सपा के मुस्लिम नेताओं का ही एक-एक कर विकेट गिरा रहीं रुचि वीरा, मुरादाबाद में किसका रहेगा वर्चस्व?

मुरादाबाद में समाजवादी पार्टी की सियासत को लेकर सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है. मुस्लिम बहुल वाले मुरादाबाद में रुचि वीरा का दबदबा बढ़ रहा है. रुचि वीरा ने सबसे पहले अपनी सियासी राह से तत्कालीन सांसद एसटी हसन को हटाया और अब कमाल अख्तर को निपटा दिया है.

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एसटी हसन के बाद कमाल अख्तर का विकेट रुचि वीरा ने गिराया (Photo-ITG) एसटी हसन के बाद कमाल अख्तर का विकेट रुचि वीरा ने गिराया (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 02 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:07 AM IST

उत्तर प्रदेश की सियासत में सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपने सियासी वनवास को तोड़ने का तानाबान बुन रहे, लेकिन मुरादाबाद में सपा के नेताओं की बीच अलग ही शह-मात का खेल चल रहा है. यह कवायद मुरादाबाद की सियासत पर अपना अधिपत्य जमाने की है. सपा की लोकसभा सांसद रुचि वीरा फिलहाल कांठ से सपा के कद्दावर विधायक कमाल अख्तर पर भारी पड़ गई है. 

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मुरादाबाद से रुचि वीरा सपा की मौजूदा लोकसभा सांसद हैं तो कमाल अख्तर मुरादाबाद जिले की कांठ विधानसभा सीट से विधायक हैं. सपा के इन दोनों नेताओं का गृहक्षेत्र मुरादाबाद नहीं है बल्कि सियासी कर्मभूमि है. रुचि वीरा बिजनौर से आती हैं और मुरादाबाद को अपने राजनीति क्षेत्र चुनने के बाद से एक के बाद एक मुस्लिम विकेट गिराती जा रहीं. 

रुचि वीरा ने मुरादाबाद को अपनी कर्मभूमि बनाने का फैसला किया तो सबसे पहले मुरादाबाद दे मौजूदा सांसद रहे डा. एसटी हसन को निपटाया. अब जब  सपा विधायक कमल अख्तर ने मुरादाबाद की सियासत में उन्हें चुनौती देने की कोशिश की तो रुचि वीरा ने उनका भी विकेट गिरा दिया है. 

रुचि वीरा का पहला शिकार एसटी हसन 
मुरादाबाद की सियासत में डा. एसटी हसन ने आजम खान की उंगली पकड़कर राजनीतिक जगह बनाई. सपा के टिकट पर पहले मेयर बने और 2019 में लोकसभा सांसद चुने गए. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 2024 चुनाव में एसटी हसन का टिकट कन्फर्म कर दिया था. इसके बाद उन्होंने अपना नामांकन भी दाखिल कर चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया था, लेकिन उनकी राह में सबसे बड़ी बाधा रुचि वीरा बनी. 

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रुचि वीरा बिजनौर से आती हैं और बिजनौर से विधायक भी रही हैं. आजम खान की करीबी मानी जाती है. मुस्लिम बहुल सीट मुरादाबाद होने से जीत की संभावना को देखते हुए रुचि वीरा ने आजम खान को कोटे से मुरादाबाद सीट टिकट की दावेदारी कर दी. 

आजम खान की परंपरागत सीट रामपुर से मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी को अखिलेश यादव ने अपनी मर्जी से टिकट दे दिया था, जिससे आजम नाराज थे. ऐसे में उन्होंने अपना कैंडिडेट तक उतारने की चेतावनी दे दी थी. अखिलेश ने रामपुर की सीट से टिकट न बदलकर आजम की पसंद का टिकट रुचि वीरा को मुरादाबाद में दे दिया, जिसके चलते एसटी हसन को अपना नामांकन वापस लेना पड़ा. एसटी हसन के रूप में पहला विकेट रुचि वीरा ने गिराया और मुरादाबाद से सांसद बनी. 

कमाल अख्तर दूसरा शिकार बने
मुरादाबाद के सियासी समीकरण के चलते रुचि वीरा भारी मतों से सांसद बनी. यहीं से शुरू होते ही मुरादाबाद की सियासत में वर्चस्व की जंग. अमरोहा के हसनपुर सीट छोड़कर 2022 में मुरादाबाद की कांठ विधानसभा सीट को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले कमाल अख्तर और रुचि वीरा की सियासी अदावत. आजम खान खेमे से होने के चलते कमाल अख्तर भी रुचि वीर को मुरादाबाद में पचा नहीं पा रहे हैं, जिसके चलते उन्हें राजनीतिक रूप से निपटने की कवायद में लगे थे. 

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कमाल अख्तर सपा के दिग्गज नेता हैं, राज्यसभा सांसद से लेकर विधायक और मंत्री रह चुके हैं. मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव के करीबी माने जाते हैं. विधानसभा में सपा के मुख्य सचेतक थे और मुरादाबाद की सियासत में सबसे बड़े चेहरा माने जाते हैं. 

