईंधन  का बढ़ता खर्च और सड़कों का भारी जाम अब यह सिर्फ एक परेशानी नहीं रह गए हैं, बल्कि लोग अब इसके आधार पर अपने बजट और लाइफस्टाइल का तालमेल बिठा रहे हैं.

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नतीजा यह है कि लोग अब सिर्फ ऑफिस के चक्कर में घर नहीं खरीद रहे, बल्कि एक अच्छी और आरामदायक लाइफस्टाइल के लिए घर चुन रहे हैं.

खरीदारों की पसंद में आ सकता है यह बदलाव

यह बदलाव इस बात से साफ दिखेगा कि खरीदार अब घर में क्या ढूंढ रहे हैं. घर में ज़्यादा जगह होना फिर से पहली पसंद बन सकता है, लेकिन इस बार इसके पीछे एक सही वजह होगी. खरीदार अब सिर्फ बड़ा घर नहीं चाहते, बल्कि ऐसा प्रैक्टिकल घर चाहते हैं जहां बिना किसी खलल के ऑफिस का काम किया जा सके, जो उनकी ज़रूरतों के हिसाब से बदल सके और लंबे समय तक काम आए.

इसके साथ ही, ऑफिस से घर की दूरी का दायरा भी बढ़ सकता है. जब हफ्ते में सिर्फ कुछ ही दिन ऑफिस जाना हो, तो लोग बड़ा घर, बेहतर सोसायटी या अच्छा माहौल पाने के लिए ऑफिस से थोड़ी ज़्यादा दूरी पर भी घर लेने को तैयार हैं.

कहां बढ़ेगी प्रॉपर्टी की डिमांड?

लोगों की इस बदलती सोच के कारण, अब प्रॉपर्टी की डिमांड उन इलाकों से बाहर निकलने लगेगी जो सिर्फ ऑफिसों के आस-पास बसे हैं. मुख्य शहरों के बाहरी इलाके हर सुविधा से लैस बड़ी टाउनशिप्स और प्लॉट्स की मांग में आने वाले समय में अच्छी तेज़ी देखने को मिल सकती है. 

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इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि टियर-2 शहर एक बार फिर चर्चा में आ सकते हैं. किसी अस्थायी विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिकने वाले एक मजबूत विकल्प के तौर पर. बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और बढ़ती आर्थिक गतिविधियों के कारण, ये शहर अब वहां रहने और काम करने वाले लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने में ज़्यादा सक्षम हैं. काम करने का यह लचीला अंदाज़ छोटे शहरों के पक्ष को और मजबूत करता है.

बिल्डर्स के नज़रिए से देखें तो यह बदलाव अब व्यावहारिकता की तरफ एक कदम है. नए प्रोजेक्ट्स अब सिर्फ दिखावे के बजाय इस्तेमाल की सहूलियत पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित कर सकते हैं, यानी ऐसे घर जो केवल दिखने में अच्छे न हों, बल्कि रोजमर्रा की ज़िंदगी के हिसाब से आरामदायक हों. इसमें फ्लेक्सिबल लेआउट, घर से काम करने के लिए अनुकूल जगह और ऐसी सोसायटियां शामिल हैं, जहां घर पर ज़्यादा समय बिताने के लिए हर ज़रूरी सुविधा मौजूद हो, इसके अलावा, बिल्डर्स का ध्यान अब सिर्फ 'प्रीमियम' दिखाने या अंधाधुंध नए प्रोजेक्ट्स शुरू करने के बजाय, बजट के सही तालमेल और समय पर काम पूरा करके देने पर होगा.

यह रिपोर्ट पहले इंडिया टुडे पर पब्लिश हुई थी, जिसे बेसिक होम लोन के को-फाउंडर और सीईओ अतुल मोंगा ने लिखा है.

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