इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज ने कोडीन कफ सिरप मामले में सुनवाई से खुद को किया अलग, इस बात पर जताई कड़ी नाराजगी

कोडीन कफ सिरप मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने जज तक निजी पहुंच बनाने के कथित प्रयास पर कड़ी नाराजगी जताते हुए खुद को मामले से अलग कर लिया और इसे काला दिन बताया.

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जज ने न्यायपालिका की गरिमा और निष्पक्षता पर बड़ा बयान दिया (ITG) जज ने न्यायपालिका की गरिमा और निष्पक्षता पर बड़ा बयान दिया (ITG)

पंकज श्रीवास्तव

  • प्रयागराज ,
  • 31 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 9:57 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने कोडीन युक्त कफ सिरप मामले के मुख्य आरोपी भोला जायसवाल समेत 75 आरोपियों की जमानत याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है. फैसला सुरक्षित रखने से पहले वादकारी पक्ष की ओर से पीठासीन न्यायाधीश तक निजी माध्यमों से संपर्क साधने का प्रयास किया गया था. इस घटनाक्रम के सामने आने के बाद जज ने कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे हाईकोर्ट के इतिहास का काला दिन करार दिया. न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए न्यायाधीश ने सभी याचिकाओं को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजकर किसी अन्य पीठ को सौंपने का निर्देश दिया.

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न्यायपालिका की गरिमा और निष्पक्षता पर बड़ा बयान

अदालत ने कहा कि फैसला सुरक्षित रखने से पहले न्यायाधीश तक निजी पहुंच बनाने की कोशिश न्यायिक व्यवस्था की गरिमा पर गंभीर आघात है. न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसे में फैसला किसी के पक्ष में आता है, तो निष्पक्षता पर अनावश्यक संदेह पैदा हो सकता है. न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि निष्पक्ष रूप से होता हुआ दिखना भी चाहिए.

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संवैधानिक सिद्धांतों और अधिवक्ता नैतिकता का उल्लंघन

कोर्ट ने कहा कि लंबित मामले में न्यायाधीश तक निजी संपर्क का प्रयास न्यायिक आचरण, अधिवक्ता नैतिकता और संवैधानिक स्वतंत्रता के खिलाफ है. न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक की संवैधानिक गारंटी है और इसे प्रभावित करने की कोशिश न्याय व्यवस्था पर सीधा हमला है. इसलिए इन मामलों को दोबारा इस पीठ के समक्ष सूचीबद्ध न करने का निर्देश दिया गया है.

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FIR रद्द कराने से लेकर नियमित जमानत तक की स्थिति

मामले के आरोपियों ने पहले प्राथमिकी रद्द कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ खंडपीठ का रुख किया था, लेकिन सभी याचिकाएं खारिज हो गई थीं. इसके बाद अदालत ने अग्रिम जमानत की मांग भी ठुकरा दी थी. अब गिरफ्तार आरोपियों की नियमित जमानत याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी, जिसके दौरान यह अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आया.

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