वाशिंगटन और तेहरान के बीच लंबे समय तक चलने वाले संभावित समझौते की दिशा में कई कदम उठाए जा रहे हैं. इस बीच खाड़ी देशों में एक सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है कि ईरान को इस डील से आखिर कितना फायदा होगा?
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो इस हफ्ते तीन दिवसीय मिडिल ईस्ट दौरे पर आ रहे हैं, जहां वो संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत और बहरीन के नेताओं से मुलाकात करेंगे. बताया जा रहा है कि उनकी इस यात्रा का मकसद वाशिंगटन के सबसे करीबी सहयोगियों को आश्वस्त करना है कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का तेहरान के साथ समझौता उनके हितों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा.
प्राप्त जानकारी के अनुसार, खाड़ी के अधिकांश देशों की चिंता कूटनीति को लेकर नहीं है, बल्कि ज्यादातर देशों ने अमेरिका, इजारायल और ईरान के बीच संघर्ष को रोकने की कोशिश का स्वागत किया है. इसके बजाय, चिंता इस बात की है कि अगर बातचीत सफल होती है तो ईरान को क्या मिल सकता है और क्या ये समझौता ईरान की सैन्य महत्वाकांक्षाओं को लेकर दशकों पुरानी चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त है.
खाड़ी देशों की चिंता
खाड़ी देशों के सहयोगियों के बीच इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा ईरान के लिए करीब 300 अरब डॉलर के संभावित पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास पैकेज को लेकर हो रही है.
इस समझौते के सहमति पत्र के अनुसार, वाशिंगटन ने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर ईरान के विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की एक निश्चित और पारस्परिक रूप से सहमत योजना विकसित करने का संकल्प लिया है. इस महत्वाकांक्षी योजना को लागू करने के तंत्र को अगले 60 दिनों के अंदर अंतिम समझौते के हिस्से के रूप में पूरी तरह से तैयार कर लिया जाएगा.
खाड़ी देशों के अधिकारियों को ये गहरा डर सता रहा है कि इतना बड़ा फंड मिलने से तेहरान को महीनों के संघर्ष के बाद न केवल खुद को दोबारा खड़ा करने में मदद मिलेगी, बल्कि इससे उसकी सैन्य क्षमताएं और क्षेत्रीय प्रभाव भी काफी मजबूत हो जाएंगे. ये चिंता सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, बहरीन और कतर जैसे देशों के लिए बहुत मायने रखती है, क्योंकि ये सभी मिडिल ईस्ट में वाशिंगटन के सुरक्षा ढांचे में बड़ी भूमिका निभाते हैं और अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मेजबानी करते हैं. युद्ध के दौरान इन सभी देशों ने अपनी नागरिक संपत्तियों पर ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों का सामना किया है.
खाड़ी देशों ने नहीं खोले अपने पत्ते
ईरान के पुनर्निर्माण को लेकर चल रही इन बड़ी बातों के बावजूद खाड़ी देशों ने अभी तक आधिकारिक रूप से ये साफ नहीं किया है कि क्या वो इस प्रयास के लिए वित्तीय मदद देने के लिए तैयार हैं या नहीं. युद्ध के बाद ये पूरा मामला बेहद संवेदनशील बन चुका है, क्योंकि तेहरान भी वाशिंगटन से मुआवजे की लगातार मांग कर रहा है. स्विट्जरलैंड में हुई महत्वपूर्ण वार्ताओं से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ये कड़ा संकल्प लिया था कि तेहरान को संयुक्त राज्य अमेरिका से वित्तीय मदद के रूप में "दस सेंट भी नहीं" मिलेंगे.
फ्रीज की गई संपत्तियों पर विवाद
इस पूरे कूटनीतिक समझौते में पैसे का लेन-देन सबसे जटिल हिस्सा बनकर उभरा है. स्विट्जरलैंड में हुई वार्ता के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एक बड़े प्रस्ताव का खुलासा किया है, जिससे ये तय हो सकता है कि प्रतिबंधों में ढील मिलने के बाद ईरान की फ्रीज (जब्त) की गई अरबों डॉलर की संपत्तियों को कैसे संभाला जाएगा.
वेंस ने कहा कि अमेरिका एक ऐसी प्रक्रिया स्थापित करना चाहता था, जिससे यदि ईरानी संपत्तियों को कभी अनफ्रीज किया जाए तो ये सुनिश्चित हो सके कि वह पैसा केवल ईरान के आम लोगों की भलाई के लिए खर्च हो, न कि आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए.
