फैक्ट्री में इस चीज से बना दिया असली सोना, इस कंपनी ने किया है दावा!

अमेरिका की एक स्टार्टअप कंपनी ने दावा किया है कि उसने पारा से सोना बनाने की एक तकनीक विकसित की है. कंपनी का प्लान भविष्य में इस तकनीक का इंडस्ट्रियल इस्तेमाल कर कम समय में ज्यादा मात्रा में सोना बनाने का है.

Advertisement
कंपनी ने लैब में सेना बनाने की किफायत तकनीक का प्रपोजल दिया है (Photo - AI Generated) कंपनी ने लैब में सेना बनाने की किफायत तकनीक का प्रपोजल दिया है (Photo - AI Generated)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 4:53 PM IST

सोना बनाने की कोशिश सदियों से होती रही है. पुराने जमाने में इसे कीमियागिरी कहा जाता था. अब अमेरिका की एक स्टार्टअप कंपनी ने दावा किया है कि उसने पारे से असली सोना बनाने की दिशा में बड़ी कामयाबी हासिल की है.

बिजनेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी का कहना है कि उसने फ्यूजन से निकलने वाले न्यूट्रॉन की मदद से पारे को सोने में बदलने का प्रयोग किया है. उसका दावा है कि इस प्रक्रिया की दर 2025 में CERN के रिकॉर्ड से 10 गुना ज्यादा है.

Advertisement

यह सुनने में किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे परमाणु विज्ञान है. सैन फ्रांसिस्को की कंपनी मैराथन फ्यूजन का प्लान सिर्फ सोना बनाने तक सीमित नहीं है. वह इसी तकनीक से कैंसर की जांच और इलाज में इस्तेमाल होने वाले रेडियोएक्टिव आइसोटोप बनाने पर भी काम कर रही है.हालांकि, कंपनी के दावे और बड़े पैमाने पर सस्ता सोना बनाने की व्यावहारिक हकीकत के बीच अभी लंबा रास्ता है.

पारे से कैसे बन सकता है सोना?
आमतौर पर हम जानते हैं कि पारा एक चमकदार, तरल धातु है. जबकि सोना ठोस और कीमती धातु है. दोनों के गुण अलग-अलग हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर पारे को सोने में कैसे बदला जा सकता है?

इसका जवाब न्यूक्लियर साइंस में छिपा है. मैराथन फ्यूजन जिस तकनीक पर काम कर रही है, उसे न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन यानी परमाणु रूपांतरण कहा जाता है. इसमें किसी तत्व के परमाणु के केंद्र यानी न्यूक्लियस में बदलाव करके उसे दूसरे तत्व में बदला जाता है.

Advertisement

आसान भाषा में समझें तो नॉर्मल केमिकल रिएक्शन में किसी पदार्थ के अणुओं या इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था बदल सकती है, लेकिन उससे तत्व नहीं बदलता. इसके उलट, परमाणु के केंद्र में बदलाव होने पर एक तत्व दूसरे तत्व में बदल सकता है. पारे को सोने में बदलने का दावा इसी थ्योरी पर आधारित है.

फ्यूजन से निकलने वाले न्यूट्रॉन का होगा इस्तेमाल
कंपनी की प्रस्तावित तकनीक में पारे के एक खास आइसोटोप मरकरी-198 का इस्तेमाल किया जाता है. आइसोटोप एक ही तत्व के ऐसे रूप होते हैं, जिनके न्यूक्लियर के सेंटर में न्यूट्रॉन की संख्या अलग-अलग होती है.

इस प्रक्रिया को तीन चरणों में समझ सकते हैं.
पहला चरण - 
 कंपनी की प्लानिंग के मुताबिक, फ्यूजन रिएक्टर में ड्यूटेरियम और ट्रिटियम की प्रतिक्रिया से तेज गति वाले न्यूट्रॉन पैदा किए जाएंगे.

