US की मांग से चौंक गए खाड़ी देश! ट्रंप ने रख दिया अब्राहम समझौते से जुड़ा प्रस्ताव

ईरान संघर्ष खत्म करने की कोशिशों के बीच ट्रंप ने अरब और मुस्लिम देशों से इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करके अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की है.

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खाड़ी देशों ट्रंप ने की इजरायल को मान्यता देने की अपील (File Photo: Reuters) खाड़ी देशों ट्रंप ने की इजरायल को मान्यता देने की अपील (File Photo: Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 25 मई 2026,
  • अपडेटेड 10:26 AM IST

जैसे-जैसे ईरान संघर्ष को खत्म करने की बातचीत तेज हो रही है, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नजरें सिर्फ शांति से कहीं ज्यादा बड़ी चीज पर टिकी हुई नजर आ रही हैं. बंद दरवाजों के पीछे, ट्रंप अब खुद पश्चिम एशिया के पूरे समीकरण को बदलने की कोशिश कर रहे हैं.

Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, यूएस राष्ट्रपति ने शनिवार को एक हाई-लेवल कॉन्फ्रेंस कॉल के दौरान कई अरब और मुस्लिम-बहुल देशों के नेताओं से कहा कि एक बार ईरान के साथ युद्ध खत्म हो जाए, तो वह चाहते हैं कि और भी देश इजरायल को मान्यता दें और अब्राहम समझौते में शामिल हों.

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कहा जा रहा है कि इस मैसेज से कई नेता हैरान रह गए.

इस फोन कॉल में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के नेता शामिल थे. यह बातचीत US-ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर चल रही थी, जिससे इस पूरे क्षेत्र में महीनों से चली आ रही अस्थिरता को शांत करने में मदद मिल सकती है.

डोनाल्ड ट्रंप ने नेताओं से कहा कि एक बार ईरान युद्ध खत्म हो जाए, तो उन्हें उम्मीद है कि जो देश अभी तक इजरायल को मान्यता नहीं देते हैं, वे उसके साथ अपने संबंध सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे. रिपोर्ट में जिक्र किए गए US अधिकारियों के मुताबिक, उनकी इन टिप्पणियों के बाद कॉल पर कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया, खास तौर पर सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान के नेताओं की तरफ से, जिनके इजरायल के साथ कोई औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं.

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रिपोर्ट में कहा गया है, "अमेरिका के एक अधिकारी ने बताया कि ट्रंप ने मजाक करते हुए पूछा कि क्या वे लोग अभी भी कॉल पर मौजूद हैं."

नई पश्चिमी एशिया व्यवस्था पर ट्रंप की नजर?

डोनाल्ड ट्रंप के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट सऊदी अरब है, जो औपचारिक तौर पर इजरायल को मान्यता नहीं देता. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पहले इजरायल के साथ रिश्ते बनाने को लेकर कुछ नरमी दिखाई थी, लेकिन गाजा में चल रही जंग, ईरान के साथ तनाव और पूरे अरब जगत में बढ़ रहे गुस्से ने इस काम को मुश्किल बना दिया है.

सऊदी अरब अपनी बात पर अड़ा हुआ है कि इजरायल के साथ भविष्य में कोई भी रिश्ता तभी बनेगा, जब फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन की दिशा में एक साफ और पक्का रास्ता हो और इजरायल इस बात को मानने से साफ इनकार करता है.

US का एक नया विचार

ट्रंप ने एक बार फिर अपना एक सबसे विवादित विचार सामने रखा, क्या ईरान भी अब्राहम समझौते में शामिल हो सकता है? ट्रंप ने 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, "मैं अब तक मध्य-पूर्व के सभी देशों को उनके समर्थन और सहयोग के लिए धन्यवाद देना चाहूंगा. ऐतिहासिक अब्राहम समझौते में शामिल देशों के साथ जुड़ने से यह समर्थन और सहयोग और भी ज़्यादा बढ़ेगा और मज़बूत होगा. कौन जाने, शायद इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान भी इसमें शामिल होना चाहे."

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ईरान की मौजूदा सरकार को देखते हुए यह विचार बात बहुत ज़्यादा अवास्तविक लगी. तेहरान ने दशकों से इजरायल को मान्यता देने से इनकार किया है और आज भी उसे एक 'कब्ज़ा करने वाली ताकत' ही मानता है.

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पिछले साल भी इसी तरह की टिप्पणियों को सिरे से खारिज कर दिया था. अराघची ने 2025 में ईरानी सरकारी टेलीविजन को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, "ईरान कभी भी किसी ऐसी कब्जा करने वाली सरकार को मान्यता नहीं देगा, जिसने नरसंहार किया हो और बच्चों की जान ली हो."

