'लंदन में इमरान से मिली थी, उनका जुनून...', पुरानी मुलाकात याद दिलाकर महबूबा ने क्या इशारा किया

जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती ने इमरान की तारीफ तो की है, लेकिन उनकी सियासत की कमजोरियां भी बताई हैं. और कहा है कि पीएम बनने के बावजूद वे बदले की राजनीति से बाहर नहीं आ पाए थे.

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महबूबा ने कहा है कि पैवेलियन लौटना पारी का अंत नहीं होता है. (Photo: ITG) महबूबा ने कहा है कि पैवेलियन लौटना पारी का अंत नहीं होता है. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 25 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 3:36 PM IST

'मैं पहली बार 1994 में लंदन में अपने पिता के साथ इमरान खान से मिली थी. पाकिस्तान में सकारात्मक बदलाव लाने को लेकर उनका जुनून और पक्का इरादा मेरे पिता को बहुत पसंद आया था. फिर भी, जब इमरान खान प्रधानमंत्री बने, तो उनकी सरकार भी उसी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन गई. उनके विरोधियों को भी उसी जोश के साथ निशाना बनाया गया, जिस तरह आज उन्हें निशाना बनाया जा रहा है. पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के शासनकाल में नवाज शरीफ और मरियम नवाज समेत पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज के नेताओं को जेल और कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा.'

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पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के बारे में लिखते हुए पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती बेबाक हो जाती हैं. इसके वो पाकिस्तान की समस्या की ओर इशारा करते हुए कहती हैं कि पाकिस्तान की समस्या इमरान खान, नवाज शरीफ या किसी भी राजनीतिक पार्टी से कहीं बड़ी है. समस्या तो खुद सिस्टम में है.

पाकिस्तान के घटनाक्रम और इमरान खान को जेल पर जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती ने 'द टेलिग्राफ इंडिया' पर एक लेख लिखा है. इस लेख में वो कप्तान के 'बदलाव' के इरादे की तारीफ तो करती हैं, लेकिन साथ ही यह भी कहती हैं कि जब वे भी पाकिस्तान के पीएम बने तो 'बदलाव' की बात करने के बावजूद 'बदले' की राजनीति से बाहर नहीं निकल पाए. 

इमरान खान को अदालत के आदेश के बावजूद शिफा अस्पताल में न शिफ्ट किए जाने पर महबूबा कहती हैं कि इसकी कानूनी वजह चाहे जो भी हो यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है: लोकतंत्र का क्या होता है जब देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेश भी सरकार की पसंद और आखिरकार मिलिट्री एस्टेब्लिशमेंट की मर्जी के आगे कमजोर नज़र आते हैं?

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महबूबा ने लिखा है कि पाकिस्तान के आम नेताओं को समझ आ गया कि सत्ता में आने के लिए अक्सर 'एस्टैब्लिशमेंट' यानी कि सेना और खुफिया एजेंसियों के साथ तालमेल बिठाना ज़रूरी होता है. सत्ता में आने के बाद वे अक्सर सरकारी संस्थाओं का इस्तेमाल अपने विरोधियों के खिलाफ करते थे. जब सेना के साथ उनके रिश्ते खराब होते, तो वही मशीनरी उनके खिलाफ हो जाती थी. 

इमरान खान भी इससे अलग नहीं थे. 2018 में उनके सत्ता में आने को बड़े पैमाने पर सेना के समर्थन का नतीजा माना गया. बाद में 'एस्टेब्लिशमेंट' (सेना और सत्ता के प्रभावशाली लोगों का समूह) के साथ उनके रिश्ते खराब हो गए, जिसके चलते अप्रैल 2022 में उन्हें पद से हटा दिया गया और बाद में जेल भेज दिया गया.

महबूबा ने कहा है कि इमरान खान शायद अदियाला जेल लौट आए हैं. लेकिन सबसे बड़ा कैदी पाकिस्तान की लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जो पीढ़ियों से चले आ रहे चक्र में फंसी हुई है. 

वे आगे लिखती हैं, "पाकिस्तान ने देश की रक्षा के लिए अपनी सेना को अपार शक्ति, संसाधन और प्रतिष्ठा दी है. इसके बदले में वहां के लोग इतना तो उम्मीद कर ही सकते हैं कि सेना स्टेट की रक्षा करे लेकिन ये तय न करे कि वहां शासन कौन करेगा."

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महबूबा ने कहा है कि शायद इमरान खान की रिहाई, उसके बाद एक वास्तविक स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी राजनीतिक प्रक्रिया, उस बदलाव की शुरुआत बन सकती है. कई बार पवेलियन लौटना पारी का अंत नहीं होता. यह वह क्षण हो सकता है जब खेल ही अंततः बदल जाता है. 

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