ग्रेटर नोएडा वेस्ट में एक ऐसा गांव जहां आज भी होती है रावण की पूजा, नहीं होता दहन

दशहरे पर जहां पूरा देश रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है, वहीं ग्रेटर नोएडा वेस्ट का बिसरख गांव बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है. यहां रावण को जन्मभूमि का गौरव प्राप्त है, उनकी प्रतिदिन पूजा होती है और गांव की परंपरा के चलते आज तक न रामलीला होती है, न रावण का पुतला जलाया जाता है.

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बिसरख की अनकही कहानी.(Photo: AI-generated) बिसरख की अनकही कहानी.(Photo: AI-generated)

अरुण त्यागी

  • ग्रेटर नोएडा वेस्ट,
  • 03 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 6:25 PM IST

देशभर में हर साल दशहरे पर रावण दहन के जरिए बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है. जगह-जगह रामलीला का मंचन होता है और शाम होते ही रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले आग के हवाले कर दिए जाते हैं. लेकिन ग्रेटर नोएडा वेस्ट में एक ऐसा गांव भी है, जहां दशहरे का मतलब बिल्कुल अलग है.

दरअसल, इस गांव का नाम बिसरख है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसे रावण की जन्मभूमि माना जाता है. यही वजह है कि यहां आज भी रावण की पूजा की जाती है. इतना ही नहीं, गांव की सीमा के भीतर न तो रामलीला का मंचन होता है और न ही दशहरे पर रावण दहन किया जाता है. इसके बजाय इस दिन गांव में शोक का माहौल रहता है.

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आजतक की टीम जब बिसरख स्थित रावण मंदिर पहुंची तो वहां के महंत रामदास से बातचीत की. उन्होंने बताया कि मंदिर में प्रतिदिन सुबह और शाम रावण की विधिवत पूजा होती है. उनके अनुसार, गांव की सदियों पुरानी परंपरा आज भी उसी तरह निभाई जा रही है.

रावण को श्रेष्ठ ब्राह्मण मानते हैं ग्रामीण

महंत रामदास का कहना है कि रावण केवल लंका का राजा नहीं बल्कि एक श्रेष्ठ ब्राह्मण और महान विद्वान थे. उन्होंने दावा किया कि रावण भगवान ब्रह्मा के परम भक्त थे और उन्होंने ऐसा कोई कर्म नहीं किया, जिसके कारण उनका पुतला जलाया जाए.

महंत ने यह भी कहा कि रावण माता सीता का हरण करके उन्हें अशोक वाटिका जरूर ले गए थे, लेकिन वहां उन्होंने माता सीता को अपनी मां के समान सम्मान दिया. उनके मुताबिक, इसी कारण यहां के लोग रावण को पूजनीय मानते हैं और उनके सम्मान में मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना करते हैं.

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महंत रामदास के अनुसार, बिसरख गांव की पहचान केवल रावण मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की धार्मिक मान्यताएं भी देश के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग हैं. यही वजह है कि दशहरे के दिन यहां रावण दहन की परंपरा कभी शुरू ही नहीं हुई.

दहन की कोशिश करने वालों के साथ 'बुरा होने' का दावा

महंत रामदास ने बताया कि गांव की एक प्राचीन मान्यता के कारण यहां कभी रामलीला का मंचन नहीं किया जाता. उनका कहना है कि यदि कोई गांव में रामलीला आयोजित करने या रावण दहन कराने की कोशिश करता है तो उसके साथ अच्छा नहीं होता.

उन्होंने दावा किया कि कुछ वर्ष पहले मीडिया से जुड़े कुछ लोगों के कहने पर गांव में रावण का पुतला दहन कराया गया था. इसके बाद जिन लोगों ने यह आयोजन कराया, उनके साथ बुरा हुआ. हालांकि इस दावे के समर्थन में कोई स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध नहीं है.

महंत ने यह भी बताया कि यदि किसी धार्मिक आयोजन में रामायण का पाठ या प्रसंग होता भी है तो उसमें भगवान राम और रावण के युद्ध का मंचन नहीं किया जाता. गांव के लोग अपनी परंपरा का पालन करते हुए इस हिस्से को मंचन से अलग रखते हैं.

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रावण की शक्ति को लेकर महंत का बड़ा दावा

रावण को खलनायक कहे जाने के सवाल पर महंत रामदास ने अलग ही दृष्टिकोण रखा. उन्होंने कहा कि इस पृथ्वी पर केवल दो सबसे बड़े खलनायक हुए हैं, एक भगवान परशुराम और दूसरे रावण. उनके मुताबिक, दोनों ही अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली व्यक्तित्व थे.

महंत ने दावा किया कि रावण इतना पराक्रमी था कि शनि उसके पैरों के नीचे रहते थे, इंद्र उसके लिए पानी भरते थे और पवनदेव झाड़ू लगाते थे. उनके अनुसार, रावण जैसा शक्तिशाली व्यक्ति इस धरती पर दूसरा नहीं हुआ.

उन्होंने यह भी कहा कि बिसरख का रावण मंदिर अत्यंत प्राचीन माना जाता है. चूंकि इस स्थान को रावण की जन्मभूमि माना जाता है, इसलिए यहां केवल रावण ही नहीं बल्कि भगवान राम, भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा की भी पूजा की जाती है. यही परंपरा इस गांव को देश के बाकी हिस्सों से अलग पहचान देती है.

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