फुटबॉल की दुनिया में FIFA वर्ल्ड कप ट्रॉफी सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मानी जाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज खिलाड़ियों के हाथों में नजर आने वाली ट्रॉफी पहली ट्रॉफी नहीं है? इसकी कहानी करीब 100 साल पुरानी है.
जूल्स रिमे ट्रॉफी से हुई शुरुआत
1930 में पहले FIFA वर्ल्ड कप के लिए बनाई गई ट्रॉफी को बाद में जूल्स रिमे ट्रॉफी नाम दिया गया था. इसका नाम फीफा के पूर्व अध्यक्ष जूल्स रिमे के सम्मान में रखा गया था, जिन्होंने वर्ल्ड कप की शुरुआत कराने में अहम भूमिका निभाई थी. इस ट्रॉफी पर जीत की ग्रीक देवी नाइकी (Nike) की आकृति बनी थी.
ब्राजील के पास हमेशा के लिए चली गई ट्रॉफी
उस समय नियम था कि जो देश तीन बार वर्ल्ड कप जीतेगा, वह जूल्स रिमे ट्रॉफी हमेशा के लिए अपने पास रख सकेगा. ब्राजील ने 1970 में तीसरी बार विश्व कप जीतकर यह अधिकार हासिल कर लिया था. इसके बाद फीफा को नई ट्रॉफी बनवानी पड़ी थी.
सिल्वियो गजानिगा ने तैयार की नई ट्रॉफी
नई ट्रॉफी के लिए दुनिया भर से 50 से ज्यादा डिजाइन आए, लेकिन इटली के मूर्तिकार सिल्वियो गजानिगा का डिजाइन चुना गया. उन्होंने दो खिलाड़ियों की आकृतियों को पृथ्वी (ग्लोब) को ऊपर उठाते हुए दिखाया, जो संघर्ष, जीत और पूरी दुनिया को जोड़ने वाली फुटबॉल की भावना का प्रतीक है. यह ट्रॉफी पहली बार 1974 फीफा वर्ल्ड कप में इस्तेमाल की गई थी.
ट्रॉफी की खासियत
ऊंचाई: 36.8 सेंटीमीटर
वजन: लगभग 6.2 किलोग्राम
सामग्री: 18 कैरेट सोना
आधार: हरे रंग के मैलाकाइट (Malachite) पत्थर से बना है.
विजेता टीम ट्रॉफी अपने पास क्यों नहीं रख सकती?
आज के नियमों के अनुसार वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम फाइनल के बाद असली ट्रॉफी उठाती है, लेकिन बाद में उसे फीफा को वापस करना होता है. विजेता देश को अपने पास रखने के लिए केवल गोल्ड-प्लेटेड रेप्लिका (प्रतिरूप) दी जाती है. असली ट्रॉफी फीफा के स्विट्जरलैंड स्थित मुख्यालय में सुरक्षित रखी जाती है.
जूल्स रिमे ट्रॉफी की रहस्यमयी कहानी
जूल्स रिमे ट्रॉफी दो बार चोरी हुई थी.पहली बार 1966 में इंग्लैंड में प्रदर्शनी के दौरान चोरी हुई, जिसे बाद में 'पिकल्स' नाम के एक कुत्ते ने ढूंढ़ निकाला. दूसरी बार 1983 में ब्राजील से चोरी हुई और वह आज तक बरामद नहीं हो सकी. माना जाता है कि उसे पिघला दिया गया था.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क