सोचिए, आप एक छोटी-सी नाव में समंदर के बीच फंसे हैं. चारों तरफ दूर-दूर तक सिर्फ पानी नजर आ रहा है. न पीने के लिए साफ पानी है, न खाने का कोई इंतजाम और न ही किसी से संपर्क करने का रास्ता. दिन गुजरते हैं, महीने बीतते हैं, लेकिन मदद के लिए कोई नहीं आता. ऐसे में जिंदा रहना कितना मुश्किल होगा?
कुछ ऐसा ही हुआ था एल सल्वाडोर के रहने वाले मछुआरे सल्वाडोर अलवरेंगा के साथ. वह प्रशांत महासागर में एक छोटी नाव पर 438 दिनों तक भटकते रहे. इस दौरान उन्होंने भूख-प्यास, तूफान, अकेलेपन और अपने साथी की मौत तक का सामना किया. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार जिंदा किनारे तक पहुंचने में कामयाब रहे.
मछली पकड़ने का सफर, जो बन गई जिंदगी की सबसे बड़ी जंग
रीडर्स डाइजेस्ट के मुताबिक, सल्वाडोर अलवरेंगा 37 साल के थे और मैक्सिको में रहकर मछली पकड़ने का काम करते थे. 18 नवंबर 2012 को वह प्रशांत महासागर में मछली पकड़ने के लिए निकले. उनके साथ 22 साल के इजेकिएल कॉर्डोबा थे, जो इस काम में नए थे.
दोनों ने अपनी करीब 25 फीट लंबी नाव में मछली पकड़ने के लिए जरूरी सामान रखा था. इसमें एक बड़ा आइसबॉक्स भी था, जिसमें पकड़ी गई मछलियां रखी जानी थीं. उनका इरादा था कि 10 बजे सुबह निकलकर अगले दिन शाम 4 बजे तक वापस लौट आएंगे.
अलवरेंगा को चेतावनी मिली थी कि समुद्र में तूफान आने वाला है. लेकिन एक दिन में इतनी कमाई हो सकती थी कि पूरे हफ्ते का खर्च निकल जाए. इसी उम्मीद में उन्होंने समुद्र में जाने का फैसला किया.
दोनों तट से करीब 75 मील दूर थे, तभी रात करीब एक बजे मौसम बिगड़ने लगा. ऊंची लहरों ने नाव को बुरी तरह हिलाना शुरू कर दिया. नाव में पानी भरने लगा. कॉर्डोबा घबराकर चिल्लाए - हमें यहां से निकालो! वापस चलते हैं!
अलवरेंगा ने कॉर्डोबा को नाव से पानी बाहर निकालने को कहा और खुद मछली पकड़ने वाली लंबी रस्सी समेटने लगे. लेकिन लहरें इतनी तेज थीं कि पानी निकालने से पहले ही नाव दोबारा भर जाती थी.
आखिरकार अलवरेंगा को अपनी मछली पकड़ने वाली रस्सी काटनी पड़ी. इसके साथ ही हजारों डॉलर का सामान और पकड़ी गई मछलियां समुद्र में बह गईं. उन्होंने नाव का रुख मैक्सिको के चोकोहुइटल बंदरगाह की तरफ किया और अपने मालिक विली को रेडियो पर अपनी लोकेशन भी बता दी.लेकिन मुसीबत अभी खत्म नहीं हुई थी.
तट नजर आया, तभी नाव का इंजन बंद हो गया
अगली सुबह अलवरेंगा को दूर पहाड़ दिखाई देने लगे. उन्हें लगा कि अब किनारा ज्यादा दूर नहीं है. नाव तट से करीब 15 मील दूर थी, तभी उसका इंजन बंद हो गया. उन्होंने इंजन चालू करने के लिए कई बार रस्सी खींची, लेकिन वह भी टूट गई. अब नाव को चलाने का कोई तरीका नहीं बचा था.
अलवरेंगा ने रेडियो पर अपने मालिक को आवाज लगाई - विली, विली! अगर तुम मुझे बचाने आ रहे हो, तो अभी आ जाओ! उधर से जवाब मिला कि वे आ रहे हैं. लेकिन कुछ ही देर में रेडियो भी बंद हो गया. तेज हवा नाव को तट से दूर खुले समुद्र की तरफ धकेलती रही.
