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न RSS का बैकग्राउंड, न BJP से शुरू की राजनीति... 8 साल में कैसे सम्राट पड़े सब पर भारी

बिहार के सियासी इतिहास में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बनने जा रहा है. सम्राट चौधरी के सिर सत्ता का ताज सजने जा रहा है, बीजेपी में आए हुए सम्राट को सिर्फ आठ साल हुए हैं, लेकिन सियासी दौड़ में पार्टी के तमाम दिग्गज नेताओं को भी पीछे छोड़ दिया है. जानिए सम्राट कैसे बने बीजेपी के नए चौधरी.

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बिहार के नए चौधरी बनेंगे सम्राट, जाने कैसे बीजेपी नेताओं पर भारी पड़े (Photo-PTI)
बिहार के नए चौधरी बनेंगे सम्राट, जाने कैसे बीजेपी नेताओं पर भारी पड़े (Photo-PTI)

बिहार की सियासत में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बनने जा रहा है. बीजेपी को दशकों से इस दिन का इंतजार था, वह कई बार सरकार में रही, लेकिन डिप्टीसीएम से आगे नहीं बढ़ पाई थी. नीतीश कुमार के इस्तीफा देने के बाद बीजेपी के सम्राट चौधरी को एनडीए विधायक दल का नेता चुन लिया है, जिसके बाद सत्ता का ताज उनके सिर सजेगा. सम्राट चौधरी बुधवार को 11 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. 

मुख्यमंत्री बनने जा रहे सम्राट चौधरी का न ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का सियासी बैकग्राउंड है और न ही बीजेपी से अपनी राजनीतिक पारी शुरू की. इसके बाद बीजेपी की मिट्टी में सम्राट चौधरी इस तरह फले फूले की बिहार में तमाम बड़े नेताओं पर भारी पड़ गए. 

सम्राट चौधरी ने अपनी राजनीतिक पारी का आगाज लालू प्रसाद यादव की आरजेडी से किया था और जेडीयू से होते हुए 8 साल पहले बीजेपी में एंट्री किए थे. आरजेडी और जेडीयू में रहते हुए सम्राट चौधरी विधायक और मंत्री जरूर बने, लेकिन राजनीतिक बुलंदी बीजेपी में हासिल की. सम्राट जिस तेजी के साथ आगे बढ़े कि तमाम बीजेपी नेताओं को पीछे छोड़ दिया और आज उनके सिर मुख्यमंत्री का ताज सजने जा रहा. 

सम्राट को विरासत में मिली सियासत
सम्राट चौधरी का पहले नाम राकेश कुमार था, लेकिन अब सम्राट हो गया. वो अपने पिता शकुनी चौधरी से विरासत में सियासत मिली. शकुनी चौधरी बिहार की सियासत ओबीसी चेहरा रहे. वो कांग्रेस से लेकर समता पार्टी, जेडीयू और आरजेडी तक में रहे. विधायक से लेकर लोकसभा सांसद तक का सफर तय किया. सम्राट चौधरी अपने पिता शकुनी चौधरी के राजनीतिक ताकत के 
सहारे सियासी पिच पर नब्बे दे दशक में उतरे. आरजेडी का दामन थामा और 1999 में रबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बने. 

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रबड़ी देवी सरकार में सबसे युवा मंत्री बनते ही सियासी विवाद हो गया. विपक्ष ने कहा कि वे 25 साल के नहीं हैं.  उम्र के चलते मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन इस विवाद से रातों-रात सम्राट बिहार में मशहूर हो गए और युवाओं के बीच वे एक जाना-माना चेहरा बन गए. 2010 में विधायक बने और आरजेडी के युवा चेहरा बनकर उभरे, जिसके चलते आरजेडी के मुख्य सचेतक बन गए, जिससे उन्हें राजनीतिक पहचान मिली. 

जेडीयू का दामन थामकर मंत्री बने
बिहार के सियासी मिजाज को देखते हुए सम्राट चौधरी ने चार आरजेडी विधायकों के साथ पार्टी छोड़ दी और जेडीयू में एंट्री कर गए. बीजेपी से जेडीयू का गठबंधन टूटने के बाद 2014 में नीतीश कुमार सरकार अल्पमत में थी, जिसमें सम्राट अहम रोल अदा किए थे. सम्राट का यह कदम उन्हें जेडीयू का चौधरी बन दिया था, जिसके बाद मांझी सरकार में मंत्री बने.

जीतन राम मांझी के बाद नीतीश कुमार दोबारा से सीएम बने तो सम्राट चौधरी को कैबिनेट में जगह नहीं मिल सकी. जेडीयू में बहुत ज्यादा राजनीतिक तवज्जे नहीं मिलने से सम्राट कुमार का नीतीश कुमार से सियासी मोहभंग हो गया, जिसके चलते उन्होंने जेडीयू को अलविदा कह दिया. इसके बाद बीजेपी का दामन थामा और फिर पलटकर नहीं देखा. 

