प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फेसबुक पोस्ट कुछ समय के लिए हट जाता है. मेटा कहता है कि यह तकनीकी गलती थी और कुछ देर बाद पोस्ट वापस आ जाता है. मामला यहीं खत्म नहीं होता. सरकार कंपनी से जवाब मांगती है और उसके अधिकारियों को तलब किया जाता है. हफ्ते भर तक सरकार और मेटा के बीच खींचतान होती है. आखिरकार मेटा के टॉप ऑफिशियल सरकार से मिलते हैं और फिर से माफी मांगते हैं. हालांकि ये माफी इंस्टाग्राम पर चाइल्ड सेक्शुल कंटेंट को लेकर थी. बाद में मार्क जकरबर्ग भी माफी मांग लेते हैं और आगे ऐसी गलती ना होने का वादा करते हैं. लेकिन ये अभी तक पब्लिक डोमेन में नहीं आया कि पीएम मोदी की वीडियो थोड़ी देर के लिए ही सही हटी ही क्यों?
ये सिर्फ पीएम मोदी के पोस्ट डिलीट करने की बात नहीं है ये मेटा जैसी कंपनियों की मनमानी है. भारत में इंस्टाग्राम से लाखों लोगों की कमाई होती है. मेटा समय समय पर गाइडलाइन और पॉलिसी का हवाला दे कर वैसे पोस्ट और अकाउंट भी हटा देता है जो सही होते हैं. लेकिन जवाब के नाम पर एक टेंप्लेट रेस्पॉन्स दिया जाता है कि टेक्निकल ग्लिच हो गया. कभी भी मेटा ये नहीं बताता कि पोस्ट डिलीट कैसे हुई और क्या पैमाना रहा. हर बार टेक्निकल ग्लिच और एरर का बहाना बना देना सही नहीं है. क्योंकि जिन लोगों का रोजगार इस पर टिका है वो क्या करेंगे? अगर देश के पीएम की पोस्ट हट जा रही है और इसे लेकर कोई ठोस जवाब नहीं है तो आम यूजर्स का क्या?
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मेटा का दोहरापन यहां साफ दिखता है. आप इंस्टाग्राम खोलिए. एक गलत कंटेंट देखने को बाद आपको अनगिनत सेक्शुअल और हेट स्पीच वाले कंटेंट दिखेंगे. वो कंटेंट फेसबुक की पॉलिसी के अगेंस्ट होते हैं फिर भी प्लेटफॉर्म पर रहते हैं, उन्हें नहीं हटाया जाता. सरकार ने मेटा प्लेटफॉर्म्स पर चाइल्ड सेक्शुअल अब्यूज कंटेंट को लेकर भी लताड़ा है. इस मामले पर भी मेटा की तरफ से माफीनामा आया है. बीबीसी ने हाल ही में एक रिपोर्ट छापी जिसमें दावा किया गया कि इंस्टाग्राम पर चाइल्ड सेक्शुअल कंटेंट की खरीद फरोख्त हो रही है.
कई बार सोशल मीडिया कंपनियां पॉलिसी की दलील दे कर वैसे कंटेंट भी हटा देती हैं जो सही होते हैं. लेकिन इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर अनगिनत ऐसे कंटेंट और रील्स मिलेंगे जो इनकी गाइडलाइन की धज्जियां उड़ा रहे होते हैं, लेकिन उन कंटेंट को नहीं हटाया जाता. मेटा पर काफी समय से आरोप लगते आए हैं कि इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर चाइल्ड ट्रैफिकिंग और चाइल्ड सेक्शुअल अब्यूज वाले कंटेंट चल रहे हैं और कंपनी उसे हटा भी नहीं रही है.
अलग अलग फ्रंट पर मेटा जैसी कंपनियों का दोहरापन देखने को मिला है. मेटा के लिए भारत इन दिनों सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है. वॉट्सऐप के सबसे ज्यादा यूजर्स यहीं हैं और सबसे ज्यादा रील्स यहीं देखी और बनाई जा रही हैं. भारत से मेटा का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन जवाबदेही कम होती जा रही है. सवाल ये है कि अब इंटरनेट पर फाइनल डिसिजन किसका होगा? सरकार का या उन टेक कंपनियों का जिनके प्लेटफॉर्म पर अरबों लोग हर दिन अपना समय बिताते हैं?
