'निर्दोष की निंदा...', बोले प्रेमानंद महाराज, शिष्य रसिक दुलारी की मौत के बाद उठे सवालों पर इशारा?

वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज ने अपने प्रवचन में बताया कि भगवान की भक्ति के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को सुख के साथ अपमान, निंदा और विपरीत परिस्थितियों को भी धैर्य से स्वीकार करना चाहिए. उन्होंने मीरा और प्रह्लाद के उदाहरण देते हुए कहा कि कठिन समय में भी भगवान पर भरोसा बनाए रखना चाहिए. उन्होंने साधकों को जीवन में उतारने के लिए 20 बातें बताईं.

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वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज. (Photo: Screengrab वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज. (Photo: Screengrab

मदन गोपाल शर्मा

  • मथुरा,
  • 09 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:56 PM IST

मथुरा-वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि भगवान की भक्ति का मार्ग आसान नहीं है. इस रास्ते पर चलने वाले साधक को सबसे पहले धैर्यवान बनना चाहिए. उन्होंने समझाया कि जब कोई व्यक्ति भगवान से जुड़ता है, तो शुरुआत में उसे आनंद, सम्मान, प्रशंसा और अनुकूल परिस्थितियां मिल सकती हैं. लेकिन जब भगवान अपने भक्त की परीक्षा लेते हैं, तो उसके जीवन में अपमान, निंदा और विपरीत परिस्थितियां भी आ सकती हैं. प्रेमानंद महाराज ने कहा कि मीरा को उनके देवर ने बहुत कष्ट दिए थे. इसी तरह हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को परेशान किया. उन्होंने इन उदाहरणों के जरिए बताया कि कठिन परिस्थितियों में भी भक्ति का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए.

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उन्होंने कहा कि जब समाज में किसी निर्दोष व्यक्ति की निंदा और अपमान होने लगे, तो उसे घबराने के बजाय धैर्य रखना चाहिए. ऐसी स्थिति को भगवान की विशेष कृपा के रूप में स्वीकार करना चाहिए. महाराज के मुताबिक, प्रशंसा मिलने पर व्यक्ति को अच्छा लगता है, लेकिन जब वही लोग निंदा करने लगते हैं, तो उसे लगता है कि भगवान उसकी मदद क्यों नहीं कर रहे हैं. ऐसे समय में ही व्यक्ति को अपने विश्वास की परीक्षा देनी होती है. उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपना जीवन भगवान को समर्पित कर देता है, तो उसे अपनी इच्छा के बजाय भगवान की इच्छा के अनुसार चलना चाहिए. अपनी बुद्धि और अहंकार को भगवान के चरणों में समर्पित करके लगातार भजन करना चाहिए.

प्रेमानंद महाराज ने बताए साधकों के लिए 20 सूत्र

प्रेमानंद महाराज ने अपने प्रवचन में पूज्य श्री उड़िया बाबा के उपदेशों का उल्लेख करते हुए 20 ऐसी बातें बताईं, जिन्हें जीवन में उतारकर साधक अपनी भक्ति को मजबूत कर सकता है. 

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1) डरने के बजाय सच बोलें. उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति से गलती हुई है, तो उसे स्वीकार करना चाहिए. गलती के कारण दंड या निंदा का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन झूठ बोलकर उसे छिपाने से परेशानी बढ़ती है. एक झूठ छिपाने के लिए कई झूठ बोलने पड़ते हैं. 

2)  किसी की निंदा न करें. महाराज ने कहा कि किसी की बुराई करना ही नहीं, बल्कि निंदा सुनने से भी बचना चाहिए. खासकर भगवान के भक्तों और संतों की निंदा करने से व्यक्ति को बचना चाहिए.

3) सुख-दुख में समान भाव रखें. अनुकूल परिस्थितियों में बहुत ज्यादा खुश और विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होना चाहिए. हर स्थिति में भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए. सम्मान और अपमान दोनों को स्वीकार करके अपनी भक्ति जारी रखनी चाहिए.

4)  गलती करने वाले को माफ करें. यदि कोई व्यक्ति गलती करने के बाद अपनी गलती स्वीकार करता है, माफी मांगता है और सुधरना चाहता है, तो उसे एक मौका देना चाहिए. महाराज ने कहा कि दूसरों को क्षमा करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है.

5)  अपने दुखों को सहने की शक्ति मांगें. उन्होंने कहा कि दुख आने पर हर किसी के सामने अपनी परेशानी बताने के बजाय भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे दुख दूर करें या उसे सहने की शक्ति दें.

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6)  सभी के प्रति परोपकार की भावना रखें. व्यक्ति को दूसरों का भला करने की कोशिश करनी चाहिए. यहां तक कि कोई उसके साथ बुरा व्यवहार करे, तब भी उसके प्रति भलाई की भावना बनाए रखनी चाहिए.

7)  दूसरों के अपराध को लेकर मन में द्वेष न रखें. महाराज ने कहा कि दूसरों की गलतियों के कारण मन में बदले की भावना नहीं पालनी चाहिए. क्षमा और सहनशीलता अपनाने से व्यक्ति अपने भीतर के दोषों पर काबू पा सकता है.

