शांति की नाकाम कोशिशें, बढ़ते मिसाइल अटैक... सऊदी-हूती जंग में क्या है ईरान का रोल?

सऊदी अरब में सुरक्षा हालात को लेकर चिंता बढ़ गई है. यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से हमलों के बीच देश के कई हवाई अड्डों और अहम ठिकानों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं. राजधानी रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमलों के बाद उड़ान सेवाएं प्रभावित हुई हैं. दम्माम समेत दूसरे शहरों के हवाई अड्डों पर भी सुरक्षा संबंधी घटनाओं की खबरें आई हैं. कई देशों ने अपने नागरिकों को यात्रा के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी है.

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हूती विद्रोही कौन हैं और सऊदी अरब को क्यों बना रहे निशाना? (Photo - AP) हूती विद्रोही कौन हैं और सऊदी अरब को क्यों बना रहे निशाना? (Photo - AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 16 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 8:16 PM IST

सऊदी अरब और यमन के बीच संघर्ष अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है. 15 अक्टूबर को हूती विद्रोहियों ने यमन के अदन शहर में राष्ट्रपति भवन पर मिसाइल हमला किया. इसमें पांच लोगों की मौत हो गई. वहीं सऊदी अरब ने रियाद एयरपोर्ट और तेल ठिकानों पर हमलों के बाद जवाबी सैन्य कार्रवाई तेज कर दी है.

16 अक्टूबर को भी इस पूरे क्षेत्र में सुरक्षा अलर्ट जारी हैं और अमेरिकी दूतावास ने सऊदी अरब में एयरपोर्ट पर संभावित हमलों को लेकर चेतावनी दी है. इस तनाव का असर भारत आने-जाने वाली उड़ानों पर भी दिखाई दे रहा है.

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एअर इंडिया ने सुरक्षा कारणों से रियाद, दम्माम और जेद्दा के लिए अपनी उड़ानें 20 अक्टूबर तक रद्द करने का फैसला किया है. 

लेकिन सवाल यह है कि आखिर सऊदी अरब और यमन के बीच दुश्मनी की शुरुआत कैसे हुई? हूती विद्रोही कौन हैं और वे सऊदी अरब को निशाना क्यों बनाते हैं? इस संघर्ष में ईरान की क्या भूमिका है? क्या दोनों पक्षों के बीच शांति की कोई उम्मीद है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं इस संघर्ष की पूरी कहानी और इसके पीछे की बड़ी वजहें.

यमन में संघर्ष की शुरुआत कैसे हुई?

यमन पश्चिम एशिया का एक देश है, जिसकी सीमा सऊदी अरब से लगती है. यहां लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता को लेकर संघर्ष चलता रहा है. साल 2014 में हूती विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त यमनी सरकार और हूतियों के बीच संघर्ष तेज हो गया.

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मार्च 2015 में सऊदी अरब ने कई देशों के साथ मिलकर सैन्य गठबंधन बनाया और यमन में हस्तक्षेप शुरू किया. गठबंधन का उद्देश्य यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को फिर से सत्ता में लाना और हूती विद्रोहियों की बढ़ती ताकत को रोकना था.

इसके बाद यमन में लड़ाई लंबे समय तक चलती रही. हवाई हमलों, जमीनी संघर्ष और आर्थिक संकट ने देश की स्थिति को गंभीर बना दिया. इस युद्ध में हजारों लोगों की मौत हुई और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए.

हूती विद्रोही कौन हैं और सऊदी अरब पर हमला क्यों करते हैं?

हूती यमन का एक सशस्त्र और राजनीतिक आंदोलन है. यह मुख्य रूप से यमन के उत्तरी हिस्से में सक्रिय है और राजधानी सना समेत बड़े क्षेत्र पर इसका नियंत्रण है. हूती आंदोलन की धार्मिक जड़ें जैदी शिया समुदाय में हैं. हालांकि, इस संघर्ष को केवल शिया और सुन्नी समुदायों की लड़ाई समझना सही नहीं होगा. इसमें सत्ता, क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दे शामिल हैं.

यह भी पढ़ें: सऊदी अरब में 20 अक्टूबर तक एअर इंडिया की सभी उड़ानें रद्द... रियाद, जेद्दा और दम्माम जाने वालों की बढ़ी मुश्किलें

हूती विद्रोही सऊदी अरब पर आरोप लगाते हैं कि उसकी सैन्य कार्रवाई और प्रतिबंधों से यमन के लोगों को नुकसान पहुंचा है. दूसरी तरफ, सऊदी अरब हूतियों को अपनी सीमा और महत्वपूर्ण ठिकानों के लिए खतरा मानता है. हूतियों ने हाल के दिनों में सऊदी अरब के हवाई अड्डों और तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया है.

