वर्क फ्रॉम होम में अगर बॉस आपसे पूरे दिन लैपटॉप का कैमरा ऑन रखने को कहे तो क्या आप ऐसा करेंगे? नीदरलैंड्स के एक कर्मचारी ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया. उसका कहना था कि वह 9 घंटे तक कैमरे के सामने बैठकर काम करने में सहज महसूस नहीं करता. कंपनी ने इसे मानने से इनकार किया और उसकी नौकरी चली गई. लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. कर्मचारी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और अब उसे करीब 80 लाख रुपये का मुआवजा मिला है.
डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला साल 2022 का है. नीदरलैंड्स में रहने वाला यह कर्मचारी अमेरिका की एक सॉफ्टवेयर कंपनी के लिए काम करता था. कंपनी ने वर्क फ्रॉम होम के दौरान उससे कहा कि वह काम के पूरे समय अपना लैपटॉप कैमरा ऑन रखे और अपनी स्क्रीन भी शेयर करे.
कर्मचारी स्क्रीन शेयर करने के लिए तैयार था, लेकिन पूरे दिन वेबकैम ऑन रखने पर उसने आपत्ति जताई. उसका कहना था कि कंपनी उसके लैपटॉप की गतिविधियों को पहले ही देख सकती है, ऐसे में 9 घंटे तक कैमरे के जरिए लगातार निगरानी रखना उसे ठीक नहीं लगता.
कर्मचारी ने कंपनी को ईमेल में अपनी परेशानी बताते हुए कहा था कि वह पूरे दिन कैमरे के जरिए मॉनिटर किए जाने में सहज महसूस नहीं करता. उसने इसे अपनी प्राइवेसी में दखल बताया.
कंपनी ने कहा- कैमरा ऑन करो या नौकरी छोड़ो
रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी का तर्क था कि घर से काम करने वाले कर्मचारी की निगरानी करना ऑफिस में बॉस के कर्मचारी पर नजर रखने जैसा ही है. कंपनी ने कर्मचारी को कैमरा ऑन करने के लिए कहा. लेकिन उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया. इसके बाद कंपनी ने उसे नौकरी से निकाल दिया. कर्मचारी को नौकरी से निकालने की वजह काम करने से इनकार और आदेश न मानना बताई गई.
नौकरी जाने के बाद कर्मचारी ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी. मामले की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि कर्मचारी ने काम करने से इनकार नहीं किया था. वह लैपटॉप पर काम करने और स्क्रीन शेयर करने के लिए तैयार था. उसकी आपत्ति सिर्फ पूरे समय वेबकैम ऑन रखने को लेकर थी.
रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत को कर्मचारी पर लगातार वेबकैम से निगरानी रखने की कोई स्पष्ट वजह भी नहीं मिली. इस मामले में कंपनी की ओर से कोई बचाव पेश नहीं किया गया और वह सुनवाई में भी शामिल नहीं हुई.
कंपनी को देने पड़े करीब 80 लाख रुपये
अदालत के आदेश के बाद कंपनी को अपने पूर्व कर्मचारी को करीब 75,000 यूरो यानी भारतीय करेंसी में लगभग 80 लाख रुपये देने पड़े. इस रकम में अलग-अलग मद शामिल थीं. कर्मचारी को नौकरी से निकालने के तरीके के लिए करीब 50,000 यूरो दिए गए. इसके अलावा नोटिस पीरियड का पालन नहीं करने पर 8,373.13 यूरो और वैधानिक ट्रांजिशन मुआवजे के तौर पर 9,501.47 यूरो देने का आदेश हुआ. इसके अलावा कर्मचारी की बकाया सैलरी और छुट्टियों से जुड़े भुगतान भी शामिल थे.
वर्क फ्रॉम होम में प्राइवेसी का सवाल
यह मामला सिर्फ एक कर्मचारी की नौकरी जाने तक सीमित नहीं है. इसके साथ वर्क फ्रॉम होम के दौरान कर्मचारियों की निगरानी का सवाल भी जुड़ा है. घर से काम करते समय कंपनियां कर्मचारियों की स्क्रीन, लॉगिन टाइम और दूसरी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल करती हैं. लेकिन इस मामले में कर्मचारी की आपत्ति खास तौर पर पूरे कामकाजी समय में कैमरा चालू रखने को लेकर थी.
उसका कहना था कि स्क्रीन शेयर करने से कंपनी उसके काम की निगरानी कर सकती है, लेकिन लगातार कैमरे के सामने बैठे रहना उसकी निजी जिंदगी और प्राइवेसी को प्रभावित करता है.
ऐसा मामला पहले भी आया है
वर्कप्लेस से जुड़ा यह मामला अकेला नहीं है. इससे पहले जुलाई में स्वीडन में एक हेल्थकेयर कर्मचारी ने दावा किया था कि नौकरी के पहले ही दिन उसे महज 47 सेकेंड की फोन कॉल में नौकरी से निकाल दिया गया.उस कर्मचारी के मुताबिक, वह काम शुरू होने से पहले पहुंच गया था, लेकिन उसे स्टाफ के लिए बने चेंजिंग रूम का पता नहीं चल पा रहा था. उसने वहां मौजूद कुछ लोगों से मदद मांगी, लेकिन उसे मदद नहीं मिली.
काम का समय नजदीक आने पर वह परेशान हो गया और एक सीढ़ियों वाले हिस्से में जाकर अपने मैनेजर को मैसेज किया. कर्मचारी का दावा था कि मैनेजर ने उसे फोन किया और नौकरी से निकाल दिया, जबकि उसने कुछ मिनट बाद काम शुरू करने की बात कही थी.
कर्मचारी का यह भी कहना था कि इंटरव्यू के दौरान उसने पहले ही बताया था कि अनजान परिस्थितियों में उसे घबराहट हो सकती है और ऐसे समय में खुद को संभालने के लिए उसे कुछ मिनट चाहिए होते हैं. उसके मुताबिक, मैनेजर ने उस समय इस बात को स्वीकार किया था.
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