वाह रे पाकिस्तान! TTP के ड्रोन से बचने के लिए चौकियों पर लगाए मछली पकड़ने वाले जाल

अफगानिस्तान सीमा के पास ड्रोन हमलों से परेशान पाकिस्तान ने सुरक्षा चौकियों पर एक अनोखा इंतजाम किया है. खैबर पख्तूनख्वा के कई इलाकों में पुलिस चौकियों के ऊपर मछली पकड़ने वाले जाल लगाए गए हैं. दावा है कि इनसे ड्रोन को हवा में रोकने या विस्फोट के असर को कम करने में मदद मिल सकती है.

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2026 के पहले छह महीनों में खैबर पख्तूनख्वा में 341 ड्रोन हमलों को नाकाम किया गया (Photo: AFP) 2026 के पहले छह महीनों में खैबर पख्तूनख्वा में 341 ड्रोन हमलों को नाकाम किया गया (Photo: AFP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 06 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 1:33 PM IST

ड्रोन हमलों से परेशान पाकिस्तान अब उनसे निपटने के लिए एक ऐसा तरीका अपना रहा है, जिसे देखकर पहली नजर में यकीन करना मुश्किल है. अफगानिस्तान की सीमा से लगे खैबर पख्तूनख्वा में कुछ पुलिस और सुरक्षा चौकियों के ऊपर मछली पकड़ने वाले जाल लगाए जा रहे हैं. इसका मकसद है- विस्फोटक लेकर आने वाले ड्रोन को हवा में ही रोकना या उसके हमले का असर कम करना.

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पाकिस्तान के इस अजीबोगरीब इंतजाम की जानकारी अल जजीरा की एक रिपोर्ट में सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, हंगू जिले में ड्रोन हमलों के खतरे के बीच पुलिस ने चौकियों की छतों और बाहरी दीवारों के बीच जाल तान दिए हैं. यही तरीका अब अफगानिस्तान सीमा के पास स्थित दूसरे संवेदनशील इलाकों में भी अपनाया जा रहा है.

ड्रोन के प्रोपेलर जाल में फंसाने की कोशिश

इस व्यवस्था के पीछे सीधा-सा तर्क है. अगर कोई ड्रोन चौकी के ऊपर उड़ता हुआ आता है और उसका प्रोपेलर जाल में उलझ जाता है तो वह नीचे गिर सकता है या उसे रोका जा सकता है. पुलिस अधिकारी फैयाज खान ने अल जजीरा को बताया कि ड्रोन जाल में फंसने पर उसे निष्क्रिय करने या रोकने की संभावना रहती है.

पुलिस का यह भी मानना है कि अगर ड्रोन जाल के ठीक ऊपर विस्फोट कर देता है तो उसके छर्रे और मलबे का कुछ हिस्सा सीधे नीचे मौजूद जवानों तक पहुंचने के बजाय अलग दिशा में फैल सकता है. यानी जाल को किसी आधुनिक एंटी-ड्रोन सिस्टम के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त सुरक्षा परत के रूप में देखा जा रहा है.

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अप्रैल के हमले के बाद शुरू हुआ जुगाड़

हंगू में इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत उस समय ज्यादा महसूस हुई, जब 16 अप्रैल को सरकी पियाला पुलिस चौकी पर ड्रोन हमला हुआ. रिपोर्ट के मुताबिक, ड्रोन हमले के बाद टीटीपी के लड़ाकों ने सुरक्षा बलों पर गोलीबारी भी की थी. इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे.

हंगू अफगानिस्तान सीमा के करीब स्थित है और लंबे समय से सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल जिले में कई ड्रोन हमले हो चुके हैं. ऐसे में चौकियों पर तैनात सुरक्षाकर्मियों के लिए ऊपर से आने वाले छोटे ड्रोन भी बड़ा खतरा बन गए हैं.

एक चौकी को ढकने में करीब 1.3 लाख रुपये

मछली पकड़ने वाले जाल का एक बड़ा फायदा इसकी कम कीमत बताई जा रही है. अल जजीरा के मुताबिक, एक सामान्य पुलिस चौकी को इस तरह के जाल से ढकने में करीब 4 लाख पाकिस्तानी रुपये, यानी लगभग 1.3 लाख भारतीय रुपये, खर्च होते हैं.

इसके मुकाबले आधुनिक ड्रोन रोधी प्रणालियां काफी महंगी हो सकती हैं. यही वजह है कि सीमित संसाधनों वाली चौकियों के लिए जाल को एक सस्ता अतिरिक्त सुरक्षा उपाय माना जा रहा है.

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हंगू के अलावा कोहाट, करक, बन्नू, लक्की मरवत और डेरा इस्माइल खान जैसे जिलों में भी संवेदनशील चौकियों के ऊपर इस तरह के जाल लगाए जाने की जानकारी सामने आई है.

यह भी पढ़ें: पाकिस्तान-अफगानिस्तान बॉर्डर पर फिर गरज रहीं बंदूकें, PAK आर्मी से भिड़ा तालिबान

क्या जाल वाकई ड्रोन रोक पाएगा?

यहीं पर इस पूरे इंतजाम की सबसे बड़ी सीमा भी सामने आती है. सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ जाल लगा देने से ड्रोन का खतरा खत्म नहीं हो जाता. हर ड्रोन का आकार, गति, उड़ान की ऊंचाई और हमले का तरीका अलग हो सकता है.

सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज के इम्तियाज गुल ने अल जजीरा से बातचीत में इस उपाय को लेकर सवाल उठाए. उनके मुताबिक, ड्रोन सिर्फ पुलिस चौकियों को ही निशाना नहीं बनाते. इसलिए असली जरूरत ऐसे सिस्टम की है जो ड्रोन को उड़ान भरने के बाद ही पहचानकर रोक सके.

खैबर पख्तूनख्वा पुलिस के अधिकारियों ने भी माना है कि जाल पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता. यानी यह व्यवस्था जवानों को कुछ अतिरिक्त सुरक्षा दे सकती है, लेकिन इसे एंटी-ड्रोन सिस्टम का विकल्प नहीं माना जा सकता.

टीटीपी के हाथ में ड्रोन बना नया हथियार

पाकिस्तान की परेशानी सिर्फ जाल तक सीमित नहीं है. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी ने भी ड्रोन का इस्तेमाल अपने हमलों में बढ़ाया है. छोटे और आसानी से उपलब्ध व्यावसायिक ड्रोन को कुछ बदलावों के साथ हमलों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

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पाकिस्तानी अधिकारियों के मुताबिक, 2026 के पहले छह महीनों में खैबर पख्तूनख्वा में 341 ड्रोन हमलों को नाकाम किया गया. इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि छोटे ड्रोन सुरक्षा बलों के लिए कितनी बड़ी चुनौती बन चुके हैं.

यही वजह है कि पाकिस्तान की पुलिस अब महंगे उपकरणों के साथ-साथ ऐसे सस्ते उपाय भी आजमा रही है. चौकियों के ऊपर तना मछली पकड़ने वाला जाल देखने में भले ही असामान्य लगे, लेकिन सुरक्षा बलों के लिए यह ड्रोन हमलों के खिलाफ एक और परत जोड़ने की कोशिश है.

हालांकि, बड़ा सवाल यही है कि क्या मछली पकड़ने वाला जाल सच में ड्रोन की उड़ान रोक पाएगा? इसका जवाब किसी वास्तविक हमले या नियंत्रित परीक्षण के बाद ही साफ हो पाएगा.

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