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बीजेपी में कैसे आगे बढ़े सम्राट
बीजेपी 2014 के बाद से देश की राजनीति में तेजी से उभरी और यूपी में केशव प्रसाद मौर्य पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने तो सम्राट का भी सियासी मिजाज बदला. यूपी में बीजेपी की सरकार बनते ही सम्राट का मन जेडीयू से हट गया और केशव मौर्य के जरिए से अमित शाह से मुलाकात की. बिहार में बीजेपी को आत्म निर्भर बनने के लिए वोट बैंक बढ़ाने के लिए एक मजबूत कुशवाहा नेता चाहिए था, जिसके लिए सम्राट फिट बैठे.

2017 में बीजेपी का दामन थामा और 2019 में नित्यानंद राय जब पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे तो सम्राट चौधरी को उपाध्यक्ष बनाया गया. इस तरह बीजेपी में उन्हें पहली बार पद मिला, जिसके बाद पार्टी नेतृत्व के साथ उनके रिश्ते मजबूत होने लगे. 2015 में वह चुनाव हार गए थे, जिसके चलते बीजेपी ने उन्हें ओबीसी चेहरे के तौर पर स्थापित करने के लिए विधान परिषद भेजा. 

नीतीश कुमार बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना लिए थे, लेकिन बीजेपी खुद को बिहार में मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला कर चुकी थी. ऐसे में सम्राट को सियासी तौर पर आगे बढ़ाने का काम शुरू हुआ, नीतीश के अगुवाई वाली एनडीए की सरकार में उन्हें पंचायती राज मंत्री भी बनाया गया था. 

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नीतीश के खिलाफ मुरेठा की कसम
नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़कर आरजेडी के साथ मिलकर दोबारा से 2022 में सरकार बनाई थी तो बीजेपी ने उस समय सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाने का फैसला किया, जिसने उनकी राजनीति को सियासी बुलंदी तक पहुंचा दिया. सम्राट चौधरी विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बने. इसके बाद साल 2023 में सम्राट चौधरी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बने तो सम्राट चौधरी ने मुरेठा (पगड़ी) बांधी. उन्होंने नीतीश को हटाने की कसम खाई. 

सम्राट चौधरी के इस आक्रामक तेवर से उन्हें रातों-रात भाजपा का जुझारू चेहरा माना जाने लगा, जिसने उन्हें एक राजनीतिक मजबूत नेता की पहचान दिलाई.  एक निडर और बड़े जननेता के रूप में सम्राट का कद बहुत बढ़ा. बीजेपी ने कोइरी-कुशवाहा समाज को साथ लाने का जिम्मा दिया, जिसे उन्होंने बाखूबी तौर पर निभाया.  नीतीश कुमार के सबसे मजबूत वोटबैंक ‘लव-कुश’ में सेंध लगाने में कामयाब रहे, जिनको बीजेपी के करीब लाए. 

बीजेपी के नए ओबीसी चेहरा बन गए
बिहार के सियासत में सम्राट बीजेपी के कुशल रणनीतिकार और पिछड़े वर्ग के चेहरे के रूप में आगे बढ़े. नीतीश की एनडीए में वापसी पर सम्राट चौधरी को भाजपा कोटे से उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया. उन्होंने रामलला को पगड़ी सौंप दी और नीतीश के सियासी उत्तराधिकारी के तौर पर खुद को मजबूत करने में जुट गए. 

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डिप्टीसीएम रहते हुए सम्राट चौधरी सत्ता के एक मजबूत प्रशासक और भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभरे. इसका नतीजा था कि 
2025 के चुनाव में सम्राट चौधरी विपक्षी दलों के निशाने पर रहे. इसी का नतीजा था कि 2025 की जीत के बाद नीतीश कुमार ने सम्राट को डिप्टीसीएम फिर से बनाया और अघोषित तौर पर अपना ‘उत्तराधिकारी’ बताया. बीजेपी विधायकों ने उन्हें सर्वसम्मति से अपना नेता मान लिया था. 

बीजेपी के नेताओं पर भारी पड़े सम्राट
नीतीश कुमार के सीएम रहते हुए सम्राट चौधरी खुद को उनके सियासी उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाया. बिहार में ओबीसी राजनीति ने भी उन्हें सियासी बुलंदी तक पहुंचाया. तारापुर विधानसभा सीट से जीतकर सम्राट ने अपना सियासी जनाधार साबित कर दिया,उन्हें साबित करना था कि वे जनता में लोकप्रिय हैं, वे नेता-कार्यकर्ताओं आवाज बन रहे थे, जिसे उन्होंने 2025 चुनाव में करके दिखाया. 

सम्राट चौधरी प्रदेश अध्यक्ष और डिप्टीसीएम रहते हुए बिहार में बीजेपी के नेता-कार्यकर्ताओं आवाज बनकर उभरे. इससे बिहार के सर्वोच्च नेता बने. इसी का नतीजा है कि सीएम के रूप में बीजेपी को अपने नेता चुनने की बारी आई तो सम्राट चौधरी सबसे आगे खड़े नजर आए. पहले भाजपा के सीएम के रूप में सम्राट का कद बढ़ गया, क्योंकि बीजेपी ने कई नेताओं को आगे बढ़ाने का काम किया, लेकिन कोई स्थापित नहीं कर सका. 
 

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