एक दौर था जब पूर्वांचल के जिलों में हर साल गर्मी और बरसात के मौसम में एन्सेफलाइटिस नाम की बीमारी बच्चों पर कहर बनकर टूटती थी. सैकड़ों बच्चों की मौत होती थी, हजारों बच्चे आजीवन अपंग हो जाते थे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 1996 से ही इस बीमारी के खात्मे के लिये लगातार प्रयासरत रहे, लेकिन उन्हें इस बीमारी के खिलाफ अंतिम जंग छेड़ने का मौका तब मिला जब वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. उन्होंने 2017 में सीएम पद की शपथ लेने के बाद इस बीमारी के खात्मे को एक मिशन के रूप लिया और आज एन्सेफलाइटिस उत्तर प्रदेश में अंतिम सांसें गिन रहा है. उत्तर प्रदेश में एन्सेफलाइटिस पूरी तरह नियंत्रण में है और इसके उन्मूलन की बस घोषणा बाकी है. हालांकि, एक समय ऐसा भी था जब इस बीमारी पर नियंत्रण के लिए सीएम योगी के प्रयासों का मजाक भी उड़ाया गया.
इस साल फरवरी में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में परियोजनाओं के उद्घाटन के लिए पहुंचे थे तो उन्होंने अपने संबोधन में कहा था, '1970 के दशक से लेकर 2017 तक एन्सेफलाइटिस को समाप्त करने के बारे में सरकारें सोचती तक नहीं थीं. मुख्यमंत्री बनने के बाद मैंने इस बीमारी के उन्मूलन के बारे में मॉडल तैयार करने पर विचार किया. इसी सिलसिले में कुशीनगर में मुसहर समुदाय बीच जाकर स्वच्छता अभियान चलाया. उन्हें स्वच्छता के तरीके समझाए, साबुन के प्रयोग की जानकारी दी. तब मुझ पर तीन दिन मीडिया ट्रायल चला. हंसी उड़ायी गई कि एक मुख्यमंत्री गरीबों को साबुन बांट रहा है. लेकिन कोरोना महामारी में सबको साबुन और स्वच्छता की बात समझ में आई.'
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पूर्वांचल के सभी जिले हर साल झेलते थे इस बीमारी का प्रकोप
मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने प्रत्येक वर्ष मानसून शुरू होने से पहले वेक्टर बॉन्ड और वाटर बॉन्ड डिजीज के खिलाफ विशेष अभियान की शुरुआत की. दस्तक अभियान चलाकर लोगों को एन्सेफलाइटिस की बीमारी के बारे में जागरूक किया गया. पूर्वांचल के सभी जिले हर साल इस बीमारी का प्रकोप झेलते थे. बिहार और नेपाल तक के मरीज एन्सेफलाइटिस के इलाज के लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर आते थे. एक समय था जब पूर्वी उत्तर प्रदेश में हर साल 1200 से 1500 बच्चे एन्सेफलाइटिस की चपेट में आने से दम तोड़ देते थे. सीएम योगी ने 2017 में एन्सेफलाइटिस प्रभावित बच्चों के इलाज के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर एन्सेफलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर बनाने के निर्देश दिए.
साथ ही एन्सेफलाइटिस के मामलों और उससे होने वाली मौतों के लिए कई वर्षों तक सुर्खियां बटोरने वाले बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था को भी मजबूत किया. बीआरडी मेडिकल कॉलेज में डेडीकेटेड एन्सेफलाइटिस हॉस्पिटल और ब्लॉक तैयार किया गया. हर जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर जिला अस्पताल तक एन्सेफलाइटिस के वार्ड बनाए गए और डॉक्टरों की व्यवस्था की गई. इसका असर यह हुआ कि प्राथमिक स्तर पर मरीजों को मिले इलाज से धीरे-धीरे जापानी एन्सेफलाइटिस और एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम के मरीजों की संख्या कम होती गई. उत्तर प्रदेश ने 2017 में वह दिन भी देखा जब गोरखपुर बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन सप्लाई बाधित होने के चलते 67 बच्चों की मौत हो गई. इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया.