पांच दिन बाद हवा कुछ शांत हुई, लेकिन तब तक दोनों करीब 280 मील दूर समुद्र में पहुंच चुके थे. अब उन्हें बचाने का सबसे बड़ा सहारा किसी दूसरी नाव का वहां से गुजरना था. उनकी नाव पानी में काफी नीचे रहती थी, इसलिए दूर से उसे देख पाना बेहद मुश्किल था.अलवरेंगा को समझ आ गया कि वे ऐसी जगह फंस चुके हैं, जहां आमतौर पर मछुआरे भी नहीं आते.
समुद्र के बीच जिंदा रहना सबसे बड़ी चुनौती
समुद्र में फंसे दोनों लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी जिंदा रहने के लिए खाना और पानी जुटाना. दिन में तेज धूप उन्हें झुलसा देती थी, जबकि रात में ठंड से बचने के लिए दोनों आइसबॉक्स के अंदर दुबक जाते थे.
पानी की कमी इतनी बढ़ गई कि प्यास उनके लिए जुनून बन गई. भूख से परेशान अलवरेंगा ने एक बार बताया था कि हालत ऐसी हो गई थी कि वह अपने नाखून तक चबाने लगे थे.
करीब चार दिन बाद बारिश हुई. दोनों ने बारिश के पानी से खुद को भिगोया और पानी इकट्ठा किया. समुद्र में तैरती मिली प्लास्टिक की बोतलों में उन्होंने करीब पांच गैलन ताजा पानी जमा कर लिया. इसे बहुत संभालकर पीना था, ताकि कम से कम एक हफ्ते तक काम चल सके.
इंजन खराब होने के करीब 11 दिन बाद रात में उनकी नाव से एक कछुआ टकराया. अलवरेंगा ने उसे नाव पर खींच लिया. अब उन्हें खाने के लिए मांस और प्यास बुझाने के लिए उसका खून मिल गया.
इसके बाद अलवरेंगा समुद्र में कछुओं की तलाश करने लगे. वह कछुए के मांस को पतली पट्टियों में काटते, थोड़ा समुद्री पानी लगाते और धूप में रखकर खाते थे. मछलियों की हड्डियों का इस्तेमाल टूथपिक की तरह करते थे.
वह समुद्री पक्षियों को भी पकड़ने लगे. लेकिन कॉर्डोबा को कच्चे मांस और खून से घिन आने लगी थी. दोनों किसी तरह भोजन जुटा रहे थे, मगर धीरे-धीरे भूख और कमजोरी उनके शरीर पर भारी पड़ने लगी.
समुद्र में फंसे दोनों लोगों के लिए भूख के साथ मानसिक रूप से मजबूत बने रहना भी बड़ी चुनौती थी. कई बार कॉर्डोबा इतने परेशान हो जाते कि खाने के लिए संतरे और ताजा टॉर्टिला मांगने लगते. अलवरेंगा उन्हें बहलाने के लिए कहते, ठीक है, मैं दुकान पर जाकर देखता हूं कि खुली है या नहीं.
वह नाव पर ही कुछ देर टहलते और फिर लौटकर कहते कि दुकान अभी बंद है, लेकिन एक घंटे बाद खुलेगी और वहां ताजा टॉर्टिला भी मिल जाएंगे. उनकी यह बात सुनकर कॉर्डोबा शांत हो जाते और सो जाते.
समय के साथ दोनों की दोस्ती गहरी हो गई. रात में वे आसमान की तरफ देखते और तारों को जोड़कर नई आकृतियां बनाते थे. कभी-कभी आसमान में उड़ते विमान देखकर उम्मीद करते कि शायद कोई उन्हें बचाने आ रहा है. कॉर्डोबा अपने पसंदीदा धार्मिक गीत भी गाते थे. अलवरेंगा को उनका गाना सुनना अच्छा लगता था.