अब्राहम समझौते पर दस्तखत होने से बहुत पहले ही, ईरान अरब देशों द्वारा इजरायल के साथ संबंध बनाने का जोरदार विरोध करता रहा था. 

ट्रंप के इस प्रस्ताव पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए, अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा कि अगर अमेरिका के सभी सहयोगी देश, जिनमें अरब और मुस्लिम राष्ट्र भी शामिल हैं, अब्राहम समझौते में शामिल होने पर राजी हो जाते हैं, तो यह मध्य-पूर्व के इतिहास का सबसे ज्यादा असरदार समझौता साबित हो सकता है.

अब्राहम समझौते ने क्या बदला?

साल 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से हुए अब्राहम समझौते ने मिडिल ईस्ट में एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत की. इसके तहत इजरायल और कई अरब देशों (संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को) के बीच औपचारिक संबंध स्थापित हुए. दशकों तक, ज़्यादातर अरब देशों ने इजरायल को तब तक मान्यता देने से इनकार कर दिया था, जब तक कि फिलिस्तीनी मुद्दा हल नहीं हो जाता.

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इन समझौतों ने उस पुरानी सोच को पीछे छोड़ दिया और इसके बजाय साझा रणनीतिक हितों पर ध्यान केंद्रित किया. इसके साथ ही, व्यापार, तकनीक, रक्षा और निवेश के क्षेत्रों में सहयोग को भी बढ़ावा दिया. इन समझौतों ने इस खित्ते में कई साल बाद आए सबसे बड़े कूटनीतिक बदलावों में से एक को उजागर किया और पश्चिमी एशिया में अमेरिका समर्थित एक नए क्षेत्रीय गठबंधन को आकार देने में मदद की.

ईरान डील पर मिले-जुले संकेत

अब, ट्रंप भले ही मिडिल ईस्ट में नए सिरे से रिश्तों की बात कर रहे हों, लेकिन ईरान के साथ समझौता अभी भी दूर की कौड़ी है. रविवार को उन्होंने दावा किया कि तेहरान के साथ रिश्ते ज़्यादा पेशेवर और फलदायी होते जा रहे हैं, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी है कि बातचीत में जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए.

ट्रंप ने लिखा, "बातचीत एक व्यवस्थित और रचनात्मक तरीके से आगे बढ़ रही है, और मैंने अपने प्रतिनिधियों को निर्देश दिया है कि वे किसी समझौते पर पहुंचने में जल्दबाज़ी न करें, क्योंकि वक्त हमारे पक्ष में है. जब तक कोई समझौता हो नहीं जाता, उसे प्रमाणित नहीं कर दिया जाता और उस पर हस्ताक्षर नहीं हो जाते, तब तक नाकेबंदी पूरी तरह से लागू रहेगी." उन्होंने एक बार फिर अपनी उन मुख्य मांगों में से एक को दोहराया.

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डोनाल्ड ट्रंप ने लिखा, "लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि वे कोई परमाणु हथियार या बम न तो बना सकते हैं और न ही हासिल कर सकते हैं."

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित रूपरेखा में 60 दिनों के संभावित युद्धविराम, होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भविष्य में होने वाली बातचीत जैसी बातें शामिल हैं. लेकिन कई बड़े मतभेद अभी भी अनसुलझे हैं, खासकर प्रतिबंधों में छूट, ईरान के यूरेनियम भंडार और ईरान की जब्त की गई संपत्तियों को वापस दिलाने जैसे मुद्दों पर.

कूटनीतिक सफलता के लिए ट्रंप की कोशिशों के बावजूद, मिडिल ईस्ट राजनीतिक रूप से बंटा हुआ है. UAE और बहरीन जैसे देश पहले से ही 'अब्राहम समझौते' के तहत इजरायल के साथ औपचारिक संबंध बनाए हुए हैं. वहीं, सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे अन्य देशों को फिलिस्तीन के मुद्दे पर अभी भी अपने देश के भीतर और क्षेत्रीय स्तर पर भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा है. समय भी इजरायल के लिए हालात को और पेचीदा बना रहा है.

इस साल के आखिर में इजरायल में चुनाव होने वाले हैं और महीनों से चल रहे युद्ध के कारण प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर भारी दबाव है. गाज़ा, लेबनान और ईरान के साथ चल रहे संघर्षों को लेकर हो रही आलोचनाओं के बीच उनकी लोकप्रियता में भी गिरावट आई है.

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ईरान के साथ युद्ध शायद कभी खत्म हो जाए, लेकिन इस बात को लेकर छिड़ी बहस कि पश्चिम एशिया का मुस्तकबिल कैसा होना चाहिए, ऐसा लगता है कि अभी तो उसकी बस शुरुआत ही हुई है.

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