डोर-टू-डोर बैंकिंग की सुविधा... बदली यूपी के इस गांव की सूरत, 'BC सखी' योजना से आत्मनिर्भर बनीं महिलाएं

यूपी के चंदौली की रहने वाली ज्योति का कहना है कि बीसी सखी योजना से जुड़ने के बाद से वह इतनी सक्षम हो चुकी हैं कि अपने बच्चों की फीस जमा कर सकती हैं और अपने परिवार को भी सुचारू रूप से चला सकती हैं.

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सरकार की योजना से ग्रामीण इलाकों के लोगों को दरवाजे पर ही बैंकिंग समेत कई तरह की सुविधाओं का लाभ मिल रहा है. (Photo: ITG) सरकार की योजना से ग्रामीण इलाकों के लोगों को दरवाजे पर ही बैंकिंग समेत कई तरह की सुविधाओं का लाभ मिल रहा है. (Photo: ITG)

उदय गुप्ता

  • चंदौली,
  • 10 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 7:25 AM IST

यूपी में बैंकिंग सेवाओं के साथ-साथ कई अन्य सुविधाएं घर-घर तक पहुंचाने के मकसद से राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत ग्राम पंचायत स्तर पर बैंक कॉरेस्पोंडेंट सखी यानी बीसी सखी की नियुक्ति की गई है. इसके तहत बीसी सखी अपने गांव के पंचायत भवन में बने दफ्तर में बैठकर या फिर घर-घर जाकर लोगों को बैंकिंग समेत कई अन्य सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं.

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सरकार की इस योजना से ग्रामीण इलाकों के लोगों को अपने दरवाजे पर ही बैंकिंग समेत कई तरह की सुविधाओं का लाभ मिल रहा है. वहीं, इस योजना से जुड़ने के बाद बीसी सखी के रूप में काम करने वाली महिलाओं के जीवन स्तर में भी काफी बदलाव आया है. इस योजना से जुड़ी महिलाएं न सिर्फ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि उनके अंदर आत्मविश्वास भी विकसित हो रहा है.

चंदौली के नवही गांव की रहने वाली ज्योति विश्वकर्मा ने एमए तक की पढ़ाई की है. वह करीब चार साल पहले, 2022 में इस योजना से जुड़ी थीं. सबसे पहले वह एक समूह से जुड़ीं, जहां से उन्हें 75 हजार रुपये का लोन मिला. इसमें से कुछ पैसों से उन्होंने मशीन खरीदी और बाकी पैसों से बैंकिंग का काम शुरू किया.

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अपने इस सफर के बारे में ज्योति विश्वकर्मा बताती हैं कि इस योजना से जुड़ने से पहले वह घर के कामकाज और परिवार की देखभाल करती थीं. वह पढ़ी-लिखी थीं, लेकिन ग्रामीण परिवेश में रहने की वजह से घर से बाहर निकलकर काम करने में उन्हें झिझक होती थी.

लेकिन अब ज्योति विश्वकर्मा बड़े गर्व से कहती हैं कि जब से वह बैंक कॉरेस्पोंडेंट सखी बनी हैं, तब से लोग उन्हें दीदी के नाम से बुलाते हैं. ज्योति विश्वकर्मा आगे बताती हैं कि आज वह इतनी सक्षम हो चुकी हैं कि अपने बच्चों की फीस जमा कर सकती हैं और अपने परिवार को भी सुचारू रूप से चला सकती हैं.

अपने कामकाज के बारे में ज्योति बताती हैं कि पंचायत भवन में उन्हें एक कुर्सी और टेबल मिली है, जहां बैठकर वह अपना काम करती हैं. जब कोई अक्षम महिला या व्यक्ति फोन करके उन्हें बैंकिंग या किसी अन्य काम के लिए मदद मांगता है, तो वह उनके घर जाकर भी सेवाएं देती हैं. अगर किसी को पैसे निकालने होते हैं, तो वह पैसे देती हैं. वहीं, अगर किसी के खाते में पैसे जमा करने होते हैं, तो वह यह काम भी आसानी से कर देती हैं.

ज्योति विश्वकर्मा की तरह बैंक कॉरेस्पोंडेंट सखी के रूप में काम करने वाली नासरीन बानो भी सफलता की नई कहानी गढ़ रही हैं. नासरीन बानो चंदौली जिले के सदर ब्लॉक के नेगुरा गांव की रहने वाली हैं. उनके पति वेल्डिंग का काम करते हैं. परिवार में सास-ससुर, देवर-देवरानी और उनके बच्चे हैं.

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नासरीन बानो चार साल पहले इस योजना से जुड़ी थीं और बैंक कॉरेस्पोंडेंट सखी के रूप में काम करना शुरू किया था. घर का कामकाज निपटाने के बाद वह अपने गांव के पंचायत भवन पहुंचती हैं और वहां लोगों को बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराती हैं. इसके साथ ही, जरूरत पड़ने पर वह घर-घर जाकर भी लोगों को बैंकिंग समेत अन्य सुविधाएं देती हैं.

अपने इस सफर के बारे में नासरीन बानो बताती हैं कि वह पिछले चार साल से इस योजना से जुड़ी हैं. घर और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के बाद वह पंचायत भवन आती हैं और लोगों को पैसे निकालने से लेकर जमा करने तक की सुविधा देती हैं. लोग यहां आते हैं और वह उन्हें इन सेवाओं का लाभ देती हैं. इसके अलावा, वह लोगों को लोन जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराती हैं.

नासरीन बानो बताती हैं कि पहले वह घर पर ही रहती थीं और कोई काम नहीं करती थीं. सबसे पहले वह एक समूह से जुड़ीं और फिर बैंक कॉरेस्पोंडेंट सखी बनीं. इस योजना से जुड़ने के बाद उन्होंने घर से बाहर निकलकर काम करना शुरू किया. जब उन्हें इससे आर्थिक लाभ मिलने लगा, तो वह पूरे मन से इस काम में जुट गईं.

नासरीन कहती हैं कि अब  वह अपने बच्चों की जरूरतें पूरी करती हैं और उनके लिए किताबें, दवाइयां जैसी जरूरी चीजें भी खरीदती हैं. अपने जीवन में आए बदलाव के बारे में नासरीन बताती है कि अब उन्हें किसी भी चीज के लिए अपने पति पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. वह अपने खर्च खुद उठा लेती हैं.

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