लेकिन दिसंबर के आखिर में एक घटना ने दोनों की जिंदगी और मुश्किल कर दी. क्रिसमस के आसपास दोनों ने एक समुद्री पक्षी खाया. कुछ देर बाद कॉर्डोबा के पेट में तेज दर्द होने लगा और उन्हें उल्टी जैसा महसूस हुआ. जब उन्होंने पक्षी का पेट काटकर देखा, तो उसके अंदर एक जहरीला सांप मिला. कॉर्डोबा शारीरिक रूप से तो संभल गए, लेकिन इस घटना के बाद उनके मन में कच्चे पक्षियों को खाने का डर बैठ गया. उन्होंने खाना लगभग छोड़ दिया.
साथी की मौत ने अलवरेंगा को अंदर तक तोड़ दिया
अगले दो महीनों में कॉर्डोबा का शरीर लगातार कमजोर होने लगा. उनकी बांहें सूखकर पतली हो गईं और जांघों का आकार भी काफी कम हो गया. भूख और निराशा ने उन्हें इस कदर तोड़ दिया कि वह समुद्र में कूदकर जान देने की बात करने लगे.
एक दिन उन्होंने अलवरेंगा से विदा लेते हुए नाव से समुद्र में छलांग लगाने की कोशिश की. अलवरेंगा ने उन्हें पकड़ लिया और आइसबॉक्स के अंदर बैठाकर खुद उसका ढक्कन दबाकर बैठ गए. वह चिल्लाए कि उन्हें खुद को मारने के बारे में सोचना बंद करना होगा.
अलवरेंगा ने अपने साथी से कहा कि उन्हें जिंदा रहना है, ताकि एक दिन अपनी कहानी दुनिया को बता सकें. लेकिन कुछ दिनों बाद कॉर्डोबा की हालत और बिगड़ गई. अलवरेंगा उन्हें पानी पिलाने की कोशिश करते रहे, मगर उन्होंने पानी निगलना बंद कर दिया. आखिरकार कॉर्डोबा की मौत हो गई.
अलवरेंगा के लिए यह सबसे दर्दनाक पल था. वह समुद्र के बीच अकेले रह गए थे. अपने साथी की मौत का दुख सहन करना इतना मुश्किल था कि कुछ समय तक वह यह मानने को तैयार ही नहीं हुए कि कॉर्डोबा अब इस दुनिया में नहीं हैं.
वह उनसे ऐसे बातें करते थे, मानो वह अभी भी जिंदा हों. उनसे पूछते कि नींद कैसी आई और क्या उन्होंने नाश्ता कर लिया. छह दिन बाद उन्होंने अपने साथी के शव को समुद्र में छोड़ दिया. इसके बाद वह नाव के अंदर बैठकर खूब रोए.
शार्क के डर के बीच भी तैरने का तरीका निकाला
साथी के चले जाने के बाद अलवरेंगा के सामने अकेले जिंदा रहने की चुनौती थी. अब न उनसे बात करने वाला कोई था और न ही मुश्किल समय में हौसला देने वाला.
उन्होंने खुद को व्यस्त रखने के लिए मछलियां और समुद्री जीव पकड़ना जारी रखा. कभी-कभी उन्हें नाव से उतरकर तैरने का मन करता था, लेकिन समुद्र में शार्क का डर भी था.
उन्होंने इसका एक तरीका निकाला. वह पहले समुद्र में पक्षियों के कुछ पैर फेंकते और देखते कि कहीं शार्क तो नहीं आ रही हैं. अगर आसपास शार्क नजर नहीं आती, तो वह थोड़ी देर के लिए पानी में उतरकर तैर लेते थे. नाव के नीचे रहने वाली छोटी मछलियों की हलचल पर भी नजर रखते थे. अगर वे घबराकर भागने लगतीं, तो अलवरेंगा तुरंत नाव पर वापस चढ़ जाते थे.
इस तरह कुछ मिनट तैरना भी उनके लिए राहत का जरिया बन गया था. लेकिन अब उनके मन में एक और बात लगातार चलने लगी थी. उन्हें अपनी बेटी फातिमा की याद आने लगी थी, जिसे उन्होंने कई सालों से नहीं देखा था. वह कल्पना करते कि अगर वह घर लौट पाए, तो अपनी बेटी के साथ समय बिताएंगे और परिवार के साथ नई जिंदगी शुरू करेंगे. यही उम्मीद उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती रही.