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भारत में पिछले कुछ सालों में मेटा, वॉट्सऐप, गूगल और X जैसी कंपनियां कई बार सरकार के साथ विवाद में रही हैं. कभी कंटेंट हटाने को लेकर सवाल उठे, कभी सरकार ने कुछ अकाउंट या पोस्ट ब्लॉक करने को कहा. वॉट्सऐप से मैसेज का पहला भेजने वाला बताने की मांग हुई तो मामला अदालत तक पहुंच गया. गूगल और X को भी कई सरकारी आदेशों का पालन करना पड़ा. हालांकि मेटा यहां पर अड़ा हुआ है कि वो वॉट्सऐप पर भेजे गए मैसेज का ओरिजिनेटर नहीं बताएगा. ऐसा करने से कंपनी की एंड टु एंड एन्क्रिप्शन पर असर पड़ेगा, ये कंपनी की दलील है. मेटा ने इस मामले पर ये तक कह दिया कि अगर ओरिजिनेटर बताने को मजबूर किया जाएगा तो देश में बिजनेस समेट लेंगे.
अगर यह सिर्फ भारत की कहानी होती तो इसे लोकल विवाद कहा जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं है. अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और कई दूसरे देशों में भी सरकारें और बड़ी टेक कंपनियां कानून, कंटेंट और डेटा को लेकर आमने-सामने हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इंटरनेट अब सिर्फ जानकारी का जरिया नहीं रहा. आज करोड़ों लोग सुबह उठते ही गूगल पर कुछ खोजते हैं, वॉट्सऐप पर मैसेज पढ़ते हैं, इंस्टा और फेसबुक देखते हैं और यूट्यूब पर वीडियो देखते हैं. यानी लोगों तक कौन-सी जानकारी पहुंचेगी, कौन-सा वीडियो वायरल होगा और किस पोस्ट की पहुंच सीमित होगी, इसमें इन कंपनियों की बडा रोल है.
मुश्किल सवाल ये है. अगर किसी विदेशी कंपनी का प्लेटफॉर्म किसी देश के करोड़ों लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है, तो उस प्लेटफॉर्म पर आखिरी अधिकार किसका होना चाहिए?
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पहला जवाब यही लगता है कि जिस देश में कंपनी कारोबार कर रही है, वहां का कानून मानना होगा. लेकिन इंटरनेट की दुनिया इतनी आसान नहीं है. मेटा या गूगल जैसी कंपनियां एक ही समय में सैकड़ों देशों में काम करती हैं. हर देश के अपने कानून हैं. यूरोप के नियम अलग हैं, अमेरिका के अलग और भारत के अलग. ऐसे में किसी कंपनी के लिए हर देश के हिसाब से अलग प्लेटफॉर्म बनाना आसान नहीं है.
दूसरी तरफ सरकारों की भी अपनी जिम्मेदारी . अगर कोई प्लेटफॉर्म भारत में काम करता है तो उसे भारतीय कानूनों का पालन करना होगा. यही वजह है कि दोनों पक्ष कई बार अदालत तक पहुंच जाते हैं. वॉट्सऐप का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. भारत सरकार चाहती है कि आतंकवाद, बच्चों के खिलाफ अपराध और गंभीर मामलों की जांच में जरूरत पड़ने पर किसी मैसेज के पहले भेजने वाले तक पहुंचा जा सके.
वॉट्सऐप का कहना है कि उसका एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन ऐसा है जिसमें कंपनी खुद भी मैसेज नहीं पढ़ सकती. अगर वह किसी एक देश के लिए ट्रेसिंग की व्यवस्था बनाती है तो पूरी सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हो सकती है. यही वजह है कि यह मामला अभी भी अदालत में है. ऐसा ही विवाद अमेरिका में ऐपल और FBI के बीच भी हुआ था. जांच एजेंसी चाहती थी कि ऐपल एक आरोपी का iPhone अनलॉक करने में मदद करे. ऐपल ने मना कर दिया. कंपनी का कहना था कि अगर उसने ऐसा रास्ता बना दिया तो फ्यूचर में वही तकनीक दूसरे आईफोन के लिए भी खतरा बन सकती है.
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2021 में अमेरिका में कैपिटल हिल हिंसा के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ट्विटर अकाउंट बंद कर दिया गया था. अगर किसी निजी कंपनी के पास दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं का अकाउंट बंद करने की ताकत है, तो उसकी जवाबदेही किसके प्रति होगी?
यूरोप ने इस चुनौती से निपटने के लिए डिजिटल मार्केट ऐक्ट और डिजिटल सर्विसेज ऐक्ट जैसे कानून लागू किए. इनका मकसद बड़ी टेक कंपनियों को ज्यादा जवाबदेह बनाना है. भारत ने भी आईटी नियम और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून जैसे कदम उठाए हैं. यानी दुनिया भर की सरकारें अब डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए नए नियम बनाने की कोशिश कर रही हैं. हालांकि ये 2026 के हिसाब से मजबूत नहीं माने जाते हैं. कानून के लूपहोल का फायदा उठा कर टेक कंपनियां अपनी मनमर्जी का करती हैं.
