दिन अपने अवसान की ओर था, शाम ने अपना आंचल पसारना शुरू कर दिया था. चैत्र महीने की शाम यूं भी बड़ी खूबसूरत होती है, जब दिन भर की कुनकुनी तपन, शाम के धुंधलके के साथ हल्की-हल्की सर्द होने लगती है. अलसाये हुए इस माहौल में हुमांयूं के मकबरे के करीब और सुंदर नर्सरी की रंगीनियत के बीच जब साज छिड़ा और तराने बने तो बंदिशें गीत बनकर फूट पड़ीं. तबले की तिरकिट ध्वनि और तानपुरे के सुरों के बीच ऐसी जुगलबंदी देखने को मिली कि दिल बाग-बाग हो गया.
ये मौका था SPIC MACAY और सुंदर नर्सरी के खूबसूरत संयोजन से आयोजित सांस्कृतिक संध्या 'संगीत सुधा' का, जिसमें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रख्यात गायिका विदुषी सुनंदा शर्मा ने आलाप-तान और तराना की सुंदर प्रस्तुति दी.
एक शाम जो यादगार बन गई
बनारस घराने की प्रमुख गायिका विदुषी सुनंदा शर्मा ने इस संध्या को अपनी गायकी से अविस्मरणीय बना दिया. उनकी प्रस्तुति में ख्याल, ठुमरी, दादरा और चैती जैसे शास्त्रीय शुद्धता वाले रागों के साथ-साथ पंजाबी और हिमाचली लोक संगीत की मधुर झलक भी देखने को मिली. कार्यक्रम की शुरुआत राग मधुवंती से हुई, जिसमें उनकी गहरी और भावपूर्ण आवाज ने श्रोताओं को एक अलग ही संगीतमय यात्रा पर ले गया. इसके बाद उन्होंने टप्पा और चैती की भी सुंदर प्रस्तुतियां दीं. इसमें उनकी बनारस घराने की विशेष शैली स्पष्ट रूप से झलक रही थी.
उनके साथ तबले पर पं. शुभ महाराज की थाप और हारमोनियम पर सुमत मिश्रा की मधुर संगत ने प्रस्तुति को और भी प्रभावशाली बना दिया. दोनों कलाकारों ने अपनी कला से यह सिद्ध कर दिया कि संगत भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितना मुख्य प्रदर्शन.
विदुषी सुनंदा शर्मा ने अपने गायन की शुरुआत बड़ा ख्याल से की, जो कि राग मधुवंती में था. उन्होंने इस राग की प्रकृति और उसके तेवर-कलेवर के बारे में पहले ही बता दिया कि चैत्र के महीने में जब मौसम सिंकती हुई सी गर्मी और हल्की ठंड के मिले-जुले संयोग से आलस से भरा हो जाता है, तो ऐसे ही मौसम की शाम का प्रतिनिधि राग है मधुवंती. इस राग में मधुमास का सौंदर्य है, चैत्र का प्रमाद है, आनंद का अतिरेक है और सबसे खास बात कि यह राग भले ही शृंगार और आमोद-प्रमोद के तत्व से भरा हो, लेकिन इसमें चेतना को जागृत करने की भी शक्ति समाहित है.
इसलिए जब उन्होंने स्वरों के हल्के विलंबित आकार लेते हुए सुरों को साधने की शुरुआत की तो ऐसा लगा कि खुद शाम ही किसी बड़-पीपल के तले सुस्ताने को बैठी तो है, लेकिन विचलित सी भी है.
शाम की विचलित सी अवस्था और मोको नींद न आए...
शाम की इसी विचलित सी अवस्था को गायिका की आवाज ने शब्द दिए और कहा- मोको नींद न आए... राग मधुवंती के बड़े खयाल में सजी इस बंदिश में नायिका, अपने प्रेमी सजन से अपनी वेदना बताते हुए कह रही है, सजन, मुझे नींद नहीं आती है, चैन नहीं पड़ता है, वह विकल है. बंदिश इन्हीं भावों के साथ राग-रागिनियों के अनुशासन में एक-एक सुर में सधते हुए आगे बढ़ती है और इस बीच देखने को मिलती है, तबले की कलाबाजी. जादू भरी लंबी-लंबी तानों के साथ तिरकिट और तिट के जरिए ताल देता तबला कब खुद ब खुद नायिका की ही बात का समर्थन करने लग जाता है, पता ही नहीं चलता.
ये बनारस घराने की वंश और शिष्य परंपरा में शामिल रहे शुभ महाराज की उंगलियों का जादू था, जिन्होंने तबले पर थिरकतेल हुई गीत की बोलों को ही अपनी मुख्य ध्वनि बना लिया था और मंच पर होती इस जादूगरी को देखकर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़हाट से गूंज उठा.
जैसा कि पहले ही बताया कि राग मधुवंती भले ही चैत्र महीने के आलस्य और प्रमाद से भरा राग है, लेकिन इसमें चेतना जागरण की शक्ति भी है और यह बात अगली ही प्रस्तुति में सिद्ध भी हो गई, जब उन्होंने इसी राग में बंधी छोटे ख्याल की बंदिश गोविंग गुण गावो.. की प्रस्तुति दी.
