भारत का सबसे पावरफुल AI भी 171 मॉडल्स से पीछे, सबसे सस्ता AI, फिर भी क्यों हैं पीछे?

दुनिया में आज 257 AI मॉडल ऐसे हैं जिन्हें डेवलपर्स खरीदकर इस्तेमाल कर सकते हैं. इनमें सिर्फ दो मॉडल भारत में बने हैं. भारत में होने वाले AI के ज्यादातर काम के लिए अमेरिकी और चीनी कंपनियों के मॉडल इस्तेमाल हो रहे हैं.

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अमेरिका और चीन से क्यों कमजोर हैं भारतीय AI मॉडल्स? अमेरिका और चीन से क्यों कमजोर हैं भारतीय AI मॉडल्स?

दीपू राय / मुन्ज़िर अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 20 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 4:51 PM IST

अपने बैंक के चैटबॉट से पूछिए कि आपका पेमेंट फेल क्यों हुआ. किसी होमवर्क ऐप से कहिए कि वह आठवीं के छात्र को फोटोसिंथेसिस समझाए. कुछ ही सेकंड में आपको जवाब मिल जाएगा. लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है. यह जवाब देने वाला AI आखिर बना कहां है?

ज्यादातर मामलों में जवाब भारत में नहीं, बल्कि अमेरिका या चीन में बने AI मॉडल से आता है. OpenRouter के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से जुलाई के बीच भारतीय डेवलपर्स ने जितने AI मॉडल इस्तेमाल किए, उनमें 94 फीसदी काम अमेरिका और चीन में बने मॉडल ने किया. OpenRouter एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो एक साथ सैकड़ों AI मॉडल तक पहुंच देता है.

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आर्टिफिशियल अनालिसिस नाम की AI बेंचमार्किंग फर्म दुनिया के बड़े AI मॉडल को एक जैसे नौ टेस्ट से जांचती है. उसने 610 AI मॉडल को ट्रैक किया. इनमें से 257 मॉडल अभी डेवलपर्स के लिए उपलब्ध हैं. भारत के सिर्फ दो मॉडल इस लिस्ट में हैं और दोनों एक ही बेंगलुरु की कंपनी सरवम के हैं.

11 देशों में भारत नौवें नंबर पर

भारत के सबसे पावरफुल AI मॉडल का नाम Sarvam 105B है. आर्टिफिशियल अनालिसिस के ताजा डेटा के मुताबिक, इस मॉडल का स्कोर 100 में सिर्फ 11.9 है. कंपेयर करें तो दुनिया के सबसे पावरफुल AI मॉडल Anthropic के Claude Opus 5 का स्कोर 63.1 है. चीन के सबसे पावरफुल मॉडल Kimi K3 का स्कोर 59.7 है.

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अगर देशों को उनके सबसे अच्छे AI मॉडल के आधार पर देखा जाए तो भारत 11 देशों में नौवें नंबर पर आता है. भारत से आगे दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, फ्रांस, कनाडा, स्पेन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी हैं. हालांकि यहां एक बात ध्यान देने वाली है. आर्टिफिशियल अनालिसिस ने सरवम के दोनों मॉडल के स्कोर को अनुमान बताया है. ऐसा तब किया जाता है जब किसी मॉडल की पूरी टेस्टिंग नहीं हुई हो. फिर भी रैंकिंग में भारत की स्थिति नहीं बदलती.

भारत का सबसे अच्छा AI करीब दो साल पीछे

100 में मिलने वाले नंबर से तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं होती. समय के हिसाब से देखें तो अंतर समझना आसान है. दुनिया में पहला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल जिसने 11.9 से ज्यादा स्कोर किया था, वह OpenAI का o1-preview था. इसे 12 सितंबर 2024 में लॉन्च किया गया था. यानी आज भारत का सबसे अच्छा AI मॉडल उस स्तर पर है, जहां दुनिया का सबसे अच्छा AI करीब दो साल पहले था.