8) काम करते हुए भगवान का नाम जपें. नौकरी, व्यापार और दूसरे जरूरी काम करते समय भी भगवान का स्मरण नहीं छूटना चाहिए. उन्होंने कहा कि जीवन का समय व्यर्थ करने के बजाय उसे भक्ति में लगाना चाहिए.

9)  मधुर और हितकारी वाणी बोलें. व्यक्ति को ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे सामने वाले को दुख न पहुंचे. बोलने से पहले सोचना चाहिए कि उसके शब्द दूसरे व्यक्ति को सुख देंगे या दुख.

10)  गुस्से में भी गाली न दें. क्रोध आने पर अश्लील शब्दों और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. ऐसे समय में वाणी पर नियंत्रण रखना या मौन रहना बेहतर है.

11)  किसी की कमी दूसरों को न बताएं. यदि किसी व्यक्ति में कोई कमी दिखाई देती है, तो उसकी चर्चा दूसरों से करने के बजाय सीधे उसी व्यक्ति से बात करनी चाहिए. ऐसा करने से चुगली और निंदा से बचा जा सकता है.

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12)  व्यर्थ की बातचीत में समय बर्बाद न करें. घंटों बैठकर दूसरों के बारे में अनावश्यक बातें करने के बजाय समय का उपयोग भगवान के स्मरण और अच्छे कामों में करना चाहिए.

13)  ईमानदारी से कमाए धन का इस्तेमाल करें. महाराज ने बेईमानी, घूसखोरी, चोरी, छल-कपट और हिंसा से कमाए गए धन से बचने की बात कही. उनके अनुसार, व्यक्ति को ईमानदारी से कमाई करनी चाहिए और उसी से अपने परिवार का पालन-पोषण करना चाहिए.

14)  निरर्थक गतिविधियों से बचें. उन्होंने कहा कि ऐसे कामों में समय नहीं गंवाना चाहिए, जिनसे कोई लाभ न हो और जिनमें भगवान का स्मरण भी छूट जाए. जीवन का हर क्षण कीमती है.

15)  हल्का और उचित भोजन करें. महाराज ने ऐसा भोजन करने की सलाह दी, जो शरीर के लिए अनुकूल हो और भजन में बाधा न बने. उन्होंने अधिक और भारी भोजन से बचने पर जोर दिया.

16) अपने आध्यात्मिक अनुभवों का प्रदर्शन न करें. यदि किसी साधक को भजन के दौरान कोई अनुभव होता है, तो उसे आम लोगों के सामने अपनी उपलब्धि की तरह नहीं बताना चाहिए.

17)  भक्ति का अहंकार न करें. चाहे व्यक्ति कितना भी जप, तप या तीर्थयात्रा करे, उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि यह सब उसकी अपनी योग्यता के कारण हुआ है. अपनी उपलब्धियों को भगवान की कृपा मानना चाहिए.

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18) दूसरों को सम्मान दें और खुद मान-सम्मान की अपेक्षा न रखें. महाराज ने कहा कि जो भी व्यक्ति सामने आए, उसका सम्मान करना चाहिए. लेकिन खुद सम्मान पाने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए.

19)  अपने गुणों का दिखावा न करें. व्यक्ति में कितने भी अच्छे गुण क्यों न हों, उन्हें प्रदर्शित करके अहंकार नहीं करना चाहिए. अपने भीतर विनम्रता बनाए रखनी चाहिए.

20)  शरीर के अत्यधिक श्रृंगार से बचें. उन्होंने कहा कि आधुनिक दिखावे और शरीर को सजाने-संवारने में बहुत अधिक ध्यान लगाने से बचना चाहिए. हालांकि, भगवान को अर्पित चंदन, तिलक, माला और गुरु से मिली कंठी को उन्होंने अलग बताया.

भक्ति में धैर्य और विनम्रता जरूरी

प्रेमानंद महाराज ने कहा कि इन बातों को जीवन में उतारने से व्यक्ति में निरपेक्षता, शांति और विनम्रता जैसे गुण विकसित हो सकते हैं. वह दूसरों से अनावश्यक अपेक्षाएं रखना छोड़ सकता है और सुख-दुख के बीच भी संतुलन बनाए रख सकता है.

उन्होंने भक्तों को समझाया कि जीवन में सम्मान मिले या अपमान, अनुकूलता आए या विपरीत परिस्थितियां, भगवान का स्मरण नहीं छोड़ना चाहिए. किसी के प्रति क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष पालने के बजाय क्षमा और परोपकार की भावना रखनी चाहिए.

प्रवचन का मुख्य संदेश यही था कि भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है. व्यक्ति की वाणी, व्यवहार, कमाई, खान-पान और दूसरों के प्रति उसका रवैया भी उसकी साधना का हिस्सा है. धैर्य, सच्चाई और विनम्रता के साथ जीवन जीना ही भगवान के प्रति समर्पण का रास्ता है.
 

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