भारत की फ्यूल डिप्लोमेसी... सेशेल्स में इंदिरा गांधी के उन दो घंटों की कहानी

यह वह दौर था, जब सेशेल्स को ब्रिटेन से आजादी मिले महज साढ़े तीन महीने हुए थे. 29 जून 1976 को स्वतंत्र हुआ यह नया-नया देश अभी अपनी विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय पहचान की बुनियाद रख रहा था. ऐसे समय में भारत जैसी बड़ी लोकतांत्रिक ताकत की प्रधानमंत्री का वहां पहुंचना अपने आप में एक बड़ा कूटनीतिक संदेश था.

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1976 में सेशेल्स के माहे एयरपोर्ट पर इंदिरा गांधी. (Photo: Seychelles Archives) 1976 में सेशेल्स के माहे एयरपोर्ट पर इंदिरा गांधी. (Photo: Seychelles Archives)

रितु तोमर

  • नई दिल्ली,
  • 29 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:28 AM IST

सेशेल्स के माहे एयरपोर्ट पर उस दिन कुछ अलग ही नजारा था. रनवे पर रेड कार्पेट बिछ चुका था. सेशेल्स के पहले राष्ट्रपति जेम्स मैनचम अपनी कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्रियों और आला अफसरों के साथ एक खास मेहमान के इस्तकबाल का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. तारीख थी 17 अक्टूबर 1976.

कुछ ही देर बाद आसमान में एक विमान दिखाई दिया. विमान रनवे पर उतरा और उसकी सीढ़ियों से भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बाहर निकलीं. उनके साथ रक्षा मंत्री बंसी लाल, विदेश सचिव जगत सिंह मेहता और विदेश मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारी भी थे. उस समय महज 50 हजार की आबादी वाला यह छोटा सा द्वीपीय देश भारत की प्रधानमंत्री का गर्मजोशी से स्वागत करने को तैयार था.

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जैसे ही इंदिरा गांधी की नजर राष्ट्रपति जेम्स मैनचम पर पड़ी, उन्होंने मुस्कराते हुए हाथ बढ़ाया. मैनचम ने भी पूरी गर्मजोशी से उनका स्वागत किया. दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों का परिचय कराया गया और इस औपचारिक स्वागत के बाद वे एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज की ओर बढ़ गए.

माहे एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज की ओर जाती हुई इंदिरा गांधी. (Photo: Seychelles Archives)

यह वह दौर था, जब सेशेल्स को ब्रिटेन से आजादी मिले महज साढ़े तीन महीने हुए थे. 29 जून 1976 को स्वतंत्र हुआ यह नया देश अभी अपनी विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय पहचान की बुनियाद रख रहा था. ऐसे समय में भारत जैसे देश की प्रधानमंत्री का वहां पहुंचना एक बड़ा कूटनीतिक संदेश था.

हालांकि यह कोई राजकीय यात्रा नहीं थी. इंदिरा गांधी मॉरिशस, तंजानिया और जाम्बिया के दस दिवसीय दौरे से भारत लौट रही थीं. उनका विमान केवल ईंधन भरने के लिए लगभग दो घंटे के लिए माहे एयरपोर्ट पर रुका था. लेकिन सेशेल्स में इंदिरा गांधी के ये दो घंटे आगे चलकर भारत और सेशेल्स के रिश्तों के इतिहास में अहम पड़ाव साबित हुए.

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ये समय उथल-पुथल का समय था. 1976 में पूरी दुनिया शीत युद्ध की गिरफ्त में थी. हिंद महासागर महाशक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बन चुका था. एक ओर अमेरिका, डिएगो गार्सिया में अपना सैन्यअड्डा विकसित कर रहा था, तो दूसरी ओर सोवियत संघ भी इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने में जुटा था. ऐसे माहौल में भारत लगातार इंडियन ओशन जोन ऑफ पीस यानी हिंद महासागर को शांति क्षेत्र घोषित करने की वकालत कर रहा था. बाद के वर्षों में जेम्स मैनचम ने भी लिखा कि इंदिरा गांधी हिंद महासागर में शांति की सबसे प्रमुख आवाजों में से एक थीं.

