देश के कई हिस्सों में एलपीजी गैस की कमी को लेकर लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. कई शहरों में गैस सिलेंडर के लिए लंबी कतारें लग रही हैं और होटल-रेस्टोरेंट तक प्रभावित हो रहे हैं, लेकिन बिहार के गया जिले का एक गांव इस संकट के बीच आत्मनिर्भरता की अनोखी मिसाल पेश कर रहा है.
गया जिले के बोधगया प्रखंड स्थित बतसपुर गांव में ग्रामीण पिछले कई सालों से गोबर गैस के जरिए अपने घरों में खाना बना रहे हैं. यहां लोहिया स्वच्छ अभियान और गोबरधन योजना के तहत गांव में गोबर गैस प्लांट लगाया गया है. इस प्लांट से पाइपलाइन के माध्यम से पूरे गांव के घरों तक गैस पहुंचाई जाती है, जिससे महिलाएं रोजाना अपने परिवार के लिए खाना बनाती हैं.
‘गोबर गैस’ से जलते हैं चूल्हे
गांव में खास बात यह है कि हर घर के बाहर गोबर गैस का मीटर लगा हुआ है, जिससे यह पता चलता है कि किस घर में कितनी गैस का इस्तेमाल हुआ. ग्रामीणों से गैस के बदले गोबर लिया जाता है और जो लोग नियमित रूप से गोबर देते हैं उन्हें गैस मुफ्त में उपलब्ध कराई जाती है. वहीं जो लोग गोबर नहीं दे पाते, उनसे 25 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से शुल्क लिया जाता है.
गांव की महिला ललिता देवी बताती हैं कि पहले गांव में काफी गंदगी रहती थी और घरों के बाहर गाय का गोबर पड़ा रहता था. लेकिन अब उसी गोबर से गैस बनाकर खाना बनाया जाता है. गैस बनने के बाद बचा हुआ अवशेष खेतों में जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे खेती को भी फायदा होता है.
गोबर से बनती है किचन की गैस
एक अन्य ग्रामीण महिला चंचला कुमारी के अनुसार इस गोबर गैस से खाना बनाना आसान है और इसमें वही स्वाद मिलता है जो पहले लकड़ी के चूल्हे पर बनते खाने में आता था. उनका कहना है कि इस गैस की आंच भी तेज होती है और करीब 30 मिनट में खाना तैयार हो जाता है.
गांव के मुखिया ईश्वर मांझी बताते हैं कि पिछले चार सालों से गांव के करीब 50 घरों में गोबर गैस प्लांट के जरिए गैस की सप्लाई की जा रही है. इससे गांव की महिलाएं धुएं से भी बच गई हैं और गांव में स्वच्छता भी बनी रहती है.
एलपीजी गैस संकट के दौर में गया का यह छोटा सा गांव देश के अन्य गांवों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है कि स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है.