पश्चिम बंगाल में चुनाव का दौर है. रैलियां हो रही हैं और इनमें एक साथ 'विकास, धर्म, पहचान' सब कुछ बचाने-संभालने के दावे भी हो रहे हैं. लेकिन इसी शोर के बीच 14-15 अप्रैल की तारीख चुपचाप एक और कहानी सुनाती है, एक ऐसी कहानी, जो सत्ता से भी पुरानी है और राजनीति से भी गहरी. यह कहानी है ‘पोइला बोइशाख’ की. एक ऐसा दिन, जिसे आज बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के तौर पर देखा जाता है, लेकिन जिसकी जड़ें खेतों, खलिहानों और कभी सत्ता के टैक्स सिस्टम तक जाती हैं.
यानी एक त्योहार, जो सिर्फ नववर्ष नहीं- बल्कि इस पूरे इलाके की साझा स्मृति है.
बातें तब की हैं, जब भारत का पूर्वी छोर बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और एक अलग देश बांग्लादेश के तौर पर नहीं बंटा था. ये सब एक ही जमीन का हिस्सा थे. संस्कृति और परंपरा के लिहाज से भी एक ही थे. हालांकि स्थानीय आधार पर और धार्मिक मान्यताओं में अलग-अलग परंपराएं शामिल थीं, लेकिन पूरब की पहचान के तौर पर बहुत सारी बातें एक जैसी थीं, और इनमें से ही एक थी 'पोइला बोइशाख' की परंपरा. यानी बैसाख महीने का पहला दिन.

क्या है पोइला या पहिला बैसाख?
पहिला बैसाख या (पोइला बैसाख) से इसे बिल्कुल ऐसा मत समझिए कि यह बैसाख का पहला दिन है. इसके बजाय ये बंगाली कैलेंडर का पहला दिन है. यह ओडिशा कैलेंडर का भी पहला दिन है और अब बांग्लादेश में बांग्ला परंपरा के कैलेंडर का भी पहला दिन रहा है. इसके लिए 14 और 15 अप्रैल की तारीख तय रही है. क्योंकि इसी दिन सूर्य का मेष राशि में प्रवेश होती है.
फसल कटकर घर आती है और खेत से खलिहान और खलिहान से घर तक के रास्ते में बड़ा ही खुशनुमा उत्सवी माहौल रहता है. भारत में फसलों का दिन और खेती-किसानी से जुड़ी खुशियां अक्सर पारंपरिक होकर पूजा पद्धति से जुड़ जाती हैं, इसलिए 'पहिला बैसाख' की अपनी आस्था है, अपनी पहचान है. पश्चिम बंगाल में इसकी तारीख 15 अप्रैल है, जबकि ओडिशा में ये 13, 14 और 14 अप्रैल तीन दिन का उत्सव बन जाता है, जिसमें 14 अप्रैल की तारीख मुख्य उत्सव का दिन होता है.
बंगाली कैलेंडर की शुरुआत का दिन
बंगाली कैलेंडर का पहला दिन माना जाने वाला पहिला बैसाख आज रंगों, संगीत और पारंपरिक परिधानों से भरे एक बड़े सांस्कृतिक उत्सव के रूप में जाना जाता है, लेकिन इसके इतिहास में इसकी जड़ें सत्ता और टैक्स सिस्टम से भी जुड़ी हैं. 16वीं सदी में मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में इस्लामी हिजरी कैलेंडर प्रचलित था, जो चंद्रमा के चक्र पर आधारित होता है.

लेकिन हिजरी कैलेंडर टैक्स वसूली में समस्याएं पैदा करता था, क्योंकि चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से लगभग 11 दिन छोटा होता है, जिससे हर साल टैक्स वसूली की तारीखें बदलती रहती थीं और धीरे-धीरे खेती के मौसम से उनका तालमेल बिगड़ने लगता था. इस समस्या से निपटने के लिए और एक तय तारीख पर टैक्स वसूलने के लिए भारतीय परंपरा की जड़ें तलाशी गईं. जहां बैसाख का महीना और सूर्य की राशि बदलने की तारीख एक-दूसरे से मेल खाती थी.
जब अकबर ने इस आधार पर बनाया था टैक्स कैलेंडर
तब इस्लामी और हिंदू दोनों परंपराओं के तत्वों को मिलाकर सौर कृषि चक्र के अनुसार 'टैक्स कैलेंडर' को व्यवस्थित किया गया. इससे टैक्स वसूली उस समय संभव हो सकी, जब किसान अपनी फसल काट चुके होते थे और टैक्स पेमेंट करने की स्थिति में होते थे. इस नए कैलेंडर के पहले दिन, यानी बैशाख के पहले दिन, को हिसाब-किताब निपटाने का समय तय किया गया. इस तरह सदियों की एक धार्मिक मान्यता और परंपरा सत्ता के लिए भी एक बेहद जरूरी दिन बन गई और इस तरह ये उत्सव और बड़ा हो गया.