प्राइवेट कंपनियां पैसे कमाने के लिए बिजनेस करती हैं, पब्लिक सर्विस के लिए नहीं. आप ये कह कर इस पूरे मामले को दरकिनार कर सकते हैं. लेकिन यहां स्थिति ऐसी नहीं है. अब सोशल मीडिया कंपनियां या बिग टेक, सिर्फ बिजनेस नहीं कर रही हैं, बल्कि देश के लोगों और यहां तक की इलेक्शन तक को डायरेक्ट या इन्डायरेक्ट तरीके से प्रभावित कर रही हैं.
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अमेरिका सहित कई जगहों पर बिग टेक कंपनियों पर इलेक्शन मैनिपुलेट करने का इल्जाम भी लगता आया है. इसलिए भले ही ये प्राइवेट कंपनियां हैं, लेकिन जवाबदेही तो तय करनी ही पड़ेगी. लेकिन दिक्कत ये है कि बिग टेक द्वारा तैयार किए गए सिस्टम का यूज खुद सरकारें ही किया करती हैं. इसलिए तुरंत इन कंपनियों पर बड़ा ऐक्शन लेने से पहले सरकारें भी कतराती हैं. इतना ही नही देश में सोशल मीडिया और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर करोड़ों लोग अपना बिजनेस चलाते हैं. इन कंपनियों को भी ये पता है कि लोगों को इन्होंने इतना डिपेंडेंट बना दिया है कि सरकार चाह कर भी इन पर तुरंत बड़े ऐक्शन नहीं ले सकती.
यह भी सच है कि सरकार और बिग टेक सिर्फ विरोधी नहीं हैं. सरकारें लोगों तक पहुंचने के लिए इन्हीं प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करती हैं. लाखों छोटे कारोबारी फेसबुक, इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप से अपना कारोबार चलाते हैं. यूट्यूब लाखों लोगों की कमाई का जरिया है. गूगल के बिना इंटरनेट इस्तेमाल करने की कल्पना करना भी मुश्किल है. यानी दोनों एक-दूसरे पर काफी हद तक निर्भर हैं. सरकारें इन कंपनियों को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं और कंपनियां भारत जैसे बड़े बाजार को खोना नहीं चाहेंगी.
यहीं सबसे मुश्किल बैलेंस बनता है. अगर सरकारों को इन बिग टेक कंपनियों पर बहुत ज्यादा अधिकार मिल जाएं तो अभिव्यक्ति की आजादी पर असर पड़ सकता है. अगर कंपनियों को पूरी छूट मिल जाए तो यह सवाल उठेगा कि लोकतंत्र में आखिरी फैसला चुनी हुई सरकार करेगी या एक प्राइवेट कंपनी. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आने के बाद अब ये कंपनियां और भी मजबूत हो चुकी हैं. क्योंकि अब तरह तरह के AI टूल्स अवेलेबल हैं और लोग इनके आदि हो चुके हैं. ऐसे में अगर आप कल उठें और पता चले कि भारत से बिग टेक कंपनियों ने अपना बिजनेस समेट लिया है तो करोड़ों लोग तुरंत बेरोजगार हो जाएंगे. शायद यही वजह है कि कोर्ट में वॉट्सऐप और मेटा की तरफ से ये साफ कहा जाता है कि अगर सरकार सेंडर का ओरिजिन बताने के लिए मजबूर करेगी तो हमें यहां से वॉट्सऐप का बिजनेस समेटना पड़ेगा.
सरकार को चाहिए की मेटा जैसी कंपनियां जो कानून के लूपहोल का फायदा उठा कर मनमानी कर रही हैं उन पर अपनी जकड़़ मजबूत करे. अमेरिका और यूरोप मे जिस तरह इन कंपनियों के हेड को बुला कर संसद में लताड़ लगाई जाती है, भारत में भी ऐसा होना चाहिए. इतना ही नहीं अगर आप गूगल कर लें तो पता चलेगा कि अमेरिका और यूरोप में इन बिग टेक कंपनियों ने अरबों रुपये सिर्फ पेनाल्टी के दौर पर दिए हैं. वजह ये कि वहां हर छोटी बड़ी बात पर इन कंपनियों को जवाबदेह ठहराया जाता है, लेकिन भारत में कम से कम अभी तक ये ट्रेंड देखने को नहीं मिला है. यही वजह है कि पीएम मोदी का पोस्ट हट गया और मेटा ने खुद से क्लैरिफिकेशन देना भी सही नहीं समझा. सरकार ने हफ्ते भर दबाव बनाया तब जा कर मार्क जकरबर्ग की तरफ से माफी मांगी गई है और वो भी डीपफेक और चाइल्ड सेक्शुअल अब्यूज को लेकर. इतना सब होने के बावजूज मेटा ने पोस्ट क्यों हटा ये नहीं बताया.
मुन्ज़िर अहमद