आज डेवलपर्स के लिए उपलब्ध 257 AI मॉडल में से 171 मॉडल Sarvam 105B से ज्यादा स्कोर करते हैं. यह अंतर जल्दी खत्म होता भी नहीं दिख रहा है. जनवरी के बाद से अमेरिका ने 113 नए AI मॉडल लॉन्च किए. चीन ने 91 नए मॉडल पेश किए. भारत ने सिर्फ दो मॉडल लॉन्च किए.

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मामला सिर्फ दुनिया के सबसे ताकतवर और महंगे AI मॉडल का भी नहीं है. OpenAI का GPT-OSS-120B एक ऐसा मॉडल है जिसे कोई भी डाउनलोड करके अपनी मशीन पर चला सकता है. इसका स्कोर 24.1 है. यह Sarvam 105B के स्कोर से दोगुने से भी ज्यादा है.

भारत का AI सस्ता है

यहां भारत के AI की एक बड़ी पावर भी है. Sarvam 105B दुनिया के सबसे सस्ते AI मॉडल में शामिल है. रिपोर्ट के मुताबिक, Claude Opus 5 से अगर कोई काम कराने में 10 डॉलर खर्च होते हैं तो वही काम Sarvam 105B से कराने में करीब 7 सेंट खर्च होंगे.

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यानी कीमत में करीब 135 गुना का अंतर. Sarvam अपने मॉडल को डाउनलोड करके चलाने की सुविधा भी देता है. दूसरी तरफ OpenAI और एंथ्रॉपिक अपने सबसे ताकतवर मॉडल को इस तरह डाउनलोड करने की सुविधा नहीं देते. चीन ने भी AI की दुनिया में कुछ ऐसा ही रास्ता अपनाया. चीनी कंपनियों ने सस्ते और ओपन मॉडल पर जोर दिया. इसका असर OpenRouter के इस्तेमाल में भी दिखा.

जून में चीनी AI मॉडल ने OpenRouter पर अमेरिकी मॉडल को पीछे छोड़ दिया. पिछले महीने OpenRouter पर हुए 60 फीसदी से ज्यादा काम के लिए चीनी मॉडल का इस्तेमाल किया गया. लेकिन भारत में कहानी अलग है. भारत में हर 100 AI काम में 94 विदेशी AI करते हैं. भारत AI का इस्तेमाल करने वाले दुनिया के बड़े देशों में शामिल है.

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भारत में हर 100 AI काम में 94 विदेशी AI करते हैं

जनवरी से जुलाई के बीच भारत से OpenRouter के जरिए 9 ट्रिलियन टोकन इस्तेमाल किए गए. टोकन को आसान भाषा में समझें तो यह शब्द या शब्द का वह छोटा हिस्सा है, जिसे AI पढ़ता और लिखता है.

इस इस्तेमाल के आधार पर भारत दुनिया का 10वां सबसे बड़ा AI बाजार है. लेकिन इस AI काम का 51 फीसदी हिस्सा अमेरिकी मॉडल ने किया. 43 फीसदी हिस्सा चीनी मॉडल ने किया. यानी हर 100 AI काम में करीब 94 काम अमेरिका और चीन के AI मॉडल कर रहे हैं. बाकी 6 फीसदी में दुनिया के सभी दूसरे देश शामिल हैं. इसमें भारत के दोनों AI मॉडल भी हैं.

भारत में कितना AI काम भारतीय मॉडल कर रहे हैं, इसका साफ आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. लेकिन मौजूदा डेटा से यह जरूर पता चलता है कि भारत में इस्तेमाल होने वाला ज्यादातर AI भारत का अपना नहीं है.

एक भी टेस्ट भारतीय भाषा का नहीं

यहां इस पूरी रैंकिंग की एक बड़ी कमी भी है. Artificial Analysis के नौ टेस्ट कोडिंग, वैज्ञानिक सवालों को हल करने, सामान्य जानकारी और किसी AI मॉडल के अपने दम पर काम करने जैसी चीजों को जांचते हैं. लेकिन इनमें से एक भी टेस्ट भारतीय भाषा को नहीं जांचता. यह टेस्ट नहीं बताता कि कोई AI भोजपुरी में लिखी शिकायत समझ सकता है या नहीं. वह मराठी में जमीन के दस्तावेज पढ़ सकता है या नहीं. वह तमिल में पेंशन से जुड़ा सवाल सही तरीके से समझकर जवाब दे सकता है या नहीं.