बाद के दिनों में बाजारों में जो 'हाल खाता' की परंपरा शुरू हुई उसे भी साल में दो बार छह महीने पर अपडेट करना आसान बन गया. यानी पहिला बैसाख और कार्तिक की तेरस (धनतेरस और दीपावली).
इस दिन व्यापारी और दुकानदार अपने पुराने बही-खाते बंद करते थे और नए खाते खोलते थे. वे अपने ग्राहकों को बुलाकर बकाया रकम चुकाने के लिए आमंत्रित करते थे. इस प्रक्रिया में मिठाइयां बांटी जाती थीं और छोटे-छोटे सामाजिक आयोजन भी होते थे, लेकिन इसका मूल उद्देश्य व्यापारिक ही था. आज भी बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में 'हाल खाता' की परंपरा जारी है, हालांकि अब यह प्रतीकात्मक रूप ले चुकी है.
सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की पहचान का दिन
समय के साथ, जब बंगाल विभिन्न ऐतिहासिक चरणों से गुजरा, तो पोइला बोइशाख का स्वरूप भी बदलने लगा. ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में बंगाली कैलेंडर का प्रशासनिक महत्व कम हो गया, लेकिन ग्रामीण जीवन और स्थानीय व्यापार में इसकी भूमिका बनी रही. जब यह अपने कठोर आर्थिक दायरे से मुक्त हुआ, तो इसमें सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए जगह बनने लगी.
19वीं और 20वीं सदी के शुरुआती दौर में बंगाल में सांस्कृतिक जागरण का समय आया, जिसे 'बंगाल रेनैसां' कहा जाता है. इस दौर में साहित्य, संगीत और कला ने आधुनिक बंगाली पहचान को आकार देने में अहम भूमिका निभाई. गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान साहित्यकारों ने ऋतुओं और सांस्कृतिक अवसरों को नए अर्थ दिए. अपनी रचनाओं और संगीत के जरिये उन्होंने 'पोइला बोइशाख' जैसे अवसरों को भावनात्मक और सौंदर्य से भरी गहराई दी.

बांग्लादेश में भी दिखती रही पोइला बैसाख की रंगत
यही वह समय था जब पोइला बोइशाख एक आर्थिक परंपरा से आगे बढ़कर सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव में बदलने लगा. लोगों के बीच मेल-मिलाप, गीत-संगीत और सामुदायिक आयोजन इस दिन का हिस्सा बनने लगे. यह बदलाव धीरे-धीरे हुआ, लेकिन इसने त्योहार की दिशा ही बदल दी. 20वीं सदी के बीच में, खासकर उस समय के पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में, इस त्योहार ने एक और महत्वपूर्ण बदलाव देखा.
जब उर्दू को प्रमुख भाषा बनाने के प्रयास हुए, तब बंगाली भाषा और संस्कृति विरोध और पहचान के प्रतीक बन गए. 'पोइला बोइशाख' इस सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का एक मजबूत मंच बनकर उभरा. इसी दौर में “मंगल शोभायात्रा” की शुरुआत हुई. 1989 में ढाका विश्वविद्यालय के फाइन आर्ट्स विभाग के छात्रों द्वारा शुरू की गई यह परंपरा कला के माध्यम से एकता और सकारात्मकता का संदेश देती है. बड़े-बड़े मुखौटे, प्रतीकात्मक आकृतियां और चमकीले रंग इस शोभायात्रा की पहचान रहे.

यूनेस्को ने दी थी सांस्कृतिक विरासत की मान्यता
समय के साथ यह 'पोइला बोइशाख' का सबसे प्रमुख आकर्षण बन गई और यूनेस्को ने इसे 'सांस्कृतिक विरासत' के रूप में मान्यता भी दी. जहां रमना पार्क में बरगद के ऐतिहासिक पेड़ के नीचे (रमना बटमूल) होने वाला रमना बटमूल फेस्टिवल भी खास भूमिका में रहा है. बांग्लादेश की 'छायानट' संस्था यहां सूर्योदय के साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन करती रही है.
इस तरह, 'पोइला बोइशाख' की यात्रा आस्था, धार्मिक मान्यता से होते हुए सत्ता की जरूरत बनी, फिर व्यापार की पहचान में तब्दील हुई और एक बड़े क्षेत्रीय पहचान की ऊंचाई तक पहुंची. बंगाली संस्कृति में 14-15 अप्रैल की तारीख सिर्फ कैलेंडर का एक दिन नहीं है, यह इस संस्कृति की आत्मा है, इसकी पहचान है.