आंखों के सामने से गुजरा जहाज, लेकिन नहीं मिली मदद
समुद्र में कई महीने बीत चुके थे. एक दिन अलवरेंगा को दूर एक बड़ा मालवाहक जहाज दिखाई दिया. जहाज धीरे-धीरे उनकी नाव के करीब आया. उन्हें लगा कि अब उनकी जिंदगी बच जाएगी.
जहाज इतना करीब आ गया कि उन्हें डर लगने लगा कि कहीं वह उनकी छोटी नाव को कुचल न दे. अलवरेंगा ने जहाज पर मौजूद लोगों को देखकर जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया - मदद करो! मैं यहां हूं!
जहाज पर मौजूद तीन लोगों ने उनकी तरफ देखा और हाथ भी हिलाया. लेकिन किसी ने उन्हें बचाने की कोशिश नहीं की. जहाज बिना रुके आगे निकल गया. यह घटना अलवरेंगा के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी. इतने लंबे समय तक मौत से लड़ने के बाद जब उन्हें लगा कि अब मदद मिल जाएगी, तब उम्मीद भी टूट गई.
उनका शरीर कमजोर हो चुका था. कपड़े फट गए थे और धूप से बचने के लिए उनके पास अपने साथी की एक पुरानी स्वेटशर्ट ही बची थी. दाढ़ी और बाल बढ़ चुके थे. वह मुश्किल से खुद को संभाल पा रहे थे.फिर भी उन्होंने जिंदा रहने की कोशिश नहीं छोड़ी.
438 दिन बाद आखिरकार दिखाई दी जमीन
समुद्र में करीब 11 महीने अकेले बिताने के बाद अलवरेंगा लगभग 5,000 मील बह चुके थे. उनकी नाव औसतन एक घंटे में एक मील से भी कम दूरी तय कर रही थी. उन्हें खुद भी अंदाजा नहीं था कि समुद्र की धाराएं उन्हें कहां ले जा रही हैं.
30 जनवरी 2014 को उन्हें पानी में नारियल तैरते दिखाई दिए. आसमान में समुद्री पक्षी नजर आने लगे. बारिश के कारण दूर तक देखना मुश्किल था, लेकिन तभी उन्हें धुंध के बीच एक छोटा-सा द्वीप दिखाई दिया. यह देखकर उन्हें यकीन नहीं हुआ कि आखिरकार जमीन करीब आ गई है. वह तुरंत समुद्र में कूदकर किनारे तक पहुंचना चाहते थे, लेकिन शार्क के डर से रुके रहे.
किनारे तक पहुंचने में उन्हें करीब आधा दिन लग गया. जब वह जमीन से कुछ दूरी पर थे, तो नाव से पानी में कूद पड़े. एक लहर उन्हें बहाकर किनारे तक ले आई. वह समुद्र तट पर मुंह के बल गिर पड़े. उन्होंने रेत को मुट्ठी में भर लिया. बाद में उन्होंने बताया कि उस समय उन्हें रेत किसी खजाने जैसी लग रही थी.
यह जगह मार्शल द्वीप समूह का एबोन एटोल था, जो दुनिया के बेहद दूर-दराज इलाकों में गिना जाता है. वहां रहने वाले एक दंपति ने उन्हें देखा और उनकी मदद की. अगर समुद्र की धाराएं उन्हें इस द्वीप तक नहीं लातीं, तो उन्हें हजारों मील दूर फिलीपींस की तरफ बहना पड़ सकता था.
बेटी से मिलकर फूट-फूटकर रोए अलवरेंगा
द्वीप पर पहुंचने के बाद अलवरेंगा की हालत को संभलने में करीब 11 दिन लगे. इसके बाद वह अपने देश एल सल्वाडोर लौटने के लिए यात्रा करने लायक हो पाए. घर लौटकर जब उन्होंने अपनी बेटी फातिमा को देखा, तो उसे गले लगाकर रोने लगे. उन्होंने कहा - मैं तुमसे प्यार करता हूं..
अलवरेंगा को इस बात का भी दुख था कि वह अपनी बेटी के बचपन के कई साल उसके साथ नहीं बिता पाए. उन्होंने उससे कहा कि वह उसके साथ बिताए गए उन सालों को वापस तो नहीं ला सकते, लेकिन अब उसे सही-गलत समझाने और जिंदगी में आगे बढ़ने में मदद जरूर कर सकते हैं.
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