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Sarvam जैसी कंपनी इसी तरह की जरूरतों को ध्यान में रखकर AI बना रही है. इसलिए दुनिया की रैंकिंग में कम स्कोर का मतलब यह जरूरी नहीं है कि भारतीय भाषाओं और भारतीय जरूरतों के मामले में भी मॉडल उतना ही कमजोर हो.

हर कोई नहीं मानता कि भारत को दुनिया का सबसे पावरफुल AI बनाना चाहिए

भारत के जाने-माने टेक एक्सपर्ट नंदन नीलेकणी इस बात को अलग नजरिए से देखते हैं. 6 अगस्त को नई दिल्ली में NCAER इंडिया पॉलिसी फोरम में Infosys के को-फाउंडर नंदन नीलेकणी ने कहा कि भारत को दुनिया के सबसे ताकतवर AI मॉडल बनाने की दौड़ में नहीं पड़ना चाहिए. उनका कहना था कि पश्चिमी देशों का फोकस बड़े AI मॉडल, ज्यादा चिप्स और बड़े डेटा सेंटर बनाने पर है. लेकिन समय के साथ यह इंफ्रास्ट्रक्चर एक आम चीज बन सकता है.

नीलेकणी के मुताबिक, असली कीमत AI के इस्तेमाल से बनेगी. यानी AI को किस तरह के काम में लगाया जा रहा है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा AI इस्तेमाल वाला देश बन सकता है.

स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी की AI इंडेक्स रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में दुनिया भर के 58 फीसदी कर्मचारी अपने काम में नियमित रूप से AI का इस्तेमाल कर रहे थे. लेकिन भारत, चीन, नाइजीरिया, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और सऊदी अरब में यह आंकड़ा 80 फीसदी से ज्यादा था. यानी भारत उस तकनीक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाले देशों में शामिल है, जिसे वह खुद बहुत कम बना रहा है.

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स्टैनफर्ड की इसी रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात सामने आई. 2024 से 2025 के बीच भारत में AI को लेकर चिंता सबसे तेजी से बढ़ी. यह चिंता 14 फीसदी अंक बढ़ी, जबकि AI को लेकर उत्साह सिर्फ 2 फीसदी अंक बढ़ा. यानी AI का सबसे बड़ा इस्तेमाल करने वाला देश होने का मतलब यह भी है कि भारत उन फैसलों से ज्यादा प्रभावित होगा, जो सैन फ्रांसिस्को और चीन के हांगझोउ जैसे शहरों में लिए जा रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के वकील और AI पर काम करने वाले डॉ. संजय शर्मा ने इंडिया टुडे से कहा कि भारत को AI की हर परत खुद बनाने की जरूरत नहीं है. न ही भारत को हर AI टेस्ट में दुनिया में सबसे आगे आने की जरूरत है. लेकिन जैसे-जैसे AI बैंकिंग, शिक्षा, अदालत और सरकारी सेवाओं के बीच आने लगेगा, विदेशी AI मॉडल पर निर्भरता सिर्फ तकनीक या कारोबार का मुद्दा नहीं रहेगी.

यह जवाबदेही, भू-राजनीतिक खतरे और संस्थागत आजादी का सवाल भी बन जाएगा. यही वह अंतर है जो किसी AI रैंकिंग में दिखाई नहीं देता. कोई बेंचमार्क यह बता सकता है कि AI मॉडल कोडिंग कितनी अच्छी करता है. लेकिन अगर किसी बैंक, स्कूल या अदालत में AI गलत फैसला कर दे तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी, यह सवाल बेंचमार्क नहीं बता सकता. AI के लिए चिप्स जरूरी हैं. लेकिन चिप बनाना और अपना AI मॉडल बनाना एक ही बात नहीं है.

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