अगर आप पूरी तरह जिंदा हों, सांस ले रहे हों, अपने गांव में रह रहे हों... लेकिन सरकारी कागज कह दें कि "आप मर चुके हैं." सुनने में यह किसी फिल्म की कहानी लग सकती है, लेकिन भोजपुर के आरा प्रखंड के पिरौटा गांव के 82 वर्षीय ढोड़ा राम की जिंदगी का यही सबसे बड़ा सच बन गया है. उम्र के इस पड़ाव पर, जब इंसान को दो वक्त की रोटी और थोड़ा सम्मान चाहिए, तब ढोड़ा राम पिछले तीन महीनों से लाठी के सहारे बैंक और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं... सिर्फ इसलिए कि सिस्टम उन्हें फिर से "जिंदा" मान ले.
मजदूरी के दौरान पैर टूटा
करीब 20 साल पहले मजदूरी के दौरान उनका पैर टूट गया था. उसमें रॉड लगानी पड़ी और तभी से उनकी मेहनत-मजदूरी छूट गई. उनके और उनकी पत्नी के जीवन का एकमात्र सहारा वृद्धावस्था पेंशन थी. लेकिन अचानक पेंशन बंद हो गई. जब वे बैंक पहुंचे तो पता चला कि पैसा खाते में आया जरूर है, लेकिन निकलेगा नहीं... क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया है.
जब उन्होंने ऑनलाइन दस्तावेज निकलवाया तो उसमें लिखा था, "सत्यापन के दौरान लाभार्थी मृत पाया गया." यह पढ़कर ढोड़ा राम की आंखों से आंसू निकल आए. उनका सवाल सिर्फ इतना था, "जब मैं आपके सामने खड़ा हूं... तो कागजों में कैसे मर गया?"
तीनों बेटियां शादीशुदा, कोई बेटा नहीं
ढोड़ा राम का कोई बेटा नहीं है. उनकी तीनों बेटियां शादीशुदा हैं और अपनी आर्थिक परेशानियों के बावजूद बारी-बारी से गांव आकर माता-पिता का सहारा बनती हैं. बरसात में टपकती झोपड़ी, चचरी पर गुजरती रातें और चूल्हे पर किसी तरह पकता भोजन... यही उनकी दुनिया है. अब पेंशन बंद होने से दो वक्त की रोटी का भी संकट खड़ा हो गया है.
सबसे दर्दनाक बात यह है कि कई दफ्तरों में उन्हें यही कहा गया, "पहले जिंदा होने का प्रमाण लेकर आइए." यानी जो बुजुर्ग अपने पैरों पर मुश्किल से खड़ा हो पा रहा है, उसे अपनी सांसों का भी सबूत देना पड़ रहा है. गांव के लोगों ने मामला जिलाधिकारी कार्यालय तक पहुंचाया, जिसके बाद प्रशासन हरकत में आया.
विकास पदाधिकारी ने क्या कहा?
आरा सदर के प्रखंड विकास पदाधिकारी रवी रंजन कुमार ने बताया कि मामले की जानकारी मिलते ही आवश्यक कार्रवाई शुरू करा दी गई है. प्रारंभिक जांच में पता चला है कि यह गड़बड़ी पंचायत स्तर पर सत्यापन के दौरान हुई. संबंधित विकास मित्र को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. साथ ही ढोड़ा राम का आवेदन आगे भेज दिया गया है. जल्द ही उनकी वृद्धावस्था पेंशन दोबारा शुरू कर दी जाएगी.
उम्मीद है कि ढोड़ा राम को फिर से पेंशन मिलने लगेगी, लेकिन यह मामला एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है. क्या किसी गरीब और बुजुर्ग की पहचान सिर्फ सरकारी फाइलों तक सीमित है? अगर कागज की एक गलती किसी जीवित इंसान को "मृत" बना सकती है, तो ऐसी गलती की कीमत आखिर कौन चुकाएगा? क्योंकि ढोड़ा राम को सिर्फ पेंशन नहीं चाहिए... उन्हें अपने जिंदा होने का सम्मान भी चाहिए.