कुशनर का फॉर्मूला
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बताया कि डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर ने कतर के लोगों के साथ मिलकर इस समस्या का एक बहुत ही दिलचस्प समाधान निकाला है. इस नए प्रस्ताव के तहत यदि ईरान की कोई भी फ्रीज संपत्ति अनफ्रीज की जाती है तो उस पूरी प्रक्रिया पर अंतिम मंजूरी देने का अधिकार संयुक्त रूप से अमेरिका और कतर के पास सुरक्षित रहेगा.
इसके बाद उस अनफ्रीज किए गए पैसे का इस्तेमाल सीधे तौर पर ईरानी जनता के फायदे के लिए अमेरिकी मक्का और अमेरिकी गेहूं खरीदने के लिए किया जाएगा. ये व्यवस्था ईरान को मानवीय और कृषि खरीद के माध्यम से अपनी संपत्ति के एक हिस्से तक पहुंचने की अनुमति देगी.
दुनिया भर में फंसी ईरान की संपत्ति
भले ही अमेरिका की तरफ से कुशनर का ये मानवीय और कृषि खरीद वाला फॉर्मूला मेज पर रखा गया हो, लेकिन ये वित्तीय मुद्दा अभी-भी सुलझने से कोसों दूर दिखाई दे रहा है. ईरान ने साफ तौर पर ये संकेत दे दिया है कि वो अपनी जब्त संपत्तियों के उपयोग के तरीकों पर खुद का पूरा नियंत्रण चाहते हैं.
ईरान के केंद्रीय बैंक के गवर्नर के अनुसार, फ्रीज किए गए फंड के उपयोग से जुड़े तमाम फैसले अंततः केवल ईरानी अधिकारियों के मार्गदर्शन में ही लिए जाने चाहिए.
इस कूटनीतिक बातचीत में शामिल संपत्तियों की कुल राशि बहुत बड़ी है. शुरुआत में दोनों देशों के वार्ताकारों ने विदेशी बैंक खातों में फ्रीज पड़े लगभग 6 अरब डॉलर से लेकर 25 अरब डॉलर के फंड पर अपना मुख्य ध्यान केंद्रित किया था. हालांकि, वित्तीय विशेषज्ञों के अनुमानों के अनुसार, अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण दुनिया भर के विभिन्न विदेशी खातों में ईरान की लगभग 100 अरब डॉलर से लेकर 120 अरब डॉलर तक की विशाल संपत्ति पूरी तरह से लॉक (जब्त) पड़ी हुई है.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के इस खाड़ी दौरे पर केवल पैसों और संपत्तियों को लेकर ही बातचीत नहीं होगी. उनकी इस यात्रा का एक बहुत बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमन्य की सुरक्षा की समीक्षा करने पर केंद्रित रहेगा. ये एक ऐसा बेहद संकरा और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जहां से होकर पूरी दुनिया की तेल और गैस आपूर्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा गुजरता है. हालिया संघर्ष के दौरान ये समुद्री जलमार्ग दोनों पक्षों के बीच टकराव का मुख्य केंद्र बन गया था और यहां जहाजों की आवाजाही अभी तक सामान्य स्तर पर नहीं लौट सकी है.
एनालिटिक्स फर्म केपलर (Kpler) के आंकड़ों के अनुसार, इस वीकेंडमें होर्मुज से होकर केवल 71 कमर्शियल जहाज ही गुजर सके हैं. इस क्षेत्रीय संघर्ष के शुरू होने से पहले इस व्यस्त समुद्री मार्ग से रोजाना गुजरने वाले जहाजों की सामान्य संख्या अक्सर 100 से 131 जहाजों के बीच रहती थी. वर्तमान सहमति पत्र के नियमों के तहत ईरान को 60 दिनों की इस वार्ता अवधि के दौरान जहाजों पर कोई भी नई ट्रांजिट फीस लगाने से रोका गया है, लेकिन ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि ये तय समय सीमा समाप्त होने के बाद वो इस तरह के शुल्क लगाने पर दोबारा विचार कर सकते हैं.
अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, मार्को रुबियो अपनी इस यात्रा के दौरान कई महत्वपूर्ण क्षेत्रीय प्राथमिकताओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे. इसमें ईरान के साथ हुआ हालिया सहमति पत्र, होर्मुज के माध्यम से सभी अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए पूर्ण, स्वतंत्र और सुरक्षित पारगमन सुनिश्चित करने के प्रयास और पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में शांति व स्थिरता बनाए रखने का महत्व शामिल है. अपने इस दौरे के दौरान बहरीन में रुबियो खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के नेताओं के साथ एक विशेष बैठक भी करेंगे, जिसमें सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत, बहरीन और यूएई शामिल हैं.
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