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ईरान की क्या भूमिका है?

सऊदी अरब और यमन के बीच जारी संघर्ष में ईरान की भूमिका काफी अहम है. ईरान यमन के हूती विद्रोहियों का प्रमुख समर्थक है. उस पर हूतियों को हथियार, तकनीकी सहायता और सैन्य प्रशिक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं. इससे हूतियों की मिसाइल और ड्रोन हमले करने की क्षमता बढ़ी है. हालांकि, हूती विद्रोहियों के अपने राजनीतिक हित भी हैं और उन्हें पूरी तरह ईरान के नियंत्रण में काम करने वाला संगठन नहीं माना जा सकता.

दरअसल, ईरान और सऊदी अरब के बीच पश्चिम एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने को लेकर लंबे समय से प्रतिस्पर्धा रही है. सऊदी अरब हूतियों को अपनी सीमा, हवाई अड्डों और तेल प्रतिष्ठानों के लिए खतरा मानता है. वहीं, ईरान का समर्थन हूतियों की क्षेत्रीय ताकत बढ़ाने में मदद करता है. इस कारण यमन का गृहयुद्ध क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता से भी जुड़ गया है.

इसके अलावा, यमन के पास स्थित बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. यहां तनाव बढ़ने से लाल सागर में जहाजों की आवाजाही और तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. हालांकि, इस संघर्ष को केवल ईरान और सऊदी अरब की सीधी लड़ाई कहना सही नहीं होगा, क्योंकि इसकी जड़ें यमन के आंतरिक सत्ता संघर्ष में भी हैं.

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शांति की कोशिशें नाकाम हुईं

साल 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से यमन में संघर्ष कम करने के लिए युद्धविराम हुआ था. इससे लड़ाई में कमी आई और शांति वार्ता की उम्मीद बढ़ी. बाद में सऊदी अरब और हूतियों के बीच भी तनाव कम करने के प्रयास हुए.

लेकिन स्थायी राजनीतिक समझौता नहीं हो सका. सत्ता में हिस्सेदारी, बंदरगाहों और हवाई अड्डों पर नियंत्रण, सरकारी कर्मचारियों के वेतन और युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई जैसे मुद्दे विवाद की वजह बने रहे. 2026 में क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के साथ संघर्ष फिर तेज हो गया.

आम लोगों पर क्या पड़ रहा है असर?

यमन में युद्ध का सबसे बुरा असर आम नागरिकों पर पड़ा है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, 2026 में देश में 2.2 करोड़ से ज्यादा लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत है. करीब 1.83 करोड़ लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं और पांच साल से कम उम्र के 22 लाख से अधिक बच्चे कुपोषण से प्रभावित हैं.

युद्ध के कारण अस्पतालों, स्कूलों और दूसरी जरूरी सेवाओं पर दबाव बढ़ा है. दवाइयों, भोजन और साफ पानी की कमी ने स्थिति को और मुश्किल बना दिया है. हैजा जैसी बीमारियों का खतरा भी बना हुआ है. नए हमलों और रास्तों पर प्रतिबंधों से राहत सामग्री पहुंचाना कठिन हो सकता है.

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सऊदी अरब और भारत पर क्या असर पड़ रहा है?

सऊदी अरब पर हमलों के कारण हवाई यात्रा और तेल आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है. रियाद, दम्माम और जेद्दा के लिए कई एयरलाइंस ने उड़ानों में बदलाव किए हैं. एअर इंडिया ने भी सुरक्षा स्थिति को देखते हुए 20 अक्टूबर 2026 तक इन तीन शहरों की उड़ानें रद्द करने की घोषणा की है.

भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक सऊदी अरब में काम करते हैं. उड़ानें रद्द होने से यात्रियों, कारोबार और परिवारों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है. तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर असर पड़ने की स्थिति में वैश्विक बाजारों पर भी दबाव बढ़ सकता है.

सऊदी अरब और यमन के बीच संघर्ष केवल दो देशों की लड़ाई नहीं है. यह यमन के गृहयुद्ध, हूती विद्रोहियों की सत्ता की लड़ाई और ईरान-सऊदी अरब के क्षेत्रीय संघर्ष से भी जुड़ा है.

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