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मौज-मस्ती के लिए कर्ज़ भरोसे Gen-Z, बन रही है Debt जेनरेशन

नई पीढ़ी अब दुनिया को अपने हिसाब से चलना सीखा रही है, कहीं पर सरकार बना रही है तो कहीं सरकार गिरवा भी रही है. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यही जेन-ज़ी खुद के जीवन को संवार नहीं पा रही है और रोज़मर्रा की चीज़ों के लिए कर्ज़ पर निर्भर हो रही है.

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Gen-Z Loan
Gen-Z Loan

शायरों के शायर मिर्ज़ा ग़ालिब शराब के शौकीन थे, शौकीन ऐसे कि किसी भी हद तक जा सकें, तभी उनका एक किस्सा मशहूर है कि वो गधों पर लादकर मेरठ से दिल्ली तक शराब लाए थे, ग़ालिब पर पैसा नहीं था लेकिन पीते वो भी फिर भी थे, तभी उनका शेर मशहूर है कि 

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां, 
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन. 


ग़ालिब जैसा ही कुछ हाल जेन-ज़ी का भी है, जहां मामला भले ही शराब का ना हो, लेकिन मौजूदा लाइफस्टाइल का है. 

पिछली पीढ़ियों (अब तो हमारी ही मानकर चलें) को लगता है कि जेन-ज़ी सिर्फ 'स्क्रीन एडिक्शन', 'अजीबोगरीब फैशन' और 'वर्क-लाइफ बैलेंस' के नाम पर काम से जी चुराने के लिए बदनाम है. लेकिन अब मम्मी-पापा और दादा-दादी की टेंशन के पिटारे में एक नया और ज्यादा गंभीर मुद्दा जुड़ गया है—कर्ज़ का ऐसा पहाड़, जिसे यह पीढ़ी अपनी सैलरी से नहीं, बल्कि एक और कर्ज़ लेकर पाट रही है. जिसे दुनिया 'डिजिटल नेटिव' पीढ़ी कहती थी, वह अब 'डेब्ट नेटिव' (कर्ज़ में डूबी हुई जेनरेशन) बनती जा रही है.

यह पीढ़ी अपनी जेब के हिसाब से नहीं, बल्कि अपनी 'फीड' के हिसाब से जी रही है. क्यूंकि सारा प्रेशर सेविंग, फ्यूचर का नहीं बल्कि लाइफस्टाइल को मेंटेन करने का है.

जेन-ज़ी का रियल मंत्र 'यू ओनली लिव वन्स' (YOLO) है, लेकिन इस चक्कर में वो भूल रहे हैं कि बिल भी सिर्फ एक ही बार आता है. GWI की लेटेस्ट कंज्यूमर रिपोर्ट बताती है कि जेन-ज़ी पुरानी पीढ़ियों की तुलना में सोशल मीडिया से 30% अधिक प्रभावित होकर खरीदारी करती है. उनके लिए शॉपिंग अब ज़रूरत नहीं, बल्कि एक 'डोपामाइन हिट' है.

दिक्कत तब शुरू होती है जब यह 'हिट' क्रेडिट कार्ड या BNPL (Buy Now Pay Later) के जरिए लिया जाता है. CRIF High Mark की एक रिपोर्ट ये बताती है कि भारत में 'स्मॉल टिकट पर्सनल लोन' (50,000 रुपये से कम) लेने वालों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी 18 से 30 साल के युवाओं की है. यह वो कर्ज़ है जो किसी बिजनेस या घर के लिए नहीं, बल्कि लेटेस्ट स्नीकर्स, आईफोन या किसी म्यूजिक फेस्टिवल की टिकट के लिए लिया जा रहा है. यही हाल नो-कोस्ट ईएमआई का होता है, जो नई पीढ़ी के लिए एक जाल की तरह बनता जा रहा है.