लेकिन इतिहास ने जल्द ही करवट ली. पांच जून 1977 को जब जेम्स मैनचम विदेश दौरे पर थे, तत्कालीन प्रधानमंत्री फ्रांस अल्बर्ट रेने ने तख्तापलट कर सत्ता अपने हाथ में ले ली. जिस राष्ट्रपति ने एयरपोर्ट पर इंदिरा गांधी का स्वागत किया था, उनकी सरकार एक साल भी पूरा नहीं कर सकी. लेकिन भारत ने नई सरकार के साथ भी अपने रिश्ते कायम रखे और आने वाले वर्षों में सेशेल्स भारत की हिंद महासागर नीति का एक महत्वपूर्ण साझेदार बन गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2015 में सेशेल्स दौरे पर (Photo: PMO)

समय बीता और लगभग चार दशक बाद जब 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सेशेल्स पहुंचे तो इतिहास की परतें फिर खुली. 2015 में जेम्स मैनचम किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे लेकिन उन्होंने सेशेल्स के अखबार Seychelles Nation में एक खुला पत्र लिखकर अपने निजी आर्काइव से इंदिरा गांधी की 1976 दौरे की तीन तस्वीरें साझा कीं.

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उन्होंने इस पत्र में लिखा कि वे भी सेशेल्स के उन हजारों लोगों के साथ अपनी आवाज मिलाना चाहते हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत किया है. सिर्फ इसलिए नहीं कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं बल्कि इसलिए भी कि वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का प्रतिनिधित्व करते हैं.

सेशेल्स के तत्कालीन राष्ट्रपति जेम्स मैनचम के साथ इंदिरा गांधी. (Photo: Seychelles Archives)

उन्होंने लिखा कि कहा जाता है कि... पुरानी यादों का आकर्षण समय के साथ कम हो जाता है, लेकिन मुझे अनुमति दीजिए कि मैं अपने निजी संग्रह से तीन तस्वीरें साझा करूं. पहली तस्वीर में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मैं दोनों देशों के राष्ट्रगान के दौरान सावधान की मुद्रा में खड़े हैं. दूसरी तस्वीर में, मैं उन्हें एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज तक लेकर जा रहा हूं और तीसरी तस्वीर नई दिल्ली स्थित उनके कार्यालय में हमारी मुलाकात की है. 1976 में ली गई ये तस्वीरें शब्दों से कहीं अधिक प्रभावशाली हैं.

मैनचम का कहना था कि इन तस्वीरों को साझा करने का मकसद केवल पुरानी यादें ताजा करना नहीं, बल्कि यह याद दिलाना भी है कि भारत और सेशेल्स की दोस्ती किसी नई स्ट्रैटेजी की देन नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच शुरुआत से चली आ रही भरोसेमंद साझेदारी की बिसात पर खड़ी है.

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उन्होंने अपनी किताब Seychelles: The Saga of a Small Nation Navigating the Cross currents of a Big World में भी हिंद महासागर की बदलती राजनीति का जिक्र करते हुए कहा था कि 1976 में भारत इंडियन ओशन जोन ऑफ पीस का सबसे बड़ा समर्थक था और डिएगो गार्सिया में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति का विरोध करता था. समय के साथ वैश्विक परिस्थितियां बदलीं लेकिन हिंद महासागर का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया.

ये भी दिलचस्प संयोग रहा कि 1976 की तरह 1981 में भी इंदिरा गांधी ने सेशेल्स में ट्रांजिट स्टॉप किया. वह नौ अगस्त 1981 को केन्या में संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में हिस्सा लेने जा रही थीं और इस बीच उनका विमान सेशेल्स में रुका था. इस दौरान उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस अल्बर्ट रेने से मुलाकात की.

आज कई सालों बाद फिर भारत के प्रधानमंत्री सेशेल्स की धरती पर हैं. उसी जमीं पर जहां पांच वर्षों के भीतर इंदिरा गांधी कुछ घंटों के लिए रुकी थीं. इंदिरा गांधी ने कभी सेशेल्स का औपचारिक राजकीय दौरा नहीं किया लेकिन उनके ये दो छोटे पड़ाव भारत और सेशेल्स के रिश्तों में ऐसी गर्मजोशी छोड़ गए, जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है. वक्त के साथ-साथ हिंद महासागर की सियासत भी बदल गई है लेकिन दोनों देशों के भरोसे की डोर आज भी उतनी ही मजबूत दिखाई देती है.

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