Meghalaya Whistling Village: भारत का अनोखा गांव, जहां लोग नाम से नहीं बल्कि सीटी बजाकर बुलाते हैं एक-दूसरे को

Meghalaya Whistling Village: मेघालय की पहाड़ियों में बसा कोंगथोंग गांव अपनी अनोखी सीटी वाली परंपरा के लिए दुनियाभर में मशहूर है. यहां लोग एक-दूसरे को नाम से नहीं, बल्कि खास धुनों में सीटी बजाकर बुलाते हैं. अगर आप प्रकृति की खूबसूरती के साथ अनोखी संस्कृति का अनुभव करना चाहते हैं तो इस गांव को अपनी ट्रैवल लिस्ट में शामिल कर सकते हैं.

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मेघालय का 'व्हिसलिंग विलेज' (Photo- ITG) मेघालय का 'व्हिसलिंग विलेज' (Photo- ITG)

आजतक लाइफस्टाइल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 17 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 2:46 PM IST

Meghalaya Whistling Village: घूमने-फिरने के लिए भारत में कई ऐसी जगहें हैं जो अपनी खूबसूरती के साथ अनोखी परंपराओं के लिए भी मशहूर हैं. ऐसी ही एक जगह मेघालय की पहाड़ियों में बसा कोंगथोंग (Kongthong) गांव है. इसे भारत का 'म्यूजिकल विलेज' यानी संगीत वाला गांव भी कहा जाता है. यहां की सबसे खास बात यह है कि लोग एक-दूसरे को बुलाने के लिए आम नामों की जगह खास धुनों में सीटी बजाते हैं.

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हरे-भरे जंगलों, पहाड़ियों और शांत वातावरण के बीच बसा यह गांव पर्यटकों को एक अलग अनुभव देता है. अगर आप भी किसी ऐसी जगह पर घूमना चाहते हैं, जहां प्रकृति की खूबसूरती के साथ स्थानीय संस्कृति को करीब से जानने का मौका मिले तो कोंगथोंग आपके लिए एक बेस्ट जगह हो सकता है. आइए जानते हैं इस अनोखे गांव की खासियत और यहां पहुंचने का तरीका.

सीटी से बुलाने की अनोखी परंपरा
कोंगथोंग गांव में बच्चों के जन्म के बाद उनकी मां एक खास धुन तैयार करती हैं. इस धुन को 'जिंगरवाई लॉबई' (Jingrwai Lawbei) परंपरा से जोड़ा जाता है. इसका संबंध खासी समुदाय की मातृवंशीय परंपरा से है. गांव में लोग इन धुनों का इस्तेमाल एक-दूसरे को बुलाने के लिए करते हैं. हर व्यक्ति की अपनी अलग धुन होती है, जो उसकी पहचान बन जाती है. यही वजह है कि इस गांव को 'व्हिसलिंग विलेज' यानी सीटी वाला गांव भी कहा जाता है.

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क्यों शुरू हुई यह परंपरा?
कोंगथोंग पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसा है. पहले के समय में दूर मौजूद लोगों को आवाज देकर बुलाना मुश्किल होता था. ऐसे में सीटी की तेज और खास धुनों से एक-दूसरे तक संदेश पहुंचाना आसान हो जाता था. समय के साथ यह तरीका गांव की सांस्कृतिक पहचान बन गया. आज भी यहां के लोग इस परंपरा को संजोकर रखे हुए हैं.

कोंगथोंग गांव कैसे पहुंचें?

कोंगथोंग गांव मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स जिले में स्थित है. यह शिलॉन्ग से लगभग 60 किलोमीटर दूर है. यहां पहुंचने के लिए आप शिलॉन्ग से टैक्सी या किराये की गाड़ी ले सकते हैं. रास्ते में घुमावदार पहाड़ियां, हरे-भरे जंगल और खूबसूरत घाटियां देखने को मिलती हैं. आप चाहें तो सोहरा यानी चेरापूंजी से भी सड़क के रास्ते यहां जा सकते हैं.

घूमने का सबसे अच्छा समय
कोंगथोंग घूमने के लिए अक्टूबर से मई तक का समय अच्छा माना जाता है. इस दौरान मौसम आमतौर पर सुहावना रहता है और सड़क से सफर करना भी सुविधाजनक हो सकता है. हालांकि, पहाड़ी इलाकों में मौसम तेजी से बदल सकता है, इसलिए जाने से पहले मौसम और सड़क की स्थिति की जानकारी जरूर लें.

गांव में क्या कर सकते हैं?
यहां पहुंचकर आप गांव की अनोखी सीटी वाली परंपरा को करीब से समझ सकते हैं. इसके अलावा स्थानीय खासी खान-पान का स्वाद ले सकते हैं और आसपास के प्राकृतिक नजारों का आनंद उठा सकते हैं. यहां ठहरने के लिए स्थानीय समुदाय की ओर से संचालित होमस्टे या इको-हट जैसे विकल्प मिल सकते हैं. गांव घूमते समय स्थानीय लोगों की संस्कृति और निजी जीवन का सम्मान करना भी जरूरी है.

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अगर आप भीड़भाड़ से दूर किसी शांत और अलग जगह पर घूमना चाहते हैं तो मेघालय का कोंगथोंग गांव आपकी ट्रैवल लिस्ट में शामिल हो सकता है. यहां की प्राकृतिक खूबसूरती और सीटी से एक-दूसरे को बुलाने की परंपरा इस सफर को यादगार बना सकती है.

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