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की दिसंबर 2025 की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट (FSR) साफ तौर पर वॉर्निंग दे रही है कि Unsecured Loans की ग्रोथ रेट खतरनाक स्तर पर है. रिपोर्ट बताती है कि युवा लोन तो ले रहे हैं, लेकिन उनकी 'रीपेमेंट कैपेसिटी' (कर्ज़ चुकाने की क्षमता) संदिग्ध है. RBI की रिपोर्ट इस बात पर मुहर लगाती है कि बैंकों को अब इन छोटे-छोटे लोन्स पर लगाम लगानी होगी, वरना भविष्य में बड़ा वित्तीय संकट खड़ा हो सकता है.

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मध्यम वर्ग के लिए कर्ज़ कभी 'शर्म' की बात होती थी, लेकिन आज यह 'स्टेटस सिंबल' है. TransUnion CIBIL के डेटा के मुताबिक, पहली बार कर्ज़ लेने वाले ग्राहकों में युवाओं की तादाद सबसे ज्यादा है. चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से एक बड़ी आबादी उस 'डेट ट्रैप' में फंस रही है जहां एक क्रेडिट कार्ड का बिल भरने के लिए दूसरे ऐप से लोन लिया जा रहा है.

Prerak (Medium) के एनालिसिस में एक कड़वा सच सामने आया है: जेन-ज़ी 'लाइफस्टाइल' के लिए कर्ज लेकर उसे 'सर्वाइवल' की जरूरत बता रही है. उनके लिए एक महंगा स्मार्टफोन या कैफे की कॉफी अब 'लक्जरी' नहीं, बल्कि समाज में टिके रहने की 'अनिवार्यता' बन गई है. यह 'एस्पिरेशनल क्लास' अपनी असलियत से कोसों दूर एक काल्पनिक दुनिया को मेंटेन करने के चक्कर में अपनी भविष्य की बचत की बलि दे रही है.

पुरानी पीढ़ी घर बनाने या बच्चों की शिक्षा के लिए कर्ज लेती थी—यानी 'एसेट' बनाने के लिए. इसके उलट, जेन-ज़ी 'डेप्रिसिएटिंग एसेट्स' (ऐसी चीजें जिनकी वैल्यू घटती है) के लिए उधार ले रही है. कपड़े, गैजेट्स और छुट्टियां—इनका आनंद कुछ दिन रहता है, लेकिन इनकी EMI सालों साल चलती है.

अगर डेटा को गहराई से देखें, तो ICE 360 Survey के कुछ संकेत बताते हैं कि भारतीय परिवारों की बचत दर पिछले कुछ दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. जब युवा पीढ़ी अपनी आय का 40-50% हिस्सा केवल ब्याज और लोन की किस्तों में देगी, तो वह देश की अर्थव्यवस्था में उत्पादक निवेश कैसे करेगी?

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ये पीढ़ी 'इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन' की शिकार है. उन्हें हर चीज अभी और इसी वक्त चाहिए. फिनटेक कंपनियों ने '2 मिनट में लोन' का जो जाल बुना है, उसमें ये युवा सबसे पहले फंस रहे हैं. जैसा कि RBI और बाकी संस्थाएं कह रही हैं कि ये केवल एक पीढ़ी का संकट नहीं है, बल्कि यह बैंकिंग सेक्टर के लिए एक 'टाइम बम' की तरह है.

पुरानी पीढ़ी की 'परेशानी' अब केवल नैतिकता या संस्कारों तक सीमित नहीं है; अब यह डर है कि अगली पीढ़ी आर्थिक रूप से पंगु हो रही है. जेन-ज़ी को यह समझना होगा कि इंस्टाग्राम का 'फिल्टर' बैंक स्टेटमेंट पर नहीं लगता. अगर कर्ज लेने की यह रफ़्तार और वजहें नहीं बदलीं, तो 'फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस' केवल एक हैशटैग बनकर रह जाएगा और हकीकत होगी—ताउम्र किस्तों का बोझ.

यानी कूल दिखना अच्छा है, लेकिन दिवालिया होकर कूल दिखना बेवकूफी है.
 

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