दूसरा चरण -  इन न्यूट्रॉन को मरकरी-198 पर डाला जाएगा. प्रस्तावित न्यूक्लियर रिएक्शन में मरकरी-198 बदलकर रेडियोएक्टिव मरकरी-197 बन सकता है.

तीसरा चरण -  मरकरी-197 टूटकर गोल्ड-197 यानी सोने में बदल सकता है. बशर्ते  इसे इंडस्ट्रियल लेवल पर हासिल किया जाए और साथ ही रेडियोएक्टिव बाय-प्रोडक्ट्स को सुरक्षित रूप से मैनेज किया जाए.

यहां ध्यान देने वाली बात है कि गोल्ड-197 सोने का स्थिर आइसोटोप है. यानी परमाणु स्तर पर बनने वाला सोना असली सोना ही होगा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसे बनाना सस्ता या आसान भी होगा.

Advertisement

CERN ने भी बनाया था सोना!
पारे से सोना बनाने का विचार पूरी तरह नया नहीं है. दुनिया की मशहूर वैज्ञानिक प्रयोगशाला CERN में भी परमाणु प्रक्रियाओं के जरिए सोना बनने की घटना दर्ज की गई थी.

CERN के लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में ALICE एक्सपेरिमेंट के दौरान वैज्ञानिकों ने चार साल के मेहनत के बाद सिर्फ 29 पिकोग्राम सोना बनाया था. एक पिकोग्राम एक ग्राम का खरबवां हिस्सा होता है. यानी इतनी कम मात्रा में सोना बना कि उसका व्यावसायिक इस्तेमाल संभव नहीं था.

मैराथन फ्यूजन का दावा है कि उसकी तकनीक से सोना बनाने की दर CERN के 2025 के रिकॉर्ड से 10 गुना ज्यादा रही है. X पर अपने पोस्ट में, मैराथन फ्यूजन का कहना है कि वह अपने पहले के थ्योरेटिकल प्रपोज़ल से आगे बढ़ गया है, और फ्यूजन न्यूट्रॉन का इस्तेमाल करके मरकरी से सोने में बदल सकता है. कंपनी के दावे को अभी स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि और व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन के प्रमाण के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.

सिर्फ सोना नहीं, कैंसर के इलाज में भी आएगी काम!
मैराथन फ्यूजन का मकसद केवल सोना बनाना नहीं है. कंपनी का मानना है कि फ्यूजन से पैदा होने वाले न्यूट्रॉन की मदद से मेडिकल क्षेत्र में काम आने वाले रेडियोएक्टिव आइसोटोप भी बनाए जा सकते हैं.

Advertisement

आज कैंसर की जांच और इलाज में ऐसे आइसोटोप की अहम भूमिका है. कुछ आइसोटोप शरीर के अंदर ट्यूमर का पता लगाने में मदद करते हैं, जबकि कुछ का इस्तेमाल कैंसर कोशिकाओं तक रेडिएशन पहुंचाने के लिए किया जाता है.कंपनी ने जिंक पर न्यूट्रॉन डालकर रेडियोएक्टिव कॉपर आइसोटोप बनाने से जुड़े प्रयोगों की भी जानकारी दी है. 

यह भी पढ़ें: विदेश में कंडोम के पैकेट्स पर क्यों लिखी होती हैं ये अजीब लाइनें?

मैराथन का कहना है कि उसने फ्यूजन से बने न्यूट्रॉन से जिंक को इर्रेडिएट करके रेडियोएक्टिव कॉपर आइसोटोप बनाना शुरू कर दिया है. कॉपर-64 का इस्तेमाल डायग्नोस्टिक इमेजिंग में होता है, जबकि कॉपर-67 की जांच की जा रही है और इसका इस्तेमाल टारगेटेड रेडियोन्यूक्लाइड थेरेपी में किया जा रहा है. कंपनी का तर्क है कि डिमांड बढ़ने पर फ्यूजन रिएक्टर आखिरकार मेडिकल आइसोटोप का एक और सोर्स दे सकते हैं.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »