देवी दुर्गा की आरती में एक पंक्ति आती है...
64 योगिनी गावत, नृत्य करत भैरूं...
बाजत ताल मृदंगा और बाजत डमरू
यानी 64 योगिनियां गा रही हैं और भैरव नृत्य कर रहे हैं. हर रोज की आम पूजा पद्धति में 64 योगिनियों का जिक्र आमतौर पर नहीं मिलता है. हम शक्ति के रूप में देवी दु्र्गा को पूजते हैं, पार्वती को शिवपत्नी के तौर पर पूजते हैं. लक्ष्मी धन की देवी, सरस्वती ज्ञान की देवी, काली को महाशक्ति फिर इसके बाद सीता और राधा जैसी देवियां. हमारी लिस्ट में यही मोटे-मोटे नाम शामिल हैं.
लेकिन पौराणिक ग्रंथों और सनातन परंपरा में 64 योगिनियों का नाम आता है. ये महाशक्ति (भगवती या देवी दुर्गा) का ही एक रूप हैं. इन्हीं 64 योगिनियों को कैनवस पर आकार दिया है बीना उन्नीकृष्णन ने.
पूजा की परंपरा से परे 64 शक्तियों की दुनिया
केरल की वरिष्ठ चित्रकार डॉ. बीना एस. उन्नीकृष्णन अपनी 68 (64 योगिनी और 4 अन्य देवता) कृतियों के साथ चित्रों की ऐसी यात्रा पर निकली हैं जिसकी राहें पौराणिकता से होते हुए प्राचीनता तक जाती हैं. राजधानी दिल्ली का इंडिया हैबिटेट सेंटर उनकी इन कृतियों का साक्षी बना, जहां उन्होंने ट्रैवलिंग आर्ट एग्जीबिशन ‘एका : द वन’ के जरिए लोगों को 64 योगिनियों की दिव्य चेतना से साक्षात्कार कराया.

यह प्रदर्शनी कला, आस्था और दर्शन का अद्भुत मेलजोल सामने रखती है, जहां कैनवास संवाद बन जाता है और हर पेंटिंग देवी भगवती की असीम शक्तियों और चेतना की अलग ही व्याख्या करता दिखता है. बीना कहती हैं कि 'इन चित्रों को कैनवस पर उतारने से पहले मन में कोई भाव नहीं था. बस एक इच्छा थी कि मैं देवी त्रिपुरसुंदरी जो महाशक्ति हैं, उनकी छवि को रंग भर सकूं. फिर मैं उनके बारे में अलग-अलग रिसर्च करती रही और ये खोज पहुंची उनके दिव्य 64 शक्ति स्वरूपों तक.'
उन्होंने भुवनेश्वर के हीरापुर में मौजूद प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर (महामाया मंदिर) को भी देखा और इन 64 कृतियों को बनाने में उसी क्रम का इस्तेमाल किया जो उस 9वीं शताब्दी के तांत्रिक परंपरा के मंदिर में नजर आते हैं.
जब आंखों से जागती है चेतना
बकौल बीना, वह पहले नेत्र यानी आंखें बनाती हैं. जब आंखें अपना आकार ले लेती हैं तब धीरे-धीरे देवी (योगिनी शक्ति) का स्वरूप कैनवस पर आकार लेता जाता है. ये आंखें सिर्फ पेंटिंग का हिस्सा नहीं बल्कि एक जागृति हैं. चेतना का प्रतीक हैं. चेतना जगती है तो कोई भी रचना आकार लेती है. मेरे साथ भी ऐसा हुआ.
प्रदर्शनी देवी साधना में 64 योगिनियों के महत्व को तो सामने रखती ही है, तांत्रिक परंपरा में शामिल देवी प्रतीकों और उनके योग क्रियाओं को भी बताती है. ये योगिनियां असल में जो डर से छुटकारा, स्पष्टता, शक्ति और अध्यात्म का प्रतीक हैं.
डॉ. बीना ने पांच वर्षों में 68 चित्र बनाए, जिनमें 64 योगिनियां केंद्र में हैं. हर एक पेंटिंग में योगिनी का आकार, श्रृंगार, उनकी बड़ी आंखें और कहीं-कहीं आग की तरह लहराते बाल ब्रह्मांड की पंचभूत शक्ति का प्रतीक बनते से नजर आते हैं. योगिनी कहीं पानी के बहाव की ऊर्जा हैं, कहीं वह सागर की लहरों की शक्ति हैं, कहीं उनमें हवा की सी उड़ान है. उनमें आग जैसी जलन भी है और आकाश जैसी शांति भी नजर आती है.

‘64’ का रहस्य: संख्या से चेतना तक
इसी तरह योगिनियों के वाहन यानी घोड़े, सांप, शेर और उनके आसन भी अलग-अलग ऊर्जा की अभिव्यक्ति बनते हैं. डॉ. बीना 64 की संख्या को भी बहुत पवित्र, रहस्यमय और रोमांचक करार देती हैं. प्रदर्शनी की संकल्पना ‘64’ संख्या के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक आयामों पर आधारित है. 64 केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन का गणितीय और जैविक संकेत है. यह चेतना की कोडिंग है, जिसे हमें समझना जरूरी है. कलाओं में भी 64 कलाओं का जिक्र आता है.
प्रदर्शनी में भैरव, अर्धनारीश्वर और गणपति के रूपों को समकालीन अर्थों में पेश किया गया है. डॉ. बीना खुद को कोई प्रोफेशनल चित्रकार या कलाकार नहीं बताती हैं. इसी विषय (64 योगिनी) पर लिखी अपनी किताब Whispers of The Unseen में भी वह लिखती हैं कि पेंटिंग उनके अध्यात्मिक शक्ति से जुड़ाव का जरिया बना.
वह महात्रिपुरसुंदरी को पेंट करना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने पहले उन्हें समझने का निश्चय किया, यहीं से 64 योगिनियों की साधना-यात्रा की शुरुआत हुई. एक बार जब शुरुआत हो गई तो फिर पेंटिंग बनी, डॉक्यूमेंट्री बनी और अब यह प्रदर्शनी 16 राज्यों की यात्रा पर है. इससे पहले इसका प्रदर्शन, कोच्चि, कोयंबटूर, बेंगलुरु, मुंबई, भोपाल, अहमदाबाद और जयपुर में हो चुका है और यहां से यह राजधानी दिल्ली पहुंची है.