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CM योगी के प्रयासों से यह बीमारी यूपी में अंतिम सांसें गिन रही
इस बीमारी को लेकर बीआरडी मेडिकल कॉलेज में साल 2020 से अगस्त 2024 के बीच के आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2020 में एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम के 565 मामलों में 57 मौतें और जापानी एन्सेफलाइटिस के 57 मामलों में 5 मौतें हुईं. वहीं 2021 में एईएस के 581 मामलों में 81 मौतें और जेई के 57 मामलों में 2 मौतें दर्ज की गईं. इसी तरह 2022 में एईएस के 238 मामलों में 28 और जेई के 22 मामलों में 3 मौतें हुईं. साल 2023 में एईएस के 319 मामलों में 17 मौतें और जेई के 43 मामलों में 0 मौत हुई. अगस्त 2024 में एईएस के 60 मामलों में 9 मौतें और जेई के 10 मामलों में 5 मौतें हुई हैं. यानी एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम और जापानी एन्सेफलाइटिस दोनों ही बीमारियों का प्रभाव बहुत कम हो चुका है. केस लगातार घट रहे हैं.
उत्तर प्रदेश सरकार के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने हालिया बजट सत्र में सदन को सूचित किया था कि एन्सेफलाइटिस की बीमारी लंबे समय से बड़ी समस्या बनी हुई थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसमें काफी सुधार हुआ है. एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोंम के रोगियों में 76 फीसदी और मृत्युदर में 98 फीसदी की कमी आई है, जबकि जापानी एन्सेफलाइटिस के रोगियों में 85 फीसदी और मृत्युदर में 96 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में एन्सेफलाइटिस की बीमारी पहली बार 1978 में अक्टूबर और नवंबर के दौरान रिपोर्ट हुई थी. उस साल 3500 से अधिक मामले सामने आए थे और 1100 मरीजों की मौत हुई थी.
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एन्सेफलाइटिस का सबसे विनाशकारी प्रकोप गोरखपुर जिले में 2005 में देखने को मिला था, जब 6061 मामले सामने आए थे और 1500 मौतें हुई थीं. इसके बाद 2006 में 2320 मामले सामने आए और 528 मौतें हुईं. 2007 में 3024 मामले सामने आए और 645 मौतें हुईं. नतीजतन 2006 में जापानी एन्सेफलाइटिस टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हुआ और 2014 में राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा बना. इस वैक्सीनेशन प्रोग्राम के तहत उन 9 राज्यों के 179 जिलों में टीका उपलब्ध कराया जाता है, जहां यह बीमारी ज्यादा घातक है. एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम मुख्यरूप से बच्चों और युवा वयस्कों को प्रभावित करता है.
इस बीमारी को लेकर बहुत संवेदनशील रहे हैं मुख्यमंत्री योगी
एईएस के कारण रोगी को तेज बुखार आता है और कई प्रकार की न्यूरोलॉजिकल समस्याओं जैसे मानसिक भ्रम या कोमा में जाने का भी खतरा होता है. ऐसे ही जापानी एन्सेफलाइटिस मच्छर जनित वायरल संक्रमण है. वायरस से संक्रमित मच्छरों के काटने से इसके इंसानों में फैलाने का खतरा होता है. यह वायरस घोड़ों और सुअरों को भी संक्रमित कर सकता है. इंसानों की बात करें तो जापानी एन्सेफलाइटिस से बच्चों के संक्रमित होने का खतरा अधिक होता है. जापानी एन्सेफलाइटिस को स्थानीय भाषा में दिमागी बुखार भी कहा जाता है. गंदगी और अशुद्ध पेयजल या जलजमाव के कारण इस रोग का प्रसार होता है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जब गोरखपुर के सांसद थे तबसे ही वह इस बीमारी को लेकर बहुत संवेदनशील थे. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस बीमारी के उन्मूलन के लिए विशेष अभियान चलाया, जिसका परिणाम दिखने लगा है.
कुमार अभिषेक / सत्यम मिश्रा