पूर्व 21 पैरा स्पेशल फोर्सेज और NSG कमांडो कर्नल कौशल कश्यप ने 'द लल्लनटॉप' से बातचीत में अपने सैन्य करियर के कई ऐसे पहलुओं के बारे में बताया, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. उन्होंने NSG और पैरा SF की ट्रेनिंग, आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन, मणिपुर के जंगलों में काम करने और मुश्किल हालात में जिंदा रहने की ट्रेनिंग के बारे में खुलकर बात की.
पैरा SF की प्रोबेशन शुरू होते ही सबसे पहले जवानों की शारीरिक क्षमता परखी जाती है. इसके लिए 20 किलोमीटर, 30 किलोमीटर और फिर 40 किलोमीटर की दौड़ जैसी स्पीड मार्च कराई जाती है. हर महीने दूरी बढ़ाई जाती है. करीब 18.5 किलो वजन के साथ हथियार और बाकी सामान मिलाकर कुल 22-23 किलो का बोझ उठाकर तय समय में यह दूरी पूरी करनी होती है.
इसके लिए सुबह से ही कड़ी फिजिकल ट्रेनिंग शुरू हो जाती है. इसमें रोज दौड़ना, रस्सी पर चढ़ना और कई तरह की एक्सरसाइज शामिल होती हैं.
कब्रिस्तान की कब्रों की जानकारी जुटाने से लेकर सांप पकड़ने तक लेकिन पैरा SF की प्रोबेशन में सिर्फ शरीर की ताकत नहीं, दिमाग की भी परीक्षा होती है. कर्नल कश्यप बताते हैं कि कभी उन्हें किसी कब्रिस्तान की सभी कब्रों की जानकारी जुटाकर लाने का काम दिया जाता था. कभी सांप पकड़कर लाने का टास्क मिल जाता था.
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कुछ टास्क ऐसे भी होते थे, जिनके बारे में कर्नल कश्यप ने कैमरे पर बताने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि ऐसे टास्क आपको मिलते हैं जो मैं कैमरा पे बोल भी नहीं सकता हूं. इन टास्क का मकसद जवानों को ऐसे हालात के लिए तैयार करना था, जहां डर या परेशानी के बीच भी वे अपना दिमाग शांत रख सकें.
ढाई घंटे की नींद और पूरा दिन ट्रेनिंग
दिनभर फिजिकल ट्रेनिंग के बाद शाम को पढ़ाई और रिसर्च का काम शुरू होता था. ऑफिसर्स को अलग-अलग विषयों पर रिसर्च करने और रिपोर्ट तैयार करने का काम दिया जाता था.
इसके साथ डेमोलेशन, नेविगेशन और युद्ध की रणनीति जैसी चीजों की क्लास की तैयारी भी करनी होती थी. इस वजह से कई बार रात करीब ढाई बजे तक जागना पड़ता था और सुबह फिर जल्दी उठना होता था. यानी नींद के लिए बहुत कम समय मिलता था.
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नागालैंड के जंगल में दो दिन अकेले रहना
ट्रेनिंग के दौरान एक ऐसी एक्सरसाइज भी होती थी, जिसमें जवानों को दो दिन के लिए जंगल में अकेला छोड़ दिया जाता था. उन्हें खुद खाना तलाशना होता था और किसी तरह जंगल में जिंदा रहना होता था.
कर्नल कश्यप के मुताबिक यह एक्सरसाइज नागालैंड के जंगल में हुई थी. वहां जंगल में रहने वाले स्थानीय लोग खाने लायक चीजें पहले ही ढूंढ लेते थे. ऐसे में जवानों के लिए खाने के लिए कुछ तलाशना काफी मुश्किल होता था. जो भी मिल पाता, उसी से काम चलाना पड़ता था
डॉग्स से बचना और कैदी बनने की ट्रेनिंग
इसके बाद तीसरे दिन ट्रेनिंग टीम डॉग्स के साथ जंगल में पहुंचती थी. जवानों की शर्ट को सुंघाकर डॉग्स को उनके पीछे लगाया जाता था. जवानों को इन डॉग्स से बचते हुए वहां से निकलना होता था.
ट्रेनिंग में 'प्रिजनर ऑफ वॉर' यानी युद्धबंदी बनाए जाने की स्थिति की भी नकल की जाती थी. इसमें जवानों को सोने नहीं दिया जाता, बांधकर रखा जाता और कई तरह की सजा दी जाती थी. इसका मकसद यह था कि अगर असली ऑपरेशन में ऐसी स्थिति आए तो जवान मानसिक और शारीरिक दबाव झेल सकें.
जंगल में सर्वाइवल ट्रेनिंग के दौरान कर्नल कश्यप के साथ एक ऐसा किस्सा भी हुआ, जिसे वे आज तक याद करते हैं. इस दौरान एक सांप उनका 'बड्डी' यानी साथी बन गया था.
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