मुरादाबाद में सपा की हुई पीडीए चौपाल का आयोजन कमाल अख्तर ने कराया था  जिसमें स्थानीय सांसद रुचि वीरा को न बुलाया गया और न ही कार्यक्रम के बैनर पर उनकी फोटो लगी थी. इस बात को लेकर रुचि वीरा ने नारजगी जाहिर किया और बात अखिलेश यादव तक पहुंची. रुचि वीरा और कमाल अख्तर को अखिलेश ने लखनऊ में 25 जून को बुलाया. सपा अध्यक्ष ने दोनों के साथ बैठक कराई, लेकिन दोनों की तल्खी खत्म नहीं हुई बल्कि कहासुनी भी हुई. 

रुचि वीरा को आजम खान की करीबी होने का लाभ मिला और अखिलेश यादव ने आखिरकर कमाल अख्तर के पर कतरे दिए. कमाल अख्तर को विधानसभा में मुख्य सचेतक पद से फरमान सुना दिया, जिसके बाद वो अपना इस्तीफा स्पीकर को सौंप दिया. हालांकि कमाल अख्तर ने इसे रूटीन प्रक्रिया बताकर राजनीतिक गुटबाजी से बचते नज़र आए,लेकिन राजनीतिक पंडित भी जानते हैं कि यह कमाल का इस्तीफा रूटीन प्रक्रिया नहीं है. इसे रुचि वीरा की राजनीतिक हनक कहें या
सियासी चक्रव्यूह. 

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मुरादाबाद में तीसरा विकेट किसका गिरेगा
मुरादाबाद से सांसद चुने जाने जाने के ढाई साल में रुचि वीरा ने जिले के स्थापित दो बड़े मुस्लिम नेता का विकेट गिराने में कामयाब हो गईं.2024 में तत्कालीन सांसद एसटी हसन का मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र से टिकट कटवाकर अपने लिए संसद जाने का रास्ता बनाया और अब कमाल अख्तर को आउट किया है. अब रुचि वीरा के राह में सियासी बाधा बनने वाला सपा का तीसरा नेता कौन होगा?

सपा नेताओं की माने तो मुरादाबाद सांसद रुचि वीरा मुरादाबाद शहर विधानसभा सीट से 2027 में अपनी बेटी स्वाति वीरा को चुनाव लड़ाना चाहती हैं. स्वाति वीरा बिजनौर से नगर पालिका और जिला पंचायत का चुनाव लड़ चुकी है. रुचि वीरा अब मुरादाबाद से सांसद है तो शहर सीट से अपनी बेटी को विधायक बनाना चाहती है, क्योंकि सियासी समीकरण उनके पक्ष में दिख रहे. शहर सीट पर वैश्य और मुस्लिम समीकरण के बदौलत वो दावेदारी कर रही हैं. 

मुरादाबाद शहर सीट से बीजेपी के रितेश गुप्ता दूसरी बार विधायक हैं, लेकिन सपा के टिकट पर 2012 में युसुफ अंसारी विधायक बने थे. इसके बाद से युसुफ अंसारी दो चुनाव हार चुके हैं और तीसरी बार चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में है, लेकिन रुचि वीरा जिस तरह से खुद मुरादाबाद से सांसद बनी हैं, उसी तर्ज पर अपनी बेटी को विधायक बनाना चाहती हैं. वैश्या और मुस्लिम समीकरण के बदौलत वो दावेदारी कर रही हैं. ऐसे में अगर रुचि वीरा की बेटी को टिकट मिलता है तो फिर युसुफ अंसारी सहित शहर सीट पर दावेदारी करने वाले मुस्लिम नेताओं की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है. 

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मुरादाबाद की सियासत पर वर्चस्व की जंग
सपा में सियासी घमासान के पीछे मुरादाबाद की सियासत पर अपना अधिपत्य जमाने की है. कमाल अख्तर विधायक हैं और अखिलेश यादव के करीबी हैं. मुस्लिम समुदाय से होने के नाते अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है, जिसके लिए रुचि वीरा को न ही अपने कार्यक्रम में बुलाते हैं और न ही उनकी तस्वीर अपने किसी कार्यक्रम में लगाते हैं. रुचि वीरा सपा के दिग्गज नेता आजम खान की करीबी मानी जाती है. मुरादाबाद की सियासत पर हमेंशा से आजम खान की पकड़ रही है, जिसके चलते ही रुचि वीरा को मुस्लिम बहुल सीट अपने कोटे से सांसद बनवाया. 

रुचि वीरा के बढ़ते सियासी कद के चलते  कमाल अख्तर खुद को असहज मान रहे हैं. कमाल अख्तर की नजर मुरादाबाद की सियासत पर है. रुचि वीरा और साथ में उसकी बेटी को मुरादाबाद से टिकट मिलता है कि मुरादाबाद की सियासत में मां-बेटी जोड़ी मजबूत हो सकती है. अब देखना है कि इस शह-मात के खेल में कौन किस पर भारी पड़ता है? 

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