ये बंदिश शृंगार की शैली में ही साकार ब्रह्म की उपासना की ओर ले चलती है और सीधे आत्मा को संबोधित करते हुई कहती है, गोविंद के गुण गाओ... इस संसार में वही एक अकेला है जो सभी सुखों का मूल है और जो असल सच भी है. बाकी सबकुछ झूठ है और माया है. 'ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या' के ध्येय को सामने रखती इस बंदिश के बोलों को देखिए.
गोविंद गुण गाओ... आवो...
अजहूं न चेते-अचेत
माया बीच फंसे मन मूरख, सोच समझ क्यों न लेत
गोविंद गुण गाओ....आवो
ये पंक्तियां बताती हैं कि, मन जिस आमोद-प्रमोद में फंसा है, वह सब मिथ्या है. कितनी आसानी से आलस्य के मौसम का प्रतिनिधि राग ही अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को स्पष्ट करके सामने रख दे रहा है. यह विरोधाभास ही राग मधुवंती की खूबसूरती है, जिसे विदुषी सुनंदा शर्मा ने बेहद करीने और बारीकी से पेश किया.
उनकी शुरुआती दो प्रस्तुतियां विशुद्ध राग आधारित रहीं, जिनमें युगों से चली आ रही भारतीय संगीत परंपरा के सुरों से उत्पन्न चमत्कार शामिल रहे.
इन खास प्रस्तुतियों के बाद जब यह संगीत कार्यक्रम अपने उनवान पर पहुंचा तब उन्होंने 'ठुमरी' और 'टप्पा' गायकी के जरिए तो ऐसा समां बांधा कि तालियां रुकी ही नहीं बल्कि मंच के संगतकारों के साथ ताल से ताल मिलाने लगीं. आखिरी में उन्होंने राग आधारित ही चैती की प्रस्तुति दी.
चैती, पूर्वी उत्तर प्रदेश में संगीत की एक लोकविधा है. खासतौर पर यह चैत्र मास में गाई जाती है और इसमें या तो राम जन्म के समय का वर्णन होता है, या फिर मौसम का ब्यौरा होता है और इन सबके साथ जो अनिवार्य होता है, वह है रामटेक ... चैती के गीत अपनी पंक्तियों में हो रामा, हरे रामा जैसे शब्दों को लिए बिना पूरे नहीं होते हैं.
उनकी ही प्रस्तुति पर गौर करें तो उन्होंने जो चैती गाई, उसके बोल थे -
चैत मासे बोलेले कोयलिया , हो रामा
मोरे अंगनवा
कुहुक-कुहुक करे कारी रे कोयलिया,
कुहुक उठत मोरा मनवा, हो रामा
चैत मासे कूके रे कोयलिया....
उनकी इस चैती से सभागार एक बार फिर तालियों से गूंज उठा.
यहां ये बताना जरूरी हो जाता है कि विदुषी सुनंदा शर्मा बनारस घराने से हैं और वह इस घराने की प्रसिद्ध स्वर लहरी रहीं, पद्मभूषण विदुषी गिरिजा देवी के संरक्षण में नौ वर्षों तक इस विधा की शिक्षा पायी है. उनकी गायकी में शास्त्रीय संगीत की शुद्धता के साथ-साथ लोक संगीत का मिश्रण एक अनूठा आकर्षण पैदा करता है. लंदन के SOAS विश्वविद्यालय और रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूजिक में विजिटिंग टीचर के रूप में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी छाप छोड़ी है. वहीं उनके साथ तबले पर संगत कर रहे थे, पं. शभु महाराज जो बनारस घराने के प्रख्यात तबला वादक और पं. किशन महाराज जी के नाती हैं.
उन्होंने पं. रविशंकर और पं. हरिप्रसाद चौरसिया जैसे दिग्गजों के साथ संगत की है और "काशी युवा गौरव" जैसे सम्मानों से नवाजे गए हैं. उनकी तबला वादन शैली में बनारस घराने की विशिष्ट लय और ताल की गहराई स्पष्ट दिखाई देती है. इसके अलावा हारमोनियम पर सुरों के छेड़ रहे थे, सुमत मिश्रा, और वह भी बनारस घराने से जुड़े रहे हैं.
राजधानी दिल्ली के दिल में हुआ यह आयोजन, दिल्ली की सांस्कृतिक गरिमा को फिर से नया कलेवर देने की और उसे जीवंत बनाने की एक कोशिश है. आगा खान ट्रस्ट फॉर कल्चर और सुधा संगिनी फाउंडेशन ने इस आयोजन को समर्थन देकर इसे और प्रभावी बनाया. सुधा संगिनी फाउंडेशन, जो आदिवासी महिलाओं और पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करता है, इस पहल से जुड़कर समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